मोहन शान्त भाव में बैठा हुआ है जगदीश उसमे कैसे विचार डालना चाहता है। जगदीश उसमे विचार की झलक एक बार थोड़ी सी डालने का प्रयास करता है मोहन खुश होकर विचार को वंही झटक कर उठ जाता है जगदीश फिर उसी विचार को दोबारा डालने का प्रयास करता है शान्त बैठा मोहन कुछ भी नहीं सोचता है। फिर कुछ समय के बाद जगदीश उस को दर्शाता है मोहन नहीं जागता है कुछ नहीं सोचता है। मुस्करा देता है। जगदीश फिर विचार को और अच्छे से डालने का प्रयास करता है चार बार जगदीश मोहन की शांति को भंग करने का प्रयास करता है। अन्तिम बार जगदीश मोहन के मन विचार को प्रकट करने में सफल हो जाता है अन्तिम बार शान्त बैठे जगदीश में परिवर्तन होता है शान्त बैठा जगदीश सोचता है मोहन तुझे क्या दिखाना चाह रहा हैं। वह आपके शान्त मन की एकाग्रता को तोड़ना चाहता था। शान्त बैठा व्यक्ति कुछ समय सोचता है। अपने जीवन की दिशा को नया मोड़ दे देता है। अपने आप पर नाराज होता है तु इतना कमजोर क्यो पङ गया अवश्य ही तुझ से कुछ गलती हो रही है अपने आप को पढता है। वह आगे की और बढ जाता है जीवन में आपको मीठा बोलकर रूलाने वाले बहुत मिल जायेंगे। उस ओर नजर मत करना। कुछ समय के बाद शान्त बैठा व्यक्ति सतर्क हो जाता है। वह बात की गहराई को समझ जाता है। शान्त बैठा व्यक्ति एक पल विचार पर नजर डालता है फिर सोचता है यह विचार तुझे आने वाले समय को सचेत कर रहा है।शान्त बैठा व्यक्ति सचेत हो जाता है सतर्क है वह जानता तुझ पर वार होगा। हमे सचेत हर क्षण रहना चाहिए हम भीतर से सचेत हो मन से सचेत हो मन पर नजर टिका दे मन के विचारों को पढे। मन कैसे कार्य करता है जय श्री राम अनीता गर्ग













