चैतन्य का चिन्तन
सृष्टि के विराट चक्र में युगों की यात्रा अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है। सतयुग की निर्मलता,
सृष्टि के विराट चक्र में युगों की यात्रा अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है। सतयुग की निर्मलता,

मुक्ति वही है जो जीवित रहते हुए मिले इच्छा के रहते प्राण चले जाए तो मृत्यु है और प्राणों की

ब्रह्मांड का दिव्य स्वरूप भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं न तो योग के द्वारा, न ही भौतिक नेत्रों से
भक्ति केवल एक साधना नहीं, बल्कि आत्मा का सबसे कोमल और गहन स्पंदन है। यह कोई रूढ़ि नहीं, बल्कि जीवन

भगवान के सभी नाम श्रेष्ठ हैं, सभी धाम पवित्र हैं, सभी स्वरूप ध्येय (ध्यान करने के लिए) हैं; फिर भी

मनुष्य शरीर से बहुमूल्य वस्तु संसार में कुछ हो ही नहीं सकता,सृष्टि के निर्माण से लेकर ब्रह्मांड तक जितनी वस्तुएं
यह देह आपने नहीं बनाई जिसने इस देह का निर्माण किया वो ही इस देह के भीतर बैठा है उसी

जब चूल्हा भी यज्ञ बन जाए और गृहस्थी तपोवन! सुबह की पहली किरण जब धरती पर उतरती है, तब एक

योग में नाड़ी वह मार्ग है जिससे होकर शरीर की ऊर्जा प्रवाहित होती है। नाडियाँ शरीर में स्थित नाड़ीचक्रों को

एकनाथ जी महाराज ने ‘कैवल्य मुक्ति किसे कहते हैं’.. इसे समझाने के लिए अपनी रामायण में एक बहुत सुंदर कथा