गुरुदेव (Gurudev)

[158]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामभक्त कालिदास पर प्रभु की परम कृपा नैषां मतिस्ताव्दुरुक्रमाङघ्रिंस्पृशत्य नर्थापगमो यदर्थ:महीयसां पादरजोअभिषेकंनिष्किंचनानां न

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[149]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामरघुनाथदास जी का उत्‍कट वैराग्‍य य: प्रव्रज्‍य गृहात् पूर्वं त्रिवर्णवपनात् पुन:।यदि सेवेत तान्

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“अनोखी गुरुदक्षिणा”

.                                     महर्षि अगस्त्यजी के शिष्य सुतीक्ष्ण गुरु-आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे। विद्याध्ययन समाप्त होने पर एक दिन गुरूजी

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सच्ची श्रद्धा

एक शिष्य अपने गुरु के आश्रम में कई वर्षों तक रहा। उसने उनसे शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। एक दिन

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गुरु को कीजिए बंदगी।
बार बार दंडवत प्रणाम।।

गुरु को कीजिए बंदगी।बार बार दंडवत प्रणाम।।खंड और ब्राह्मड में।नहीं कोई गुरु समान।।देवी देवता मन कल्पना।एक गुरु ही है भगवान।।ब्रह्मा

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