विशिष्ट जी करते हैं – –
हे राम जो पुरुष प्रिय और अप्रिय को सुनकर ¡स्पर्श कर ¡देख कर ¡खाकर और सुधँकर न तो हर्षित होता है न खिन्न होता है |वह शांत कहा जाता है। जो प्रयत्न पुर्वक इन्द्रियों को अपने वश में करके हैं समस्त प्राणियों के साथ समानता पुर्ण व्यवहार करता है तथा न तो भविष्य की आकांक्षा करता है न प्राप्त का परित्याग करता है “शांत ” कहलाता है।जिसका मन ^मरण¬ उत्सव और युद्ध के अवसर पर भी व्याकुल ना हो कर चंद्र मंडल के समान निर्मल आभा से युक्त रहता है वह शांत कहा जाता है। हर्ष और कोप का अवसर उपस्थित होने पर भी जो पुरुष वहां अनुपस्थिति के समान न तो हंर्ष को प्राप्त होता है और नए क्रोध ही करता है बल्कि उसका मन गाढ निद्रा मे सोये हुए पुरुष के समान निर्विकार रहता है मैं शांत पद मे व्यवह्रत होता है। जिसकी अमर्त प्रवाह के सदृश सुखदायनी तथा प्रेम पूर्वक दृष्टि सभी प्राणियों पर पड़ती है उसकी शान्त सज्ञाँ होती है । जिस का अन्तःकारण शीतल हो गया है जिसकी बुध्दि मोहच्छन नहीं है तथा जो लोकिक विषयों के साथ व्यवहार करता हुआ भी उनमें आसक्त नहीं होता उसे लोग शांत कहते हैं । सम्यक प्रकार से व्यवहार करते हुए भी जिस पुरूष की बुद्धि आकाश के सदृश निर्विकार रहती है राग – द्वेष रुप कलन्क से लिप्त नहीं होती उसे शांत कहा जाता है ।।। योग विशिष्ट सर्ग १२ – – १३













