आंखें बंद करके बैठ जाना, गंभीर चेहरा बनाना, दुनिया से कट जाना ध्यान नहीं कहलाता। असली ध्यान जीवन से भागना नहीं है बल्कि जीवन में पूरी तरह उतर जाना है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब तुम सोए हुए नहीं, जागे हुए हो। जीवन को दो हिस्सों में मत बांटो कि यह सांसारिक है और यह आध्यात्मिक। यह विभाजन ही बीमारी है।
जब तुम खाते हो, वह भी ध्यान हो सकता है। जब तुम हंसते हो, वह भी प्रार्थना हो सकती है। जब तुम प्रेम करते हो, वह भी आनंद का द्वार बन सकता है, अगर होश साथ हो। ध्यान का अर्थ है, जो भी करो, पूरे होश से करो। आधा अधुरा नहीं। मन कहीं और न भागे, स्वांसों के इसी कृत्य पर रहे। वर्तमान के इसी क्षण में जियो, जैसे यही सब कुछ है।
एक बार एक जिज्ञासु ने सच्चे गुरु से विनती की, मुझे ध्यान सिखाइए। सच्चे गुरु उसे अपने साथ लकड़ी काटने ले गये। दोनों लकड़ी काटने लगे। कुछ देर बाद जिज्ञासु बेचैन हो गया और बोला, यह ध्यान कैसे हुआ? सच्चे गुरु ने कहा, स्वांसों के इस क्षण मैं केवल लकड़ी काट रहा हूं, न अतीत है, न भविष्य। कुल्हाड़ी की आवाज, पसीने की बूंदें, सांस की लय, ये सब स्पष्ट है। यही ध्यान है।
जिज्ञासु ने पहली बार महसूस किया कि वह कभी पूरी तरह उपस्थित नहीं था। वह हमेशा या तो कल में था या आने वाले कल में। ध्यान का आनंद तब शुरू होता है जब तुम वर्तमान में लौट आते हो। हर क्षण नया है, हर क्षण ताजा है। मन पुराने बोझ उठाए घूमता है, इसलिए जीवन बासी लगने लगता है। जब तुम सच में जागते हो तो साधारण भी असाधारण हो जाता है।
एक कप चाय, एक हवा का झोंका, एक मुस्कान, सबमें रहस्य झलकने लगता है। गंभीर मत बनो, सजग बनो। जीवन को बोझ मत बनाओ, उसे उत्सव बनाओ। ध्यान कोई क्रिया नहीं है, ध्यान हृदय का एक स्वभाव है। वह तुम्हारे हर कर्म में उतर सकता है। जब चलना ध्यान बन जाए, जब बोलना प्रार्थना बन जाए, जब प्रेम जागरूकता बन जाए, तब जीवन साधारण नहीं रहता, तब स्वांसों के जीवन का हर पल शांति की खुशबू से महकता एक उत्सव बन जाता है।













