गुरु कृपा होली के रंग

 जब गुरु मिले तो बरसाने की होली भीतर खिल उठी! 

ज़िंदगी की दौड़ में थका एक भक्त
मन में सवाल, आँखों में खोज, और हृदय में खालीपन लिए भटक रहा था।

तभी उसकी मुलाकात हुई एक सिद्ध गुरुदेव से 
शांत सरोवर के मध्य, एक विशाल गुलाबी कमल पर विराजमान।
चेहरे पर दिव्य आभा, नेत्रों में अथाह करुणा मानो मौन ही उपदेश दे रहा हो।

भक्त ने झुककर पूछा 
गुरुदेव, ईश्वर का प्रेम और सच्चा आनंद कहाँ मिलता है?

गुरु मुस्कुराए आँखें मूँदी
और अगले ही पल भक्त की चेतना बदल गई। 

 बरसाने की दिव्य होली

अचानक वह स्वयं को बरसाने की गलियों में खड़ा पाता है।
सामने महल की अटारी और वहाँ विराजमान स्वयं बिहारी जी!

ऊपर से राधा रानी सखियों संग रंगों की वर्षा कर रही हैं।
गुलाल उड़ रहा है
केसरिया पिचकारियाँ चल रही हैं। 
चारों ओर एक ही स्वर 
जय जय श्री राधे!

कान्हा कभी अटारी पर चढ़ते…
कभी सखियों के प्रेम भरे रंगों से बचते…
पर हार-जीत का कोई अर्थ नहीं —
क्योंकि वहाँ बस प्रेम था…
निर्मल, निष्कलंक, निर्भेद प्रेम। 

उस होली में कोई बड़ा-छोटा नहीं,
न अहंकार, न दूरी 
सिर्फ आनंद का सागर।

जब भक्त ने आँखें खोलीं,
वह फिर से गुरु चरणों में था।

गुरुदेव बोले 

वत्स, जो होली तुमने देखी… वह बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर है।
गुरु का ज्ञान उस कमल समान है जो संसार के शोर में भी शांति देता है।
और ठाकुर की लीला वे रंग हैं, जो जीवन को प्रेम से भर देते हैं।

भक्त समझ गया 
गुरु ही वह सीढ़ी हैं,
जो हमें बिहारी जी की अटारी तक पहुँचाती है। 

कहानी का सार 
गुरु हमें कमल की तरह स्थिर रहना सिखाते हैं।

भीतर की शांति ही सच्चा बरसाना है।

जब मन निर्मल हो जाए, तभी ईश्वर की होली का असली आनंद मिलता है।

 गुरु कृपा मिले तो जीवन खुद रंगों की लीला बन जाता है। 

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