अध्यात्मवाद (Adhyatmvad)

नृत्य से समाधि तक।

नृत्य के दिखती अस्थिरता है मगर उसका परिणाम स्थिरता है। नृत्य में हम देखते हे कि हर एक अंग में

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विचार विलय कैसे हो

गुरू वाणी कहती है।  विचार के स्वरुप साधना पर आधारित है। विचार के अनेक रूप है साधक की साधना की

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परमात्म दर्शन

परमात्मा दर्शन अभिलाषा ही लक्ष्य है, संकल्प ही शक्ति है। यही भीतर की खोज हमें आत्मा से परमात्मा की ओर ले

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आत्मा ईश्वर है

आत्म बोध आत्मज्ञान आत्मसमर्पण, आत्म स्वरूप आत्म तत्व,आत्मा ईश्वर है।तु विभो है व्यापक है।यह चैतन्य आत्मा ही ब्रह्म है तु

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