My Only Lord is Giridhar Gopal मेरे तो गिरधर गोपाल


Human life is a blessing granted by God, and it is meant solely for attaining Him. Therefore, one should rise above all other pursuits and dedicate oneself to God. Whether one is old or young, everyone must sincerely turn towards Him. Perform worldly duties, but keep your ultimate aim focused on realizing the Divine.
In truth, only God is eternal. The world is temporary and constantly changing. If you observe your own life, you will see how your body has changed from birth until now. Everything in this world is perishable, but God remains unchanged forever. One must develop firm faith that God is ours and we belong to Him. Just as a child never doubts that their mother belongs to them, in the same way, one should never doubt their relationship with God.
All worldly possessions—wealth, property, relationships—will eventually be left behind. Even their memories will fade. Just as you do not remember your past life, in the same way, this life too will not remain in memory. Then why worry about what is destined to pass away? Truly, nothing in this world belongs to us; all relationships are temporary and will eventually separate.
Therefore, live with the conviction: “My only Lord is Giridhar Gopal; I belong to none else.” Let the world function as it will. Whether things improve or deteriorate, they are bound to change. Do not be concerned with it.
Do not dwell on your faults or sins. Instead, fix your attention only on God. When Vidurani offered banana peels to the Lord with pure love, He accepted them with joy. It was not the offering but the devotion that mattered.
Make God your own. Do not fear anyone or depend on anyone. Keep only one thought alive within: that God alone is yours. All relationships will end one day, so it is wise to detach from them even now. The world is like a dream—family, wealth, and possessions will all fade away.
Begin today. Live only for God. Whether others praise or criticize you should not matter. Remain joyful in your devotion. Do not cling to life or fear death. Let your only concern be your connection with God.
Nothing in this universe truly belongs to you—not even the smallest thing. Accept that only God is yours. Attend to the needs of the body simply and naturally, but do not become attached to it. Your true bond is only with the Divine.
God is present everywhere—within and without. Everything that exists is pervaded by Him. Call out to Him with sincerity: “O Lord, may I never forget You.”
When this realization dawns, life becomes filled with bliss. One understands that the individual self is nothing, and only God truly exists. There is no “I” and “mine,” only “You” and “Yours.” This is the state of complete joy—boundless, peaceful, and eternal.

मेरे तो गिरधर गोपाल मानव शरीर भगवान् की कृपा से मिला है और केवल भगवान्-की प्राप्ति के लिये मिला है। इसलिये सब काम छोड़कर भगवान् में लग जाना चाहिये। जिनकी उम्र ज्यादा हो गयी है, उनको तो भगवान् में लगना ही है, जिनकी उम्र छोटी है, उनको भी सच्चे हृदय से भगवान् में लगना है। संसार का सब काम कर देना है, पर अपना असली ध्येय, लक्ष्य, उद्देश्य केवल परमात्मा की प्राप्ति ही रखना है। वास्तव में सत्ता एक परमात्मा की ही है। संसार की तरफ आप ध्यान दें तो यह सब मिटने वाला है और निरन्तर मिट रहा है। आप अपनी तरफ देखें कि जब आप अपनी माँ के पेट से पैदा हुए, उस समय शरीर की कैसी अवस्था थी और आज कैसी अवस्था है। संसार निरन्तर बदलने वाला है और परमात्मा निरन्तर रहने वाले हैं। संसार रहने वाला है ही नहीं और परमात्मा बदलने वाले हैं ही नहीं। वे परमात्मा हमारे हैं और हम परमात्मा के हैं- इसमें दृढ़ता होनी चाहिये। जैसे छोटा बालक कहता है कि माँ मेरी है। उससे कोई पूछे कि माँ तेरी क्यों है, तो इसका उत्तर उसके पास नहीं है। उसके मन में यह शंका ही पैदा नहीं होती कि माँ मेरी क्यों है? माँ मेरी है, बस, इसमें उसको कोई सन्देह नहीं होता। इसी तरह आप भी सन्देह मत करो और यह बात दृढ़ता से मान लो कि भगवान् मेरे हैं। भगवान् के सिवाय और कोई मेरा नहीं है; क्योंकि वह सब छूटने वाला है। जिनके प्रति आप बहुत सावधान रहते हैं, वे रूपये, जमीन, मकान आदि सब छूट जायँगे। उनकी याद तक नहीं रहेगी। अगर याद रहने की रीति हो तो बतायें कि इस जन्म से पहले आप कहाँ थे? आपके माँ-बाप, स्त्री-पुत्र कौन थे? आपका घर कौन-सा था? जैसे पहले जन्म की याद नहीं है, ऐसे ही इस जन्म की भी याद नहीं रहेगी। जिसकी याद तक नहीं रहेगी, उसके लिये आप अकारण परेशान हो रहे हो। यह सबके अनुभव की बात है कि हमारा कोई नहीं है! यह सब मिले हैं और बिछुड़ जायँगे। इसलिये ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ -ऐसा मानकर मस्त हो जाओ। संसार का काम बिगड़ रहा है तो बिगड़ने दो। वह तो बिगड़ने वाला ही है। सुधर जाय तो भी बिगड़ेगा। उसकी चिन्ता मत करो। आरम्भ में थोड़ा-सा बिगड़ेगा, परन्तु पीछे बहुत बढ़िया हो जायगा। दुनिया सब-की-सब चली जाय तो परवाह नहीं है। मैं और भगवान-इन दो के सिवाय और कोई नहीं है। मैं केवल भगवान् का हूँ और केवल भगवान् मेरे हैं- इसके सिवाय और किसी बात की तरफ देखो ही मत, विचार ही मत करो। एक परमात्मा ही सब जगह परिपूर्ण हैं। उनके सिवाय और कोई है नहीं, कोई हुआ नहीं, कोई होगा नहीं, कोई हो सकता नहीं। वे परमात्मा ही मेरे हैं- ऐसा मानकर मस्त हो जाओ, प्रसन्न हो जाओ। हम अच्छे हैं कि मन्दे हैं, इसकी फिक्र मत करो। जैसे भरत जी महाराज चित्रकूट जाते हुए माँ कैकेयी की तरफ देखते हैं तो उनके पैर पीछे पड़ते हैं, और अपनी तरफ देखते हैं तो खड़े रहते हैं, पर जब रघुनाथ जी महाराज की तरफ देखते हैं तो दौड़ पड़ते हैं- जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥ ऐसे ही आप अपनी करनी की तरफ मत देखो, अपने पापों की तरफ मत देखो, केवल भगवान की तरफ देखो। जैसे विदुरानी भगवान् को छिलका देती हैं तो भगवान् छिलका ही खाते हैं। छिलका खाने में भगवान् को जो आनन्द आता है, वैसा आनन्द गिरी खाने में नहीं आता। कारण कि विदुरानी के मन में यह भाव है कि भगवान् मेरे हैं। जैसे बच्चे को भूखा देखकर माँ जिस भाव से उनको खिलाती है, उससे भी विशेष भाव विदुरानी में है। ऐसे ही आप भगवान को अपना मान लो। जीने-मरने आदि किसी की भी परवाह मत करो। किसी से डरो मत। किसी की भी गर्ज करने की जरूरत नहीं। बस, एक ही विचार रखो कि ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’। अगर यह विचार कर लोगे तो निहाल हो जाओगे। परन्तु बहुत धन कमा लो, बहुत सैर-शौकीनी कर लो, बहुत मान-बड़ाई प्राप्त कर लो तो यह सब कुछ काम नहीं आयेगा। सपना-सा हो जावसी, सुत कुटुम्ब धन धाम, हो सचेत बलदेव नींद से, जप ईश्वर का नाम। मनुष्य तन फिर फिर नहिं होई, किया शुभ कर्म नहीं कोई, उम्र सब गफलत में खोई। अब आज से भगवान के होकर रहो। कोई क्या कर रहा है, भगवान् जानें। हमें मतलब नहीं है। सब संसार नाराज हो जाय तो परवाह नहीं, पर भगवान् मेरे हैं- इस बात को छोड़ो मत। मीराबाई को जँच गयी कि अब मैं भगवान् से दूर होकर नहीं रह सकती- ‘मिल बिछुड़न मत कीजै’ तो उनका डेढ़-दो मन का थैला शरीर भी नहीं मिला, भगवान में समा गया। एक ठाकुर जी के सिवाय किसी से कोई मतलब नहीं है। अंतहुँ तोहिं तजैंगे पामर! तू न तजै अबही ते। अन्त में तुझे सब छोड़ देंगे, कोई तुम्हारा नहीं रहेगा तो फिर पहले से ही छोड़ दे। साधु विचारकर भली समझया, दिवी जगत को पूठ। पीछे देखी बिगड़ती, पहले बैठा रूठ॥ पीछे तो सब बिगड़ेगी ही, फिर अपना काम बिगाड़कर बात बिगड़े तो क्या लाभ? अपने तो अभी-अभी भगवान के हो जाओ। तुम तुम्हारे, हम हमारे। हमारा कोई नहीं, हम किसी के नहीं, केवल भगवान हमारे हैं, हम भगवान के हैं। भगवान् के चरणों की शरण होकर मस्त हो जाओ। कौन राजी है, कौन नाराज; कौन मेरा है, कौन पराया, इसकी परवाह मत करो। वे निन्दा करें या प्रशंसा करें; तिरस्कार करें या सत्कार करें, उनकी मरजी। हमें निन्दा-प्रशंसा, तिरस्कार-सत्कार से कोई मतलब नहीं। सब राजी हो जायँ तो हमें क्या मतलब और सब नाराज हो जायँ तो हमें क्या मतलब? केवल एक भगवान मेरे हैं- इससे बढ़कर न यज्ञ है, न तप है, न दान है, न तीर्थ है, न विद्या है, न कोई बढ़िया बात है। इसलिये भगवान् को अपना मानते हुए हरदम प्रसन्न रहो। न जीने की इच्छा हो, न मरने की इच्छा हो। न जाने की इच्छा हो, न रहने की इच्छा हो। एक भगवान् से मतलब हो। एक भगवान् के सिवाय मेरा और कोई है ही नहीं। अनन्त ब्रह्माण्डों में केश जितनी अथवा तिनके जितनी चीज भी अपनी नहीं है। हमारा कुछ है ही नहीं, हमारा कुछ था ही नहीं, हमारा कुछ होगा ही नहीं, हमारा कुछ हो सकता ही नहीं। इसलिये एक भगवान् को अपना मान लो तो निहाल हो जाओगे। भगवान् के सिवाय किसी से स्वप्न में भी मतलब नहीं। किसी की गुलामी करने की जरूरत नहीं। हमें किसी से क्या लेना है और क्या देना है। हमारे जो सम्बन्धी हैं, उनका कितने दिन का साथ है। ‘सपना-सा हो जावसी, सुत कुटुम्ब धन धाम’! स्वप्न तो याद रहता है, पर उनकी याद भी नहीं रहेगी। जैसे स्वप्न को नापसन्द कर देते हो तो उसको भूल जाते हो, ऐसे ही संसार को नापसंद कर दो तो उसको भूल जाओगे। संसार में यह आदमी ठीक है, यह बेठीक है; ऐसा हो जाय, ऐसा नहीं हो- यह केवल मोह है। मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है- ‘मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला’ ठीक हो या बेठीक, हमें क्या मतलब? दूसरे ही हमारी गरज करेंगे, हमें किसी की क्या गरज? संसार के आदमियों से हमें क्या मतलब? बस, एक ही बात याद रखो- ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरों न कोई’। प्यास लगे तो पानी पी लिया, भूख लगे तो रोटी खा ली, ठण्ड लगे तो कपड़ा ओढ़ लिया, नहीं मिले तो नहीं सही! शरीर जाय तो अच्छी बात, रहे तो अच्छी बात, अपना कोई मतलब नहीं। न शरीर के रहने से कोई मतलब, न शरीर जाने से कोई मतलब। हमारा मतलब केवल भगवान् से है। केवल भगवान् हमारे हैं, हम भगवान् के हैं- ऐसा सोचकर मस्त हो जाओ, आनन्द में हो जाओ, नाच उठो कि आज हमें पता चल गया, आज तो मौज हो गयी! अब हम किसी की गुलामी नहीं करेंगे। ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर सब जगह एक परमात्मा ही हैं- बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। यच्च किंचितज्जगत्यस्मिन्दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥ वह परमात्मा नजदीक-से-नजदीक है, दूर-से-दूर है, बाहर-से-बाहर है, भीतर-से-भीतर है। एक परमात्मा - ही - परमात्मा है और वह अपना है- ऐसा सोचकर मस्त हो जाओ। कोई आये तो परमात्मा है, कोई जाय तो परमात्मा है। कोई कुछ करे, परमात्मा-ही-परमात्मा है। उस परमात्मा को पुकारो कि ‘हे नाथ! हे मेरे नाथ! मैं आपको भूलूँ नहीं।’ आपका जन्म सफल हो जायगा! यह कितनी बढ़िया बात है! कितनी ऊँची बात है! कितनी सच्ची बात है! कितनी निर्मल बात है! कोई क्या करता है, यह आप मत देखो। हमें उससे क्या मतलब है? तेरे भावै कछु करौ, भलो बुरो संसार। ‘नारायन’ तू बैठि के, अपनौ भवन बुहार॥ हमारा मतलब केवल भगवान् से है। हम अच्छे हैं तो उनके हैं, बुरे हैं तो उनके हैं- जौ हम भले बुरे तौ तेरे। तुम्हैं हमारी लाज-बड़ाई, बिनती सुनि प्रभु मेरे॥ संसार में तो एक तिनका भी हमारा नहीं रहेगा, नहीं रहेगा, नहीं रहेगा। अपना है ही नहीं तो कैसे रहेगा? संसार का प्रतिक्षण आपसे वियोग हो रहा है। जन्म लेने के बाद जितने वर्ष बीत गये, उतने वर्ष तो आप मर ही गये और बाकी जो दिन बचे हैं, वे भी जाने वाले हैं। एक भगवान् के सिवाय अपना कुछ नहीं है। इसलिये भगवान् को पुकारो कि हे प्रभो! हे मेरे प्रभो! मेरा कोई नहीं है, केवल आप ही मेरे हो, और कोई मेरा नहीं है। फिर मौज हो जायगी, आनन्द हो जायगा! मेरे तो भगवान् हैं- इस बात को लेकर नाचने लग जाओ, कूदने लग जाओ कि आज हमारा काम हो गया! सब कुछ भगवान के चरणों में अर्पण कर दो। स्वप्न में भी किसी की गुलामी मत करो। हृदय से गुलामी निकाल दो। नाचने लग जाओ कि बस, आज तो हम निहाल हो गये! कोई पूछे कि अरे! क्या मिल गया? तो कहो कि जो मिलना चाहिये था, वह मिल गया। वह परमात्मा स्वतः सबको मिला हुआ है, सबके भीतर विराजमान है। वह हमारा अपना है। और किसी से हमें कोई गरज नहीं, किसी की आवश्यकता नहीं, किसी की परवाह नहीं। कोई राजी रहे तो मौज, नाराज हो जाय तो मौज। हम किसी को दुःख नहीं देते, किसी के विरुद्ध कुछ करते नहीं, स्वप्न में भी किसी का अहित नहीं चाहते, फिर कोई राजी रहे या नाराज, यह उसकी मरजी। हमारा किसी से कोई मतलब नहीं। भगवान मेरे हैं- इसके समान कोई बात है नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं। इस बात का हमें पता लग गया तो अब मौज हो गयी। इतने दिन दूसरों की गुलामी करके मुफ्त में दुःख पाया। अब हम सबको प्रणाम करते हैं। सभी श्रेष्ठ हैं, पर हमें उनसे मतलब नहीं। हमें केवल भगवान से ही मतलब है। परन्तु भगवान से भी हमें कुछ लेना नहीं है, कोई गरज नहीं करनी है। ढूँढा सब जहाँ में, पाया पता तेरा नहीं। जब पता तेरा लगा, अब पता मेरा नहीं॥ वास्तव में मैं है ही नहीं, केवल तू-ही-तू है। छोटा-बड़ा, अच्छा-मन्दा सब तू-ही-तू है। अब हमें असली चीज मिल गयी। आज पता लग गया कि तू ही है, मैं हूँ ही नहीं। न मैं है, न मेरा है। केवल तू है और तेरा है। अब आनन्द-ही-आनन्द है! पूर्ण आनन्द, अपार आनन्द, सम आनन्द, शान्त आनन्द, घन आनन्द, अचल आनन्द, बाहर आनन्द, भीतर आनन्द, केवल आनन्द-ही-आनन्द!English

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