[177]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

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((अन्तिम पोस्ट))
।। श्रीहरि:।।
[भज] निताई-गौर राधे श्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराम
श्री चैतन्‍य–शिक्षाष्‍टक

प्रमोद्भवतिहर्षेर्षोद्वेगदैन्‍यार्तिमिश्रितम्।
लपितं गौरचन्‍द्रस्‍य भाग्‍यवद्भिर्निषेव्‍यते।।

महाप्रभु श्री गौरांगदेव ने संन्‍यास लेने के अनन्‍तर अपने हाथ से किसी भी ग्रन्‍थ की रचना नहीं की। उन्‍हें इतना अवकाश ही कहाँ था, वे तो सदा प्रेमवारुणी पान करके पागल से बने रहते थे। ऐसी दशा में पुस्‍तक-प्रणयन करना उनके लिेय अशक्‍य था। किन्‍तु उनके भक्‍तों ने उनके उपदेशामृत के आधार पर अनेक ग्रन्‍थों की रचना कर डाली। व्‍यास, वाल्‍मीकि, शंकर, रामानुज आदि बहुत-से महापुरुष अपनी अमर कृति से ही अन्‍धे हुए संसार को दिव्‍यलोक प्रदान करते हैं। दत्‍तात्रेय, जड़भरत, ऋषभदेव, अजगर मुनि आदि बहुत से सिद्ध महापुरुष अपने लोकातीत आचरणों द्वारा ही संसार को त्‍याग, वैराग्‍य और भोगों की अनित्‍यता का पाठ पढ़ाते हैं। बुद्धदेव, कबीरदास और परमहंस रामकृष्‍णदेव-जैसे बहुत-से परोपकारी महापुरुष अपनी अमोघ वाणी के ही द्वारा संसार का कल्‍याण करते हैं। श्री चैतन्‍यदेव ने तो अपने जीवन को ही प्रेम का साकार स्‍वरूप बनाकर मनुष्‍यों के सम्‍मुख रख दिया। चैतन्‍य-चरित्र की मनुष्‍य ज्‍यों-ज्‍यों आलोचना और प्रत्‍यालोचना करेंगे, त्‍यों ही त्‍यों वे शास्‍त्रीय सिद्धान्‍त साम्‍प्रदायिक, संकुचित सीमा से निकलकर संसार के सम्‍मुख सार्वदेशिक बन सकेंगे। चैतन्‍यदेव ने किसी नये धर्म की रचना नहीं की। संन्‍यासधर्म या त्‍यागधर्म जो ऋषियों का सनातन का धर्म है, उसी के ये शरणापन्‍न हुए और संसार के सम्‍मुख महान त्‍याग का एक सर्वोच्‍च आदर्श उपस्थित करके लोगों को त्‍याग का यथार्थ मर्म सिखा दिया। समय के प्रभाव से ज्ञानमार्ग में जो शुष्‍कता आ गयी थी, संसार को असार बताते-बताते जिनका हृदय भी सारहीन और शुष्‍क बन गया था, उसी शुष्‍कता को उन्‍होंने मेटकर त्‍याग के साथ सरलता का भी सम्मिश्रण कर दिया। उस त्‍यागमय प्रेम ने सोने में सुहागे का काम दिया। यही श्री चैतन्‍य का मैंने सार सिद्धान्‍त समझा है। किन्‍तु मैं अपनी मान्‍यता के लिये अन्‍य किसी को बाध्‍य नहीं करता। पाठक, स्‍वयं चैतन्‍य चरित्र का अध्‍ययन करें, और यथामति उसके सार सिद्धान्‍त का स्‍वयं ही पता लगाने का प्रयत्‍न करें। महाप्रभु ने समय-समय पर आठ श्‍लोक कहे हैं। वे सब महाप्रभुरचित ही बताये जाते हैं। वैष्‍णव मण्‍डली में वे आठ श्‍लोक ‘शिक्षाष्‍टक’ के नाम से अत्‍यन्‍त ही प्रसिद्ध है। उन पर बड़ी टीका-टिप्‍पणियां भी लिखी गयी हैं। ग्रन्‍थ के अन्‍त में उन आठ श्‍लोकों को अर्थसहित देकर हम इस ग्रन्‍थ को समाप्‍त करते हैं। जौ ‘श्री श्री चैतन्‍य–चरितावली’ को आदि से अन्‍त तक पढ़ेंगे वे परम भावगत तथा प्रेमी तो अवश्‍य ही होंगे, यदि न भी होंगे तो इस चारु चरित्र के पठन और चिन्‍तन से अवश्‍य ही वे प्रेमदेव की मनमोहिनी मूर्ति के अनन्‍य उपासक बन जायँगे।

चैतन्‍य-चरितावली रूपी रसभरी धारा ने हमारे और पाठकों के बीच में एक प्रकार का सम्‍बन्‍ध स्‍थापित कर दिया है। चाहे हमारा ‘चैतन्‍य-चरितावली’ के सभी पाठकों से शरीर-सम्‍बन्‍ध न भी हो, किन्‍तु मानसिक सम्‍बन्‍ध तो उसी दिन जुड़ चुका जिस दिन उन्‍होंने अचैतन्‍य जगत को छोड़कर चैतन्‍य-चरित्र की खोज की। उन सभी प्रेमी बन्‍धु के श्री चरणों में हृदय से इस हृदय हीन नीरस लेखक की यही प्रार्थना है कि आप लोग कृपा करके अपने प्रेम का एक-एक कण भी इस दीन-हीन कंगाल को प्रदान कर दें तो इसका कल्‍याण हो जाय। कहावत है–

‘बूँद-बूँद से घट भरे, टपकत रीतो होय।’

बस, प्रत्‍येक पाठक हमारे प्रति थोड़ा भी प्रेम प्रदर्शित करने की कृपा करें तो हमारा यह रीता घड़ा परिपूर्ण हो जाय। क्‍या उदार और प्रेमी पाठक इतनी भिक्षा हमें दे सकेंगे? यह हम हृदय से कहते हैं, हमें धन की या और किसी सांसारिक उपभागों की अभी तो इच्‍छा प्रतीत होती नहीं। आगे की वह साँवला जाने। अच्‍छे–अच्‍छों को लाकर फिर उसने इसी मायाजाल में फँसा दिया है, फिर हम-जैसे कीट-पतंगों की तो गणना ही क्‍या ! उसे तो अभी तक देखा ही नहीं। शास्‍त्रों से यह बात सुनी है कि प्रेमी भक्त ही उसके स्‍वरूप हैं, इसीलिये उनके सामने अकिंचन भिखारी की तरह हम पल्‍ला पसारकर भीख माँग रहे हैं। हमें यह भी विश्‍वास है कि इतने बड़े दाताओं के दरवाजों से हम निराश होकर न लौटेंगे, अवश्‍य ही हमारी झोली में वे कुछ-न-कुछ तो डालेंगे ही। भीख मांगने वाला कोई गीत गाकर या कुछ कहकर ही दाताओं के चित्‍त को अपनी ओर खींचकर भीख माँगता है। अत: हम भी चैतन्‍योक्त इन आठ श्‍लोकों को ही कहकर पाठकों से भीख माँगते हैं।

(1)
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं
श्रेय: कैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्‍दाम्‍बुधिबर्द्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्‍वादनं
सर्वात्‍मस्‍नपनं परं विजयते श्रीकृष्‍णसंकीर्तनम्।।

जो चित्‍तरूपी दर्पण के मैल को मार्जन करने वाला है, जो संसाररूपी महादावाग्नि को शान्‍त करने वाला है, प्राणियों के लिये मंगलदायिनी कैरव चन्द्रिका को विरण करने वाला है, जो विद्यारूपी वधू का जीवन-स्‍वरूप है और आनन्‍दरूपी समुद्र को प्रतिदिन बढ़ाने ही वाला है उस श्रीकृष्‍ण संकीर्तन की जय हो, जय हो !

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(2)
नाम्‍नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-
स्‍तत्रार्पिता नियमित:स्‍मरणे न काल:।
एतादृशी तव कृपा भगवन ममापि
दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुराग:।।

प्राणनाथ ! तुम्‍हारी कृपा में कुछ कसर नहीं और मेरे दुर्भाग्‍य में कुछ संदेह नहीं। भला, देखो तो सही तुमने ‘नन्‍दनन्‍दन’, ‘व्रजचन्‍द‘, ‘मुरलीमनोहर’, ‘राधारमण’– ये कितने सुन्‍दर-सुन्‍दर कानों को प्रिय लगने वाले अपने मनोहारी नाम प्रकट किये हैं, फिर वे नाम रीते ही हों सो बात नहीं, तुमने अपनी सम्‍पूर्ण शक्ति सभी नामों में समानरूप से भर दी है। जिसका भी आश्रय ग्रहण करें, उसी में तुम्‍हारी पूर्ण शक्ति मिल जायगी। सम्‍भव है, वैदिक क्रिया-कलापों की भाँति तुम उनके लेने में कुछ देश, काल और पात्र का नियम रख देते तो इसमें कुछ कठिनता होने का भय भी था, सो तुमने तो इन बातों का कोई भी नियम निर्धारित नहीं किया। स्‍त्री हो, पुरुष हो, द्विज हो, अन्‍त्‍यज हो, शूद्र हो, अनार्य हो, कोई भी क्‍यों न हो, सभी प्राणी शुचि-अशुचि किसी का भी विचार न करते हुए सभी अवस्‍थाओं में, सभी समयों में सर्वत्र उन सुमधुर नामों का संकीर्तन कर सकते हैं। हे भगवन ! तुम्‍हारी तो जीवों के ऊपर इतनी भारी कृपा और मेरा ऐसा भी दुर्दैव कि तुम्‍हारे इन सुमधुर नामों में सच्‍चे हृदय से अनुराग ही उत्‍पन्‍न नहीं होता।

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(3)
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सष्णिुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि:।।

हरिनाम संकीर्तन करने वाले पुरुष को किस प्रकार के गुरु बनाने चाहिये और दूसरों के प्रति उसका व्‍यवहार कैसा होना चाहिये, इसको कहते हैं– भागवत बनने वाले को मुख्‍यतया दो गुरु बनाने चाहिये– ‘एक तो तृण और दूसरा वृक्ष।’ तृण से तो नम्रता की दीक्षा ले, तृण सदा सब के पैरों के नीचे ही पड़ा रहता है। कोई दयालु पुरुष उसे उठाकर आकाश में चढ़ा देते हैं, तो वह फिर ज्‍यों का त्‍यों ही पृथ्‍वी पर आकर पड़ जाता है। वह स्‍वप्‍न में भी किसी के सिर पर चढ़ने की इच्‍छा नहीं करता। तृण के अतिरिक्‍त दूसरे गुरु ‘वृक्ष’ से ‘सहिष्‍णुता’ की दीक्षा लेनी चाहिये। सुन्‍दर वृक्ष का जीवन परोपकार के ही लिये होता है। वह भेद-भाव शून्‍य होकर समान भाव से सभी की सेवा करता रहता है।’ जिसकी इच्‍छा हो वही उसकी सुखद शीतल सघन छाया में आकर अपने तन की ताप बुझा ले। जो उसकी शाखाओं को काटता है, उसे भी वह वैसी ही शीतलता प्रदान करता है और जो जल तथा खाद से उसका सिंचन करता है, उसको भी वैसी ही शीतलता। उसके लिये शत्रु-मित्र दोनों समान हैं। उसके पुष्‍पों की सुगन्धि जो भी उसके पास पहुँच जाय, वही ले सकता है। उसके गोंद को जो चाहे छुटा लावे। उसके कच्‍चे-पके फलों को जिसकी इच्‍छा हो, वही तोड़ लावे। वह किसी से भी मना नहीं करेगा।

दुष्‍ट स्‍वभाव वाले पुरुष उसे खूब फलों से समृद्ध देखकर डाह करने लगते हैं और ईर्ष्‍यावश उसके ऊपर पत्‍थर फेंकते हैं, किन्‍तु वह उनके ऊपर तनिक भी रोष नहीं करता, उल्टे उसे पास यदि पके फल हुए तो सर्वप्रथम तो प्रहार करने वाले को पके ही फल देता है, यदि पके फल उस समय मौजूद न हुए तो कच्‍चे ही देकर अपने अपकारी के प्रति प्रेमभाव प्रदर्षित करता है। दुष्‍ट स्‍वभाव वाले उसी की छाया में बैठकर शान्ति लाभ करते हैं। पीछे से उसकी सीधी शाखाओं को काटने की इच्‍छा करते हैं। वह बिना किसी आपत्ति के अपने शरीर को कटाकर उनके कामों को पूर्ण करता है। उस गुरु से सहिष्‍णुता सीखनी चाहिये। मान तो मृगतृष्‍णा का जल है, इसलिये मान के पीछे जो पड़ा, वह प्‍यार से हिरण की भाँति सदा तड़फ-तड़फकर ही मरता है, मान का कहीं अन्‍त नहीं, ज्‍यों-ज्‍यों आगे को बढ़ते चलो त्‍यों ही त्‍यों वह बालुकामय जल और अधिक आगे बढ़ता चलेगा। इसलिये वैष्‍णव को मान की इच्‍छा कभी न करनी चाहिये, किन्‍तु दूसरों को सदा मान प्रदान करते रहना चाहिये। सम्‍मान रूपी सम्‍पत्ति की अनन्‍त खानि भगवान ने हमारे हृदय में दे रखी है। जिसके पास धन है और वह धन की आवश्‍यकता रखने वाले व्‍यक्ति को उसके माँगने पर नहीं देता, तो वह ‘कंजूस’ कहलाता है। इसलिये सम्‍मान रूपी धन को देने में किसी के साथ कंजूसी न करनी चाहिये। तुम परम उदार बनो, दोनों हाथों से सम्‍पत्ति को लुटाओ, जो तुमसे मान की इच्‍छा रखें, उन्‍हें तो मान देना ही चाहिये, किन्‍तु जो न भी मांगें उन्‍हें भी बस भर-भरकर देते रहो। इससे तुम्‍हारी उदारता से सर्वान्‍तरयामी प्रभु अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न होंगे। सभी में उसी प्‍यारे प्रभु का रूप देखो। सभी को उनका ही विग्रह समझकर नम्रता पूर्वक प्रणाम करो। ऐसे बनकर ही इन सुमधुर नामों के संकीर्तन करने के अधिकारी बन सकते हो–

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(4)
न धनं न जनं न सुन्‍दरीं
कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्‍मनि जन्‍मनीश्‍वरे
भवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि।।

संसार में सब सुखों की खानि धन है। जिसके पास धन है, उसे किसी बात की कमी नहीं। धनी पुरुष के पास गुणी, पण्डित तथा भाँति-भाँति की कलाओं के कोविद आप से आप ही आ जाते हैं। धन से बढ़कर शक्तिशालिनी जन-सम्‍पत्ति है। जिसकी आज्ञा में दस आदमी हैं। जिसके कहने से अनेकों आदमी क्षणभर में रक्‍त बहा सकते हैं, वह अच्‍छे–अच्‍छे धनिकों की भी परवा नहीं करता। पैसा पास न होने पर भी अच्‍छे-अच्‍छे लखपति-करोड़पति उससे थर-थर कांपते हैं। उस जनशक्ति से भी बढ़कर आकर्षक सुन्‍दरी है।

सुन्‍दरी संसार में किसके मन को आ‍कर्षित नहीं कर सकती। अच्‍छे-अच्‍छे करोड़पतियों के कुमार सुन्‍दरी के तनिक से कटाक्ष पर लाखों रुपयों को पानी की तरह बहा देते हैं। हजारों वर्ष की संचित की हुई तपस्‍या को अनेकों तपस्‍वीगण उसकी टेढी भौंह के ऊपर वार देने को बाध्‍य होते हैं। धनी हो चाहे गरीब, पण्डित हो चाहे मूर्ख, शूरवीर हो अथवा निर्बल, जिसके ऊपर भी भौंहरूपी कमान ने कटाक्षरूपी बाण को खींकचर सुन्‍दरी ने एक बार मार दिया प्राय: वह मूर्च्छित हो ही जाता है। तभी तो रा‍जर्षि भर्तृहरि ने कहा है ‘कन्‍दर्पदर्पदलने विरला मनुष्‍या:’ अर्थात कामदेव के मद को चूर्ण करने वाले इस संसार में विरले ही मनुष्‍य हैं। कामदेव की सहचरी सेनानायिका सुन्‍दरी ही है। उस सुन्‍दरी से भी बढ़कर कविता है। जिसको कविता कामिनी ने अपना कान्‍त कहकर वरण कर लिया है, उसके मन त्रैलोक्‍य की सम्‍पत्ति भी तुच्‍छ है। वह धनहीन होने पर भी शाहंशाह है। प्रकृति उसकी मोल ली हुई चेरी है। वह राजा है, महाराजा है, दैव है और विधाता है। इस संसार में कमनीय कवित्‍वशक्ति किसी विरले ही भगवान पुरुष को प्राप्‍त हो सकती है। किन्‍तु प्‍यारे ! मैं तो धन, जन, सुन्‍दरी तथा कविता इनमें से किसी भी वस्‍तु की आकांक्षा नहीं रखता। तब तुम पूछोगे–‘तो तुम और चाहते ही क्‍या हो ?’ इसका उत्तर यही है कि हे जगदीश ! मै कर्मबन्‍धनों को मेटने की प्रार्थना नहीं करता। मेरे प्रारब्‍ध को मिटा दो, ऐसी भी आकांक्षा नहीं रखता। भले ही मुझे चौरासी लाख क्‍या चौरासी अरब योनियों में भ्रमण करना पड़े, किन्‍तु प्‍यारे प्रभो ! तुम्‍हारी स्‍मृति हृदय से न भूले। तुम्‍हारे पुनीत पादपद्मों का ध्‍यान सदा अक्षुण्‍ण भाव से ज्‍यों का त्‍यों ही बना रहे। तुम्‍हारे प्रति मेरी अहैतु की भक्ति उसी प्रकार बनी रहे। मैं सदा चल्‍लाता रहूँ–

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(5)
अयि नन्‍दतनूज किंकरं
पतितं मां विषमे भवाम्‍बुधौ।
कृपया तव पादपंकज
स्थितधूलीसदृशं विचिन्‍तय।।

यह संसार समुद्र के समान है। मुझे इसमें तुमने क्‍यों फेंक दिया, हे नाथ ! इसकी मुझे कोई शिकायत नहीं। मैं अपने कर्मों के अधीन होकर ही इसमें गोते लगा रहा हूँ, बार-बार डूबता हूँ और फिर तुम्‍हारी करुणा के सहारे ऊपर तैरने लगता हूँ।

इस अथाह सागर के सम्‍बन्‍ध में मैं कुछ भी नहीं जानता कि यह कितना गहरा है, किन्‍तु हे मेरे रमण ! मैं इसमें डुबकियाँ मारते-मारते थक गया हूँ। कभी-कभी खारा पानी मुंह में चला जाता है, तो कैसी होने लगती है। कभी कानों में पानी भर जाता है, तो कभी आँखें ही नमकीन जल से चिरचिराने लगती हैं। कभी-कभी नाक में होकर भी जल चला जाता है। हे मेरे मनोहर मल्‍लाह ! हे मेरे कोमल प्रकृति केवट ! मुझे अपना नौकर जानकर, सेवक समझकर कहीं बैठने का स्‍थान दो। तुम तो ग्‍वाले के छोकरे हो न, बड़े चपल हो। पूछ सकते हो, ‘इस अथाह जल में मैं बैठने के लिये तुझे स्‍थान कहाँ दूँ। मेरे पास नाव भी तो नहीं जिसमें तुम्‍हें बिठा लूँ।’ तो हे मेरे रसिकशिरोमणि ! मैं चालाकी नहीं करता, तुम्‍हें भुलाता नहीं सुझाता हूँ। तुम्‍हारे पास एक ऐसा स्‍थान है, जो जल में रहने पर भी नहीं डूबता और उसमें तुमने मुझ-जैसे अनेकों डूबते हुओं को आश्रय दे रखा है। तुम्‍हारे ये अरुण वर्ण के जो कोमल चरण कमल हैं, ये तो जल में ही रहने के आदी हैं। इन कमलों में सैकड़ों धूलि के कण जल में रहते हुए भी निश्चिन्‍तरूप से बिना डूबे ही बैठे हैं। हे नन्‍दजी के लाड़िले लाल ! उन्‍हीं धूलि कणों में मेरी भी गणना कर लो। मुझे भी उन पावन पद्मों में रेणु बनाकर बिठा लो। वहाँ बैठकर मैं तुम्‍हारी धीरे-धीरे पैर हिलाने की क्रीड़ा के साथ थिरक-थिरककर सुन्‍दर स्‍वर से इन नामों का गायन करता रहूँगा–
श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(6)
नयनं गलदश्रुधारया
वदनं गद्गदरुद्धया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपु: कदा
तव नामग्रहणे भविष्‍यति।।

प्‍यारे ! मैंने सुना है कि आँसुओं के भीतर जो सफेद-सफेद कांच का सा छोटा सा घर दीखता है, उसी के भीतर तुम्‍हारा घर है। तुम सदा उसी में वास करते हो। यदि यह बात ठीक है, तब तो प्रभो ! मेरा नाम लेना व्‍यर्थ ही है। मेरी आँखें आंसू तो बहाती ही नहीं, तुम तो भीतर ही छिपे बैठे रहते होगे। बोलना-चालना तो वाचालता में होता है, तुम सम्‍भवतया मौनियों से प्‍यार करते होगे, किन्‍तु दयालो ! मौन कैसे रहूँ? यह वाणी तो अपने आप ही फूट पड़ती है। वाणी को रोक दो, गले को रुद्ध कर दो, जिससे स्‍पष्‍ट एक भी शब्‍द न निकल सके। सुस्‍ती में सभी वस्‍तुएं शिथिल हो जाती हैं। तुम कहते हो– ‘तेरे ये शरीर के बाल क्‍यों पड़े हैं?’

प्‍यारे ! इनमें विद्युत का संचार नहीं हुआ है। अपनी विरहरूपी बिजली इनमें भर दो, जिससे ये तुम्‍हारे नाम का शब्‍द सुनते ही चौंककर खड़े हो जायँ। हे मेरे विधाता ! इनकी सुस्‍ती मिटा दो, इनमें ऐसी शक्ति भर दो जिससे फुरहुरी आती रहे। बस, जहाँ तुम्‍हारे नाम की ध्‍वनि सुनी, वहीं दोनों नेत्र लबालब अश्रु से भर आये, वाणी अपने आप ही रुक गयी, शरीर के सभी रोम बिलकुल खड़े हो गये। प्‍यारे तुम्‍हारे इन मधुर नामों को लेते हुए कभी मेरी ऐसी स्थिति हो भी सकेगी क्‍या!

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(7)
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।
शून्‍यायितं जगत् सर्वं गोविन्‍दविरहेण मे।।

हाय रे प्‍यारे ! लोग कहते हैं आयु अल्‍प है, किन्‍तु प्‍यारे ! मेरी आयु तो तुमने अनन्‍त कर दी है और तुम मुझे अमर बनाकर कहीं छिप गये हो। हे चोर ! जरा आकर मेरी दशा तो देखो। तुम्‍हें बिना देखो मेरी कैसी दशा हो रही है, जिसे लोग ‘निमेष’ कहते हैं, पलक मारते ही जिस समय को व्‍यतीत हुआ बताते हैं, वह समय मेरे लिये एक युग से भी बढ़कर हो गया है। इसका कारण है तुम्‍हारा विरह। लोक कहते हैं, वर्षा चार ही महीने होती है, किन्‍तु मेरा जीवन तो तुमने वर्षामय ही बना दिया है। मेरे नेत्रों से सदा वर्षा की धाराएं ही छूटती रहती हैं, क्‍योंकि तुम दीखते नहीं हो, कहीं दूर जाकर छिप गये हो। नैयायिक चौबीस गुण बताते हैं, सात पदार्थ बताते हैं। इस संसार में विविध प्रकार की वस्‍तुएँ बतायी जाती हैं, किन्‍तु प्‍यारे मोहन! मेरे लिये तो यह सम्‍पूर्ण संसार सूना-सूना सा ही प्रतीत होता है, इसका एकमात्र कारण है तुम्‍हारा अदर्शन। तुम मुझे यहाँ फँसाकर न जाने कहाँ चले गये हो, इसलिये मैं सदा रोता-रोता चिल्‍लाता रहता हूँ –
श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(8)
आश्लिष्‍य वा पादरतां पिनष्‍टु मा-
मदर्शनान्‍मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्‍पटो
मत्‍प्राणनाथस्‍तु स एव नापर:।।

हे सखि ! इन व्‍यर्थ बातों में क्‍या रखा है। तू मुझे उसके गुणों को क्‍यों सुनाती है? वह चाहे दयामय हो या धोखेबाज, प्रेमी हो या निष्‍ठुर, रसिक हो या जारशिरोमणि। मैं तो उसकी चेरी बन चुकी हूँ। मैंने तो अपना अंग उसे ही अर्पण कर दिया है। वह चाहे तो इसे हृदय से चिपटकार प्रेम के कारण इसके रोमों को खड़ा कर दे या अपने विरह में जल से निकली हुई मर्माहत मछली की भाँति तड़फाता रहे। मैं उस लम्‍पट के पाले अब तो पड़ ही गयी हूँ। अब सोच करने से हो ही क्‍या सकता है, जो होना था सो हो चुका। मैं तो अपना सर्वस्‍व उस पर वार चुकी। वह इस शरीर का स्‍वामी बन चुका। अब कोई अपर पुरुष इसकी ओर दृष्टि उठाकर भी नहीं देख सकता। उसके अनन्‍त सुन्‍दर और मनोहर नाम हैं, उनमें से मैं तो रोते-रोते इन्‍हीं नामों का उच्‍चारण करती हूँ–

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे !
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

प्रेमी पाठकों का प्रेम दिन दूना रात चौगुना बढ़ता रहे, क्‍या इस भिखारी को भी उसमें से एक कण मिलेगा?

इति शम्
श्रीश्री चैतन्य- चरितावली समाप्तोऽयं ग्रंन्थ:।
••••••••••••••••••••••••••••••••••
[ गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत पुस्तक श्रीचैतन्य-चरितावली से ]



((last post)) , Shri Hari:. [Bhaj] Nitai-Gaur Radhe Shyam [Chant] Harekrishna Hareram Mr. Chaitanya – Educator

Joy arises, mixed with joy, desire, anxiety, sorrow and pain. It is served by the lucky ones smeared with Gaurachandra

महाप्रभु श्री गौरांगदेव ने संन्‍यास लेने के अनन्‍तर अपने हाथ से किसी भी ग्रन्‍थ की रचना नहीं की। उन्‍हें इतना अवकाश ही कहाँ था, वे तो सदा प्रेमवारुणी पान करके पागल से बने रहते थे। ऐसी दशा में पुस्‍तक-प्रणयन करना उनके लिेय अशक्‍य था। किन्‍तु उनके भक्‍तों ने उनके उपदेशामृत के आधार पर अनेक ग्रन्‍थों की रचना कर डाली। व्‍यास, वाल्‍मीकि, शंकर, रामानुज आदि बहुत-से महापुरुष अपनी अमर कृति से ही अन्‍धे हुए संसार को दिव्‍यलोक प्रदान करते हैं। दत्‍तात्रेय, जड़भरत, ऋषभदेव, अजगर मुनि आदि बहुत से सिद्ध महापुरुष अपने लोकातीत आचरणों द्वारा ही संसार को त्‍याग, वैराग्‍य और भोगों की अनित्‍यता का पाठ पढ़ाते हैं। बुद्धदेव, कबीरदास और परमहंस रामकृष्‍णदेव-जैसे बहुत-से परोपकारी महापुरुष अपनी अमोघ वाणी के ही द्वारा संसार का कल्‍याण करते हैं। श्री चैतन्‍यदेव ने तो अपने जीवन को ही प्रेम का साकार स्‍वरूप बनाकर मनुष्‍यों के सम्‍मुख रख दिया। चैतन्‍य-चरित्र की मनुष्‍य ज्‍यों-ज्‍यों आलोचना और प्रत्‍यालोचना करेंगे, त्‍यों ही त्‍यों वे शास्‍त्रीय सिद्धान्‍त साम्‍प्रदायिक, संकुचित सीमा से निकलकर संसार के सम्‍मुख सार्वदेशिक बन सकेंगे। चैतन्‍यदेव ने किसी नये धर्म की रचना नहीं की। संन्‍यासधर्म या त्‍यागधर्म जो ऋषियों का सनातन का धर्म है, उसी के ये शरणापन्‍न हुए और संसार के सम्‍मुख महान त्‍याग का एक सर्वोच्‍च आदर्श उपस्थित करके लोगों को त्‍याग का यथार्थ मर्म सिखा दिया। समय के प्रभाव से ज्ञानमार्ग में जो शुष्‍कता आ गयी थी, संसार को असार बताते-बताते जिनका हृदय भी सारहीन और शुष्‍क बन गया था, उसी शुष्‍कता को उन्‍होंने मेटकर त्‍याग के साथ सरलता का भी सम्मिश्रण कर दिया। उस त्‍यागमय प्रेम ने सोने में सुहागे का काम दिया। यही श्री चैतन्‍य का मैंने सार सिद्धान्‍त समझा है। किन्‍तु मैं अपनी मान्‍यता के लिये अन्‍य किसी को बाध्‍य नहीं करता। पाठक, स्‍वयं चैतन्‍य चरित्र का अध्‍ययन करें, और यथामति उसके सार सिद्धान्‍त का स्‍वयं ही पता लगाने का प्रयत्‍न करें। महाप्रभु ने समय-समय पर आठ श्‍लोक कहे हैं। वे सब महाप्रभुरचित ही बताये जाते हैं। वैष्‍णव मण्‍डली में वे आठ श्‍लोक ‘शिक्षाष्‍टक’ के नाम से अत्‍यन्‍त ही प्रसिद्ध है। उन पर बड़ी टीका-टिप्‍पणियां भी लिखी गयी हैं। ग्रन्‍थ के अन्‍त में उन आठ श्‍लोकों को अर्थसहित देकर हम इस ग्रन्‍थ को समाप्‍त करते हैं। जौ ‘श्री श्री चैतन्‍य-चरितावली’ को आदि से अन्‍त तक पढ़ेंगे वे परम भावगत तथा प्रेमी तो अवश्‍य ही होंगे, यदि न भी होंगे तो इस चारु चरित्र के पठन और चिन्‍तन से अवश्‍य ही वे प्रेमदेव की मनमोहिनी मूर्ति के अनन्‍य उपासक बन जायँगे।

The crimson stream in the form of Chaitanya-Charitavali has established a kind of relationship between us and the readers. Even if we do not have a physical relation with all the readers of ‘Chaitanya-Charitavali’, but the mental relation has been established on the same day when they left the unconscious world and searched for Chaitanya-Charita. At the holy feet of all those loving friends, this heartless penniless writer prays from the bottom of his heart that if you people kindly give every particle of your love to this poor man, then he will be well. There is a saying-

‘Fill the pot with drops, and it is a dripping ritual.

Just, if every reader please show a little love towards us, then this pot of ours will be full. Will the generous and loving readers be able to give us this much alms? We say this from our heart, we don’t feel any desire for money or any other worldly possessions right now. In the future she will go dark. He has brought good people and then trapped them in this illusion, then what to count insects and kites like us! Haven’t seen him yet. It has been heard from the scriptures that loving devotees are his form, that’s why we are begging in front of him like helpless beggars. We also believe that we will not return disappointed from the doors of such great donors, they will definitely put something in our pocket. A beggar begs by singing a song or by saying something to draw the mind of the donors towards him. Therefore, we too, being conscious, beg the readers by quoting only these eight verses.

(1) Wiping the mirror of the mind, extinguishing the fire of the great fire of birth Credit: Distribution of Kairava Chandrika and life of the bride of knowledge. Bliss, increasing intelligence, tasting the full nectar every step The supreme bathing of the whole soul is the chanting of the name of Krishna.

The one who removes the filth from the mirror of the mind, the one who pacifies the great fire of the world, the one who dispels the auspicious Kairav ​​Chandrika for the living beings, the one who is the life form of the bride in the form of Vidya and the one who increases the ocean of pleasure everyday, he Hail to Shri Krishna Sankirtan, Hail!

Sri Krishna! Govind! Hare! Murare! O Lord! Narayana! Vasudeva!

(2) Naam Namakari Bahudha Nijasarvashakti- There is no time for regular remembrance devoted to it. Such is your grace, Lord, to me too Unfortunately there is no affection for such a person in this world

Prannath! There is no stone unturned in your grace and there is no doubt in my misfortune. Well, look, you have revealed your beautiful names ‘Nandanandan’, ‘Vrajchand’, ‘Murlimanohar’, ‘Radharaman’ – these are so beautiful and dear to the ears, then it doesn’t matter if those names are reiterated, you He has filled all his names equally with his full power. Whosoever you take shelter, you will get full power in that person. It is possible, like the Vedic rituals, if you had put some rule of country, time and vessel in their taking, then there was a fear of some difficulty in it, so you did not set any rule of these things. Be it female, male, dwij, antyaj, shudra, non-arya, no matter what, all living beings chant those melodious names everywhere, in all situations, at all times, without considering anything impure or impure. Can O God! You have such a great mercy on the living beings and I have such a misfortune that in these melodious names of yours, affection does not arise from the true heart.

Sri Krishna! Govind! Hare! Murare! O Lord! Narayana! Vasudeva!

(3) It is lower than grass and stronger than trees Hari should always be praised with respect and dishonor

It is said that what kind of Guru should be made by a man who does Harinam Sankirtan and how should he behave towards others – one who wants to become a Bhagwat should mainly make two gurus – ‘one is a tree and the other is a tree’. At least take initiation of humility from the straw, the straw always lies under everyone’s feet. If some kind man lifts him up to the sky, then he falls on the earth just as he was. He does not wish to climb on anyone’s head even in his dreams. Apart from Trina, the initiation of ‘tolerance’ should be taken from the second Guru ‘tree’. The life of a beautiful tree is for charity only. Being free from discrimination, he continues to serve everyone equally. Whoever has the desire, he can extinguish the heat of his body by coming under his pleasant cool dense shade. He gives the same coolness to the one who cuts its branches and the same coolness to the one who irrigates it with water and manure. For him both enemy and friend are equal. The fragrance of her flowers can be taken by whoever reaches her. Whoever wants to get rid of his glue. Anyone who wishes can pluck its unripe and ripe fruits. He will not refuse anyone.

Evil-natured men start envying him seeing him rich in fruits and jealously throw stones at him, but he does not get angry at them at all, on the contrary, if he has ripe fruits, then first of all he gives ripe fruits to the attacker. Yes, if ripe fruits are not available at that time, then by giving raw ones, he shows love towards his ill-wisher. Evil natured people get peace by sitting in his shadow. Wish to cut its straight branches from behind. He completes their tasks by cutting his body without any objection. One should learn tolerance from that teacher. Respect is the water of a mirage, that’s why the one who chases after respect always dies in agony like a deer with love, there is no end to respect, as we move forward, that sandy water becomes more and more. Will keep on increasing That’s why Vaishnav should never desire respect, but should always give respect to others. God has placed the infinite treasure of wealth in our hearts. The one who has money and does not give it to the person in need of money on his demand, then he is called ‘miserly’. That’s why one should not be stingy with anyone in giving money in the form of respect. Be the most generous, loot the property with both hands, those who want respect from you, they must be given respect, but even those who do not ask, just keep giving them in abundance. With this your generosity will make the omnipresent Lord very pleased. See the form of the same loving Lord in everyone. Treat everyone humbly considering them as their deities. Only by becoming like this can you become entitled to chant these melodious names.

Sri Krishna! Govind! Hare! Murare! O Lord! Narayana! Vasudeva!

(4) No wealth, no people, no beauty I wish you poems or Jagdish. In my birth, in the birth of God Your devotion to You is unconditional.

Money is the source of all happiness in the world. One who has money, he does not lack anything. To a rich man, virtuous, learned and connoisseurs of various arts come to you on your own. More powerful than wealth is public property. Who has ten men under his command. The one whose words can shed blood in a moment, does not even care about the well-to-do. Even good millionaires and millionaires tremble with it even when they don’t have money. Even more attractive than that manpower is beauty.

Beauty cannot attract anyone’s mind in the world. Kumars of good millionaires shed lakhs of rupees like water on the slightest sarcasm of Sundari. Thousands of years of accumulated penance are forced by many ascetics to attack his crooked brow. Whether he is rich or poor, learned or foolish, brave or weak, on whom the arrow in the form of sarcasm has been shot once by the bow-shaped bow, almost he faints. That’s why Rajrishi Bhartrihari has said ‘Kandarpadparpadalane virla manushya:’ That means there are very few human beings in this world who can pulverize the lust of Cupid. Kamadeva’s companion is the heroine Sundari. Poetry is more than that beauty. The one who has been chosen by Kavita Kamini as her Kant, the wealth of the three worlds is also insignificant in his mind. He is an emperor even though he is penniless. Nature is his bought cherry. He is the king, the emperor, the divine and the creator. In this world, the rare power of poetry can only be attained by a God-man. But dear! I do not aspire for wealth, people, beauty or poetry, any of these things. Then you will ask – ‘So what else do you want?’ The answer is that O Jagdish! I do not pray for the removal of karmic bondages. Erase my destiny, does not even have such aspiration. Even if I have to travel in 84 lakh or 84 billion births, but dear Lord! Don’t forget your memory from heart. May the attention of your sacred lotuses always remain intact. May my causeless devotion towards you remain the same. I always go on

Sri Krishna! Govind! Hare! Murare! O Lord! Narayana! Vasudeva!

(5) Oh, Nanda, son of a bitch I have fallen into unevenness on Mercury Please your lotus feet Think of it as stagnant dust.

This world is like an ocean. Why did you throw me in this, O Nath! I don’t have any complaint about this. I am diving in it only by being under my actions, I drown again and again and then with the help of your compassion I start swimming up.

I do not know anything about this bottomless ocean, how deep it is, but O my Raman! I’m tired of diving into it. Sometimes salt water goes into the mouth, then how does it happen. Sometimes the ears get filled with water, and sometimes the eyes start chirping with salty water. Sometimes the water goes away even after passing through the nose. Oh my lovely sailor! O my gentle nature boatman! Considering me as your servant, give me a place to sit somewhere. You are the son of a cowherd, aren’t you? You are very agile. You may ask, ‘Where should I give you a place to sit in this bottomless water. I don’t even have a boat in which to make you sit.’ So O my lover! I don’t do tricks, I don’t suggest you to forget. You have such a place, which does not sink even if it is in water, and in it you have given shelter to many drowning people like me. These soft lotus feet of your Arun Varna, they are used to living in water only. Hundreds of dust particles are sitting on these lotuses without drowning in spite of being in water. Oh dear son of Nandji! Count me among those dust particles. Make me sit in those holy lotuses as Renu. Sitting there, I will keep singing these names in a beautiful voice, dancing along with your slow foot movements. Sri Krishna ! Govind ! Hare! Murare! Hey Nath! Narayan! Vasudev!

(6) Eyes with tears in his throat His face was choked with words. When the body is covered with pupils It will be when you take your name.

Dear! I have heard that your home is inside the small white glass house that is visible inside the tears. You always reside in him. If this is true, then Lord! It is useless to mention my name. My eyes do not shed tears at all, you must be sitting hidden inside. Talking and walking happens in talkativeness, you would probably love silence, but kind! how to be silent This speech splits on its own. Stop the speech, block the throat, so that not a single word can come out clearly. In lethargy, all things become relaxed. You say- ‘Why do you have these body hairs?’

Dear! There is no communication of electricity in them. Fill them with the power of your separation, so that they stand startled as soon as they hear the word of your name. O my creator! Remove their laziness, fill them with such energy that they keep on flourishing. Just, wherever I heard the sound of your name, there both eyes were filled with tears, speech stopped automatically, all the hairs of the body stood completely erect. Beloved, can I ever be in such a state while reciting these sweet names of yours!

Sri Krishna! Govind! Hare! Murare! O Lord! Narayana! Vasudeva!

(7) It was aged and rained down by the eyes in a moment The whole world has become empty by my separation from Govinda.

Hi dear! People say that life is short, but dear! You have made my life eternal and you have made me immortal and hid somewhere. Hey thief! Just come and see my condition. How am I doing without seeing you, whom people call ‘Nimesh’, the time which has been passed by winking, that time has become more than an era for me. The reason for this is your separation. People say that it rains only for four months, but you have made my life rainy. Streams of rain always leave my eyes, because you are not visible, you have gone and hidden somewhere far away. Naiyayik tells twenty-four qualities, tells seven substances. Various things are told in this world, but dear Mohan! To me this whole world seems like a desolate place, the only reason for this is your absence. I don’t know where you have gone by trapping me here, that’s why I keep on crying and crying – Sri Krishna ! Govind ! Hare! Murare! Hey Nath! Narayan! Vasudev!

(8) Embrace or pinch the foot- Or make it heartbreaking to see me. Let him put it as he pleases He alone is the master of my life and there is no other.

Hey friend! What is there in these useless things? Why do you tell me his qualities? Whether he is kind or deceitful, lover or cruel, rasik or jarshiromani. I have become his cherry. I have offered my body to him only. If he wants to cling to his heart, make his hair stand up because of love or keep on suffering like a heartbroken fish out of water in his separation. I have already fallen in the lap of that luster. Now thinking what can happen, what had to happen has already happened. I have thrown my all at him. He has become the master of this body. Now no upper man can see it even by raising his eyes. He has infinite beautiful and lovely names, among them I recite these names while crying-

Sri Krishna! Govind! Hare! Murare! O Lord! Narayana! Vasudeva!

May the love of the loving readers keep increasing day by day and quadruple, will this beggar also get a particle out of it?

This is Sham This is the complete book of Sri Sri Chaitanya- Charitavali. •••••••••••••••••••••••••••••• [From the book Sri Chaitanya-Charitavali by Sri Prabhudatta Brahmachari published by Gita Press, Gorakhpur]

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