भक्ति मार्ग (Bhakti Marg)

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      भगवद लीला

आन्तरिक भाव की बाह्य अभिव्यक्ति किसी दर्शक या अनुमोदक की अपेक्षा नहीं करती… आन्तरिक भाव का स्वाभाविक विकास वहीं होता

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मृत्यु कब आ जाय

मनुष्य जीवनका समय बहुत मूल्यवान् है। यह बार-बार नहीं मिल सकता। इसलिये इसे उत्तरोत्तर भजन-ध्यानमें लगाना चाहिये।मृत्यु किसीको सूचना देकर

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प्रभु जप की कमाई

देखो रोते तो दोनों हैं, प्रभु नाम जपने वाले भी, न जपने वाले भी। पर कारण में बड़ा अंतर है

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“भाव के भूखे प्रभु”

.                                    भगवान् ने गोपियों का अपने हाथ से श्रृंगार किया। अत: गोपियों को भी अभिमान हो गया, कि कृष्ण

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भक्ति में सरलता

भगवान की सच्ची भक्ति के लिए हमे कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है।  कुछ ही समय भगवान का नाम

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प्रणाम साधना 1

भगवान श्री हरि को भजते हुए भक्त भगवान को हर भाव में प्रणाम करता है। प्रभु प्राण नाथ को तन

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