मेरे मन की होली

मेरे मन की होली
वृंदावन की फागुन भरी सुबह थी। मंद-मंद हवा में गुलाल की खुशबू घुली हुई थी। मंदिरों की घंटियाँ बज रही थीं और भक्तों के स्वर में राधे-राधेकी मधुर ध्वनि गूँज रही थी।
आज कोई साधारण दिन नहीं था। आज वह दिन था जब स्वयं श्रीकृष्ण अपने प्रिय स्वरूप श्रीनाथ जी और करुणामय विठ्ठल देव के रूप में भक्तों के संग होली खेलने वाले थे।
मंदिर के प्रांगण में संत और संन्यासी एकत्र थे। कोई मृदंग बजा रहा था, कोई झांझ। सबकी आँखों में प्रतीक्षा थी—प्रभु के आगमन की। तभी शंखनाद हुआ।
श्रीनाथ जी प्रकट हुए—मोरपंख मुकुट, पीतांबर और अधरों पर मधुर मुस्कान। उनके एक हाथ में गुलाल था। दूसरी ओर विठ्ठल देव, कमर पर हाथ रखे, भक्तों को स्नेह भरी दृष्टि से निहार रहे थे।
एक वृद्ध संत आगे बढ़े। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा
प्रभु! आज हमारे मन की होली खेलिए। बाहर तो हर वर्ष रंग लगते हैं, पर भीतर का मन सूना रह जाता है।
श्रीकृष्ण मुस्कुराए।
उन्होंने संत के हृदय पर हल्के से गुलाल लगाया और बोले
जब प्रेम का रंग चढ़ जाता है, तब मन की होली अपने आप हो जाती है।
इतना सुनते ही वातावरण बदल गया। अबीर-गुलाल की वर्षा होने लगी। संतगण भजन गाने लगे—
आज बिरज में होली रे रसिया
विठ्ठल देव ने एक बाल-संन्यासी को रंग लगाया और कहा
भक्ति का रंग सबसे गाढ़ा होता है, इसे कोई धो नहीं सकता।
धीरे-धीरे सब भक्त रंगों में भीग गए। पर आश्चर्य! किसी के वस्त्रों का रंग फीका पड़ा, पर मन का रंग और गहरा होता गया।
एक युवा साधक मन ही मन सोच रहा था—
प्रभु, मेरे भीतर अभी भी अहंकार, क्रोध और द्वेष है।
तभी श्रीनाथ जी उसके पास आए। उन्होंने उसके माथे पर चंदन लगाया और कहा—
जिस दिन तुम इन भावों को त्याग दोगे, उसी दिन तुम्हारी सच्ची होली होगी।
युवा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने अनुभव किया कि आज सचमुच उसके मन में होली खिल उठी है।
संध्या होते-होते रंगों का उत्सव शांत हुआ, पर हृदयों में प्रेम का रंग अमिट हो गया।
उस दिन सबने जाना
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं,
यह मन को निर्मल करने का उत्सव है।
यह प्रेम का संदेश है।
यह भगवान और भक्त के मधुर मिलन का क्षण है।
और तभी से उस कथा का नाम पड़ा। मेरे मन की होली
जहाँ हर वर्ष फागुन में नहीं,
बल्कि हर दिन हृदय में प्रेम के रंग बरसते हैं।

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