*1*रासलीला रहस्य

काम पूरा करके चलें ऐसा गोपियों ने नहीं सोचा। वे चल पड़ीं, उस विषयासक्ति-शून्य संन्यासी के समान, जिसका हृदय वैराग्य की प्रदीप्त ज्वाला से परिपूर्ण है। किसी ने किसी से पूछा नहीं, सलाह नहीं की अस्त-व्यस्त गति से जो जैसे थी, वैसे ही श्रीकृष्ण के पास पहुँच गयी। वैराग्य की पूर्णता और प्रेम की पूर्णता एक ही बात है, दो नहीं। गोपियाँ व्रज और श्रीकृष्ण के बीच में मूर्तिमान वैराग्य हैं या मूर्तिमान प्रेम, क्या इसका निर्णय कोई कर सकता है?

साधना के दो भेद हैं-
मर्यादापूर्ण वैध साधना और
मर्यादारहित अवैध प्रेमसाधना

दोनों के ही अपने-अपने स्वतन्त्र नियम हैं। वैध साधना में जैसे नियमों के बन्धन का, सनातन पद्धति का, कर्तव्यों का और विविध पालनीय धर्मों का त्याग साधन से भ्रष्ट करने वाला और महान हानिकर है, वैसे ही अवैध प्रेम साधना में इनका पालन कलंकरूप होता है।यह बात नहीं कि इन सब आत्मोन्नति के साधनों को वह अवैध प्रेम साधना का साधक जान-बूझकर छोड़ देता है। बात यह है कि वह स्तर ही ऐसा है, जहाँ इनकी आवश्यकता नहीं है। ये वहाँ अपने-आप वैसे ही छूट जाते हैं, जैसे नदी के पार पहुँच जाने पर स्वाभाविक ही नौका की सवारी छूट जाती है। जमीन पर न तो नौका पर बैठकर चलने का प्रश्न उठता है और न ऐसा चाहने या करने वाला बुद्धिमान ही माना जाता है। ये सब साधन वहीं तक रहते हैं, जहाँ तक सारी वृत्तियाँ सहज स्वेच्छा से सदा-सर्वदा एकमात्र भगवान की ओर दौड़ने नहीं लग जातीं।श्रीगोपीजन साधना इसी उच्च स्तर में परम आदर्श थीं। उनकी सारी वृत्तियाँ सर्वथा श्रीकृष्ण में ही निमग्न रहती थीं। इसी से उन्होंने देह-गेह, पति-पुत्र, लोक-परलोक, कर्तव्य-धर्म-सब को छोड़कर, सबका उल्लंधन करके एकमात्र परमधर्मस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को ही पाने के लिये अभिसार किया था। उनका यह पति-पुत्रों का त्याग, यह सर्वधर्म का त्याग ही उनके स्तर के अनुरूप स्वधर्म है।

इस ‘सर्वधर्मत्याग’ रूप स्वधर्म का आचरण गोपियों जैसे उच्च स्तर के साधकों में ही सम्भव है क्योंकि सब धर्मों का यह त्याग वे ही कर सकते हैं, जो उसका यथाविधि पूरा पालन कर चुकने के बाद इसके परम फल अनन्य और अचिन्त्य देवदुर्लभ भगवत्प्रेम को प्राप्त कर चुकते हैं। वे भी जान-बूझकर त्याग नहीं करते। सूर्य का प्रखर प्रकाश हो जाने पर तैल दीपक की भाँति स्वतः ही ये धर्म उसे त्याग देते हैं। यह त्याग तिरस्कार मूलक नहीं, वरन् तृप्ति मूलक है। भगवत्-प्रेम की ऊँची स्थिति का यही स्वरूप है। जिसको भगवान अपनी वंशीध्वनि सुनाकर नाम ले-लेकर बुलायें, वह भला, किसी दूसरे धर्म की ओर ताककर कब और कैसे रूक सकता है।

रोकने वालों ने रोका भी, परंतु हिमालय से निकलकर समुद्र में गिरने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की प्रखर धारा को क्या कोई रोक सकता है? वे न रुकीं, नहीं रोकी जा सकीं। जो गोपियाँ जाने में समर्थ न हुईं। उनका शरीर घर में पड़ा रह गया, भगवान के वियोग-दुःख से उनके सारे कलुष धुल गये, ध्यान में प्राप्तभगवान के सानिध्य से उनके समस्त पुण्यों का परम फल प्राप्त हो गया और वे भगवान के पास सशरीर जाने वाली गोपियों के पहुँचने से पहले ही भगवान के पास पहुँच गयीं। भगवान में मिल गयीं।यह शास्त्र का प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि पाप-पुण्य के कारण ही बन्धन होता है और शुभाशुभ का भोग होता है। शुभाशुभ कर्मों के भोग से जब पाप-पुण्य दोनों नाश हो जाते हैं, तब जीव की मुक्ति हो जाती है। यद्यपि गोपियाँ पाप-पुण्य से रहित श्रीभगवान की प्रेम-प्रतिमास्वरूपा थीं, तथापि लीला के लिये यह दिखाया गया है कि अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के पास न जा सकने से उनके विरहानल से उनको महान संताप हुआ।यद्यपि गोपियाँ पाप-पुण्य से रहित श्रीभगवान की प्रेम-प्रतिमास्वरूपा थीं तथापि लीला के लिये यह दिखाया गया है कि अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के पास न जा सकने से उनके विरहानल से उनको इतना महान संताप हुआ कि उससे उनके सम्पूर्ण अशुभ का भोग हो गया, उनके समस्त पाप नष्ट हो गये और प्रियतम भगवान के ध्यान से उन्हें इतना आनन्द हुआ कि उससे उनके सारे पुण्यों का फल मिल गया। इस प्रकार पाप-पुण्यों का पूर्ण रूप से अभाव हो जाने से उनकी मुक्ति हो गयी। चाहे किसी भी भाव से हो-काम से, क्रोध से, लोभ से जो भगवान के मंगलमय श्रीविग्रह का चिन्तन करता है, उसके भाव की अपेक्षा न करके वस्तुशक्ति से ही उसका कल्याण हो जाता है।

यह भगवान के श्रीविग्रह की विशेषता है। भाव के द्वारा तो एक प्रस्तरमूर्ति भी परम कल्याण का दान कर सकती है, बिना भाव के ही कल्याणदान भगवद्विग्रह का सहज दान है।भगवान हैं बड़े लीलामय। जहाँ वे अखिल विश्व के विधाता ब्रह्मा, शिव आदि के भी वन्दनीय, निखिल जीवों के प्रत्यगात्मा हैं, वहीं वे लीलानटवर गोपियों के इशारे पर नाचने वाले भी हैं। उन्हीं की इच्छा से, उन्हीं की प्रेमाहान से, उन्हीं के वंशी-निमन्त्रण से प्रेरित होकर गोपियाँ उनके पास आयीं परंतु उन्होंने ऐसी भावभंगी प्रकट की, ऐसा स्वाँग बनाया, मानो उन्हें गोपियों के आने का कुछ पता ही न हो। कहीं साधारण जन इसे साधारण बात न समझ लें, इसलिये जन साधारण लोगों के लिये उपदेश और गोपियों का अधिकार भी उन्होंने सबके सामने रख दिया। उन्होंने गोपियों को अपने समक्ष देख कर कहा-‘गोपियो व्रज में कोई विपत्ति तो नहीं आयी, घोर रात्रि में यहाँ आने का कारण क्या है? घर वाले तुम्हें ढूँढ़ते होंगे, तुम्हें अब यहाँ ठहरना नहीं चाहिये।
(श्रीराधामाधव चिंतन)
क्रमश:



Gopis did not think that they should go after completing their work. She walked like a hermit devoid of any attachment, whose heart is full of the bright flame of dispassion. No one asked anyone, did not consult anyone, she reached Shri Krishna in the same way as she was in a chaotic manner. The perfection of disinterest and the perfection of love are the same thing, not two. Can anyone decide between the gopis Vraj and Shri Krishna, are the idolized disinterest or idolized love?

There are two types of Sadhana- dignified legal practice and promiscuous courtship

Both have their own independent rules. Just as in legal practice, relinquishing the bondage of rules, the eternal system, duties and the various religions to be followed corrupts the means and is very harmful, in the same way, following them in illegal love practice is stigmatized. The seeker of illegal love practice deliberately leaves the means of The thing is, that is the level where they are not needed. They are left there on their own, just as the boat ride is naturally left on reaching the other side of the river. There is no question of walking on the boat sitting on the ground, nor the one who wants or does so is considered intelligent. All these means remain as long as all the instincts do not automatically start running towards the only God always and always. Shri Gopijan Sadhana was the ultimate ideal in this high level. All his instincts were always engrossed in Shri Krishna. Due to this, leaving body-geh, husband-son, world-hereafter, duty-religion-all, violating all, had converged to attain only Lord Krishna, the supreme religion. This renunciation of her husband and sons, this renunciation of all religions is her own religion according to her level.

The practice of self-religion in the form of ‘renunciation of all religion’ is possible only in high-level devotees like Gopis, because only those people can do this renunciation of all religions, who, after following it properly, attain its ultimate fruit, the unique and unimaginable divine love of God. misses out They also don’t give up knowingly. When the sun becomes bright, these religions automatically abandon it like an oil lamp. This renunciation is not contemptuous, but satisfaction oriented. This is the form of the elevated stage of God-love. The one whom God calls by name after reciting his lineage, when and how can he stop looking towards some other religion.

Those who obstructed did stop, but can anyone stop the strong current of Brahmaputra river coming out of the Himalayas and falling into the sea? They did not stop, could not be stopped. The gopis who were not able to go. His body remained lying at home, all his impurities were washed away by the sorrow of separation from God, he attained the ultimate fruit of all his good deeds by the company of God in meditation and he went to God even before the gopis who went to God in body. reached near Found in God. It is a well-known principle of the scriptures that it is due to meritorious deeds that bondage takes place and auspiciousness is enjoyed. When both sins and virtues are destroyed by the enjoyment of auspicious deeds, then the soul becomes free. Although the gopis were the love-statues of Sri Bhagavan, devoid of sin and virtue, it is shown for the sake of the Leela that they were deeply grieved by their absence from being able to go to their beloved Sri Krishna. Although she was in the form of a statue, however, it is shown for the Leela that she could not go near her beloved Shri Krishna, she felt so great anguish due to his absence that all her bad omens were consumed by it, all her sins were destroyed and she meditated on the beloved Lord. He was so happy that he got the fruits of all his virtues. In this way, due to the complete absence of sins and virtues, he was liberated. Be it from any feeling – from lust, from anger, from greed, the one who thinks about the auspicious Sri Deity of God, instead of expecting his feelings, he gets well-being from the material power.

This is the specialty of the Srivigraha of the Lord. Even a stone idol can donate ultimate welfare through feelings, charity without feelings is an easy donation of God’s idol. God is very lilamaya. Where he is the worshiper of the creator of the whole world, Brahma, Shiva etc., the soul of unkhil creatures, on the other hand, he is also the one who dances at the behest of Leelantwar Gopis. Gopis came to him by his wish, by his love, inspired by his family’s invitation, but they expressed such emotion, made such a mockery, as if they had no idea about the arrival of gopis. Lest the common people consider it as a simple thing, so he put the preaching and the right of the gopis in front of everyone for the common people. Seeing the Gopis in front of him, he said- ‘Gopis, no calamity has come in Vraj, what is the reason for coming here in the dark night? The family members must be looking for you, you should not stay here now. (Shriradhamadhav contemplation) respectively

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