हे श्री राधे ! मैं आपसे ब्रह्मलोक पर्यन्त के नाशवान सुख एवं पाँचों प्रकार की मुक्तियों की कामना नहीं करता। मैं तो केवल निष्काम प्रेम ही चाहता हूँ। अपनी दासी की दासी की दासी की दासी ही मुझे बना दीजिए। श्रीराधे! मुझे अपने निज महल की सेवा प्रदान करना। व्रज-रस का एक बिन्दु ही मुझे प्रदान करना। तुम
किसी गोपी से मुझे गोपी-प्रेम दिला देना। मैं तुम्हारा नाम लेकर आँसू बहाया करूँ। मुझे ऐसा कब बनाओगी? निरन्तर तुम्हारा ही गुण-गान करती रहूँ। तुम्हारी छवि को ही हृदय मैं धारण कर लूँ। हे राधे! तुम अपनी रुचि में ही मेरी रुचि बना दो। मैं जिधर भी दृष्टि डालूँ तुम्हें ही देखूँ। तुम्हारे बिना मेरा जीवन जीवन न रहे। हे बरसाना धाम में निवास करने वाली वृषभानुनन्दिनी! मैं अच्छा हूँ अथवा बुरा हूँ,
जैसा भी हूँ तुम्हारा ही तो हूँ। नासिका में नथ एवं बुलाक धारण करने वाली ऊँचे महलों में रहने वाली राधे ! एकमात्र तुम ही मेरी थी, हो एवं सदा रहोगी। मैं तुम्हें कभी न भूलूँ और तुम भी मुझे कभी न भूलो। यद्यपि मैं जानता हूँ कि मैं अत्यन्त बुरा हूँ किंतु हूँ तो तुम्हारा ही। राधे ! मेरी तो गति तुम तक ही सीमित है। तुम ही मेरी बुद्धि को प्रेरित करने वाली हो तथा तुम ही मुझे श्रीकृष्ण विषयक रति प्रदान करोगी। तुम्हें छोड़कर यदि पतित-जनों के लिये कहीं अन्यत्र स्थान हो तो तुम्हीं बता दो। जगत में कुपुत्र तो देखे गये हैं किंतु माता तो कुमाता नहीं होती। हे रसिक- शेखर के प्रेम रंग में रंगी हुई,
दिव्य-गुण-गणों के कारण गर्वीली बनी हुई राधे। तुम ब्रज रस की वर्षा करने वाली हो। तुम्हारी सेवा करने वाले सभी भक्त जन तो अत्यन्त गुणवान हैं। मुझे गुणहीन को भी उनके मध्य स्थान दे दो। राधे! यदि बुरे न हों तो अच्छों का सम्मान कौन करेगा? मुझसे बुरा तुम्हें कहीं भी प्राप्त नहीं होगा
नित्य तुम्हारा ही गुणगान करू
- Tags: नित्य गुणगान, राधे मेरी स्वामिनी
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