
मृत्यु से भय क्यों
एक राजा के मन में यह काल्पनिक भय बैठ गया कि शत्रु उसके महल पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर

एक राजा के मन में यह काल्पनिक भय बैठ गया कि शत्रु उसके महल पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर

पूछा है कि हम कैसे हो जाएं कि परमात्मा प्रगट हो सके?एक छोटी सी कहानी अंत में कह देनी है।
भगवान राम को भगवान शंकर का उपदेश पद्मपुराण में १६ अध्यायों में भगवान् श्रीराम के प्रति भगवान् शंकर ने जो
मै शरीर नहीं हूं शरीर मेरा नही है शरीर से ऊपर उठना ही साधना है जब तक साधक मे मै

एक दिन एक प्रकांड ज्योतिषी जंगल से गुजरते हुए कच्ची मिट्टी पर पड़े पैरों के निशान देखकर चौंक गया। ऐसे

एक बार किसी गांव में एक बडे संत महात्मा का अपने शिष्यो सहित आगमन हुआ। सब इस होड़ में लग

राधे राधे यह हमारा शरीर ही क्षेत्र है | इस खेत में कर्मरूप जैसा बीज बोया जायगा वैसा ही

स्वयं की खोज: अंधकार से आलोक की ओर जब जीवन संघर्षों की आग में तपता है, तब मनुष्यता की असली

मृत्यु यात्रा है आत्मा चोले का नव निर्माण करती है। मृत्यु वैराग्य और अध्यात्मिकता को प्रकट करती है जीवन आनंद
हम मन्दिर में भगवान् से प्रार्थना करने आते हैं। हमारी आन्तरिक प्रार्थना होती है कि हे प्रभु प्राण नाथ स्वामी