नाम और रूप

नाम और रूप दोनों का बहुत महत्व है। पहले हम रूप से जुङते है। जो रूप हमारे दिल पर दस्तक दे देता है। भगवान कृष्ण भगवान राम के जिस रूप में हम बह जाते हैं भगवान को बार बार निहारते हैं। एक भक्त रूप को देखते रूप में खो जाती हूं । घटना क्षण भर मे घटित हो जाती है हृदय स्वामी भगवान नाथ का बनते ही भक्त संसार से ऊपर उठ जाता है। भक्त के हदय में भगवान समा जाते हैं। तब नयन भगवान मे ढुब जाते हैं। भगवान को निहारता है जितना निहारता है तङफ बढती जाती है। फिर भगवान को निहारता है सुबह शाम भगवान को दो दो तीन घंटे चुपके से निहारता कभी किसी को पता न चल जाए। भगवान भक्त के प्राण आधार बन जाते हैं बार बार नाम लेता हैं। वन्दन करता है घर के किसी सदस्य को पता न चले कि मैं भगवान को निहार रही हूं भगवान से बात कर रही हूं भगवान राम का रूप दिल को भा जाता है रूप को निहारते हुए रूप पर दिल आ जाता है। रूप दिल में समा जाता है।तब दो दो तीन घंटे एक टक निहारता है भगवान से बात करता है देखता ही जाता है भगवान के सामने से हटना नहीं चाहता है। जिस समय रूप दिल में समा जाता है तब भक्त रुप को दिल मे बिठा लेता है। दिल मे भगवान राम को बिठाते ही भगवान राम मेरे अराध्य बन गए। दिल अपने अराध्य का बन जाता है तब दिल में अराध्य की झंकार समा जाती है दिल भगवान के नाम और रूप के साथ इतनी गहराई से जुड़ जाते हैं। कभी भगवान राम को दिल ही दिल में निहारती,निहारते हुए नमन और वन्दन करतीं भगवान राम को हर पल प्रणाम करते हुए सांस सांस राम नाम की रटना लगाती।भगवान नाम की ऐसी महीमा है भगवान का नाम और रूप भक्त के हृदय में प्रेम प्रकट कर देता है। भगवान को देखते देखते बात करते हुए कभी नमन करती कभी धीरे से शीश नवा देती फिर निहारती। प्रभु भगवान राम में खो जाने का दिल करता। पुरणत दर्शन की अभिलाषा जग जाती है कब मै रूप से भी अधिक नाम हमारे दिल पर दस्तक देता है।हम उठते बैठते सोते जागते खाते हुए नाम के साथ जुड़े रहते हैं।राम नाम भजते भजते भक्त रूप से ऊपर उठ जाता है। हर क्षण हम रूप से नहीं नाम से जुड़ सकते हैं। दिल मे दर्शन की तङफ जिस दिन जागृत होती है। तब भक्त भगवान की खोज में रात दिन एक कर देता है। खाना और सोना गौण हो जाता है। उसके दिल की एक ही तमन्ना होती है कि किस प्रकार मेरे स्वामी भगवान् नाथ को ध्यालु ।ऐसे भक्त नियमों से उपर उठ जाते हैं। उनका एक ही नियम होता है कि हर किरया कर्म में हर क्षण प्रभु प्राण नाथ का चिन्तन मनन वन्दन ध्यान चलता रहता है। भगवान को ध्याते हुए हमे बाहरी दिखावे की आवश्यकता नहीं है। भगवान से प्रेम करने वाले भगवान को माला के मनके में न बाधंकर मनके मणके में बाधंते है। एक बार भगवान को मनके मणके से भजने लगता है तब वह मनका कभी रूकता नहीं है। मनके मणके को भक्त हर क्षण याद करता है।दिल प्रभु प्रेम में खो जाता है। जल पी रहा है जल पीते हुए अन्दर से अवाज आती है कि देखु भगवान का नाम चल रहा है। अन्दर राम राम की ध्वनि सुनाई देती है। तब भगवान को भजते भजते जल पीता है। भोजन कर रही हूं अन्तर्मन में झांकती क्या प्रभु प्राण नाथ की स्तुति हो रही है। या भोजन के स्वाद के अधीन है अन्तर्मन से स्तुति करती भगवान की लीलाओं का ध्यान धरते हुए भाव विभोर हो जाती ।फिर प्रभु प्राण नाथ से प्रार्थना करते हुए कहती, हे स्वामी भगवान् नाथ हे दीनदयाल हे परब्रह्म परमेश्वर ये स्तुति करवाने वाले भी मेरे स्वामी आप ही हो। हे मेरे भगवान ये तन मन आत्मा के स्वामी आप ही हो। भोजन में भी परम तत्व परमात्मा का निवास है। और ये भोजन भी तुम ही ग्रहण करते हो। ऊपरी परत पर मै और मेरापन है हृदय में तुम ही तुम हो ।हे परम पिता परमात्मा मै तुम्हारी पुरण स्तुति नहीं कर पाती हूँ। हे प्रभु तुम मुझे कब दर्शन दोगे ।ऐसे कभी दर्शन की पुकार करती और कभी आनंदीत होती। भोजन करते हुए भी भोजन के अधिन नहीं होती ।परमात्मा का चिन्तन करते हुए रुखा सुखा नमक डला हुआ चाहे न डला हुआ हो तब भी भोजन पुरण स्वादिष्ट है। घर में गृहस्थ धर्म निभाते हुए भोजन बहुत सावधानी से भगवान को सिमरण करते हुए सामने वाले की ईच्छा के अनुरूप भोजन बनाती हूं। भक्त के पास भगवान बार बार लीला करने आते हैं। भगवान नाम में समर्पण भाव की जागृति है। समर्पण भाव का अर्थ है भक्त जब भी कुछ भी कर्म करता है कर्म मे और भगवान के भाव दोनों भाव में समर्पित भाव की जागृति है। नाम भगवान को दिल में बिठाने पर भक्त भाव में आ जाते हैं। भक्त का दिल कहता है अब मेरे प्राण प्रिय आएगे। इन सब भाव में भक्त बार बार अन्तर्मन में झांक कर देखता है तुझ में कितनी दृढ़ता है तेरी पुकार में दिल की पुकार है या नहीं, अपने आप में खोज करना ही भक्ति है।

घर पर अतिथि के आगमन पर जब भोजन बनाती भोजन बनाते बनाते हुए दिल कहता आज ईश्वर आ रहे हैं। हृदय में प्रेम समा जाता प्रभु भगवान नाथ के नाम का चिन्तन करते हुए भोजन बनता दिल भगवान नाथ मे लीन कभी श्री हरि को प्रणाम करती तब कभी नाम भगवान को याद करते हुए प्रभु भगवान नाथ के आने की प्रतीक्षा में नाचती सज कर तैयार होती जैसे अभी भगवान आएगे। अतिथि में भगवान का निवास है अतिथि के रूप में श्री हरि आ रहे हैं। भाव सुन्दर सज जाते नैनो में नुर समा जाता। फिर भगवान नाथ के आगे नतमस्तक हो जाती मेरे प्रभु प्राण नाथ प्यारे कब मिलन की बेला आएगी। दिल को धीरज कैसे बंधाऊ। ऐसे भोजन भोग बन जाता प्रभु प्राण नाथ मे खोई हर घङी युग के समान बीतती नैनो में नीर छलकता। दिल की धड़कन बढ जाती हाथ से जल्दी से कार्य करती दिल की दशा को दिल के स्वामी ही जानते हैं तिरछी दृष्टि से प्रभु दिल के तार झनकारते। मै देखती एक अद्भुत प्रकाश की किरणें किचन में बन रही है ये किरणें दिल को आनन्दित करती है किरणों की चमक कहती स्वामी आए और सांसो में खुशबू भरकर चले गए। नाम की रटना में प्रभु प्राण नाथ रीझ जाते हैं। सारांश भाव में भोजन बनाते हुए भोजन करते हुए के बहुत से भाव है भक्त जब तक तीन चार घंटे प्रभु नाम विनती स्तुति में लीन नहीं होता है तब तक भगवान के भाव बनते नही है। एक गृहस्थ के पास घंटों बैठकर पुजा करने के लिए समय नहीं है। सुबह उठते ही गृहणी घर के कार्य में लग जाती है। मैंने भगवान को घर का कार्य करते हुए चिन्तन मनन सिमरन और वन्दन किया है। हम भोजन बनाते हैं तब भाव की गहराई और अग्नि देव के नजदीक होते हैं भक्त का भोजन बनाने में यज्ञ समाया हुआ है। भक्त कुछ भी नहीं करता है भक्त का भगवान् नाथ सबकुछ करता है ।जय श्री राम अनीता गर्ग

नाम और रूप दोनों का बहुत महत्व है। पहले हम रूप से जुङते है। जो रूप हमारे दिल पर दस्तक दे देता है। भगवान कृष्ण भगवान राम के जिस रूप में हम बह जाते हैं भगवान को बार बार निहारते हैं। एक भक्त रूप को देखते रूप में खो जाती हूं । घटना क्षण भर मे घटित हो जाती है हृदय स्वामी भगवान नाथ का बनते ही भक्त संसार से ऊपर उठ जाता है। भक्त के हदय में भगवान समा जाते हैं। तब नयन भगवान मे ढुब जाते हैं। भगवान को निहारता है जितना निहारता है तङफ बढती जाती है। फिर भगवान को निहारता है सुबह शाम भगवान को दो दो तीन घंटे चुपके से निहारता कभी किसी को पता न चल जाए। भगवान भक्त के प्राण आधार बन जाते हैं बार बार नाम लेता हैं। वन्दन करता है घर के किसी सदस्य को पता न चले कि मैं भगवान को निहार रही हूं भगवान से बात कर रही हूं भगवान राम का रूप दिल को भा जाता है रूप को निहारते हुए रूप पर दिल आ जाता है। रूप दिल में समा जाता है।तब दो दो तीन घंटे एक टक निहारता है भगवान से बात करता है देखता ही जाता है भगवान के सामने से हटना नहीं चाहता है। जिस समय रूप दिल में समा जाता है तब भक्त रुप को दिल मे बिठा लेता है। दिल मे भगवान राम को बिठाते ही भगवान राम मेरे अराध्य बन गए। दिल अपने अराध्य का बन जाता है तब दिल में अराध्य की झंकार समा जाती है दिल भगवान के नाम और रूप के साथ इतनी गहराई से जुड़ जाते हैं। कभी भगवान राम को दिल ही दिल में निहारती,निहारते हुए नमन और वन्दन करतीं भगवान राम को हर पल प्रणाम करते हुए सांस सांस राम नाम की रटना लगाती।भगवान नाम की ऐसी महीमा है भगवान का नाम और रूप भक्त के हृदय में प्रेम प्रकट कर देता है। भगवान को देखते देखते बात करते हुए कभी नमन करती कभी धीरे से शीश नवा देती फिर निहारती। प्रभु भगवान राम में खो जाने का दिल करता। पुरणत दर्शन की अभिलाषा जग जाती है कब मै रूप से भी अधिक नाम हमारे दिल पर दस्तक देता है।हम उठते बैठते सोते जागते खाते हुए नाम के साथ जुड़े रहते हैं।राम नाम भजते भजते भक्त रूप से ऊपर उठ जाता है। हर क्षण हम रूप से नहीं नाम से जुड़ सकते हैं। दिल मे दर्शन की तङफ जिस दिन जागृत होती है। तब भक्त भगवान की खोज में रात दिन एक कर देता है। खाना और सोना गौण हो जाता है। उसके दिल की एक ही तमन्ना होती है कि किस प्रकार मेरे स्वामी भगवान् नाथ को ध्यालु ।ऐसे भक्त नियमों से उपर उठ जाते हैं। उनका एक ही नियम होता है कि हर किरया कर्म में हर क्षण प्रभु प्राण नाथ का चिन्तन मनन वन्दन ध्यान चलता रहता है। भगवान को ध्याते हुए हमे बाहरी दिखावे की आवश्यकता नहीं है। भगवान से प्रेम करने वाले भगवान को माला के मनके में न बाधंकर मनके मणके में बाधंते है। एक बार भगवान को मनके मणके से भजने लगता है तब वह मनका कभी रूकता नहीं है। मनके मणके को भक्त हर क्षण याद करता है।दिल प्रभु प्रेम में खो जाता है। जल पी रहा है जल पीते हुए अन्दर से अवाज आती है कि देखु भगवान का नाम चल रहा है। अन्दर राम राम की ध्वनि सुनाई देती है। तब भगवान को भजते भजते जल पीता है। भोजन कर रही हूं अन्तर्मन में झांकती क्या प्रभु प्राण नाथ की स्तुति हो रही है। या भोजन के स्वाद के अधीन है अन्तर्मन से स्तुति करती भगवान की लीलाओं का ध्यान धरते हुए भाव विभोर हो जाती ।फिर प्रभु प्राण नाथ से प्रार्थना करते हुए कहती, हे स्वामी भगवान् नाथ हे दीनदयाल हे परब्रह्म परमेश्वर ये स्तुति करवाने वाले भी मेरे स्वामी आप ही हो। हे मेरे भगवान ये तन मन आत्मा के स्वामी आप ही हो। भोजन में भी परम तत्व परमात्मा का निवास है। और ये भोजन भी तुम ही ग्रहण करते हो। ऊपरी परत पर मै और मेरापन है हृदय में तुम ही तुम हो ।हे परम पिता परमात्मा मै तुम्हारी पुरण स्तुति नहीं कर पाती हूँ। हे प्रभु तुम मुझे कब दर्शन दोगे ।ऐसे कभी दर्शन की पुकार करती और कभी आनंदीत होती। भोजन करते हुए भी भोजन के अधिन नहीं होती ।परमात्मा का चिन्तन करते हुए रुखा सुखा नमक डला हुआ चाहे न डला हुआ हो तब भी भोजन पुरण स्वादिष्ट है। घर में गृहस्थ धर्म निभाते हुए भोजन बहुत सावधानी से भगवान को सिमरण करते हुए सामने वाले की ईच्छा के अनुरूप भोजन बनाती हूं। भक्त के पास भगवान बार बार लीला करने आते हैं। भगवान नाम में समर्पण भाव की जागृति है। समर्पण भाव का अर्थ है भक्त जब भी कुछ भी कर्म करता है कर्म मे और भगवान के भाव दोनों भाव में समर्पित भाव की जागृति है। नाम भगवान को दिल में बिठाने पर भक्त भाव में आ जाते हैं। भक्त का दिल कहता है अब मेरे प्राण प्रिय आएगे। इन सब भाव में भक्त बार बार अन्तर्मन में झांक कर देखता है तुझ में कितनी दृढ़ता है तेरी पुकार में दिल की पुकार है या नहीं, अपने आप में खोज करना ही भक्ति है।

When guests arrive at home, when she is preparing food, her heart says, God is coming today. Love gets absorbed in the heart, food is prepared while thinking about the name of Lord Nath, the heart is engrossed in Lord Nath, sometimes she salutes Shri Hari, sometimes remembering the name of Lord, she dances and waits for the arrival of Lord Nath, gets dressed up as if God will come now. God resides in the guest. Shri Hari is coming as a guest. The expressions would have been beautifully decorated and the beauty would have been absorbed in the eyes. Then she would bow before Lord Nath, my dear Lord Pran Nath, when will the time of meeting come? How to give patience to the heart? In this way, food would become an offering, every hour lost in the Lord’s life would flow like an era, with tears in its eyes. The heart beat increases, hands work quickly, only the master of the heart knows the condition of the heart, the Lord makes the heart strings jingle with a sideways glance. I see rays of a wonderful light being created in the kitchen. These rays make the heart happy. Swami came saying the glow of the rays and left with fragrance in his breath. Prabhu Pran Nath gets engrossed in memorizing the name. In summary, there are many expressions while preparing food and eating. Unless the devotee is absorbed in praying and praising the name of the Lord for three to four hours, the feelings of God are not formed. A householder does not have time to sit for hours and do puja. As soon as the housewife wakes up in the morning, she starts doing household work. I have meditated, meditated and worshiped God while doing household work. When we cook food, we feel deep in our feelings and are close to the fire god. Yagya is involved in preparing food for the devotee. The devotee does nothing, the devotee’s Lord Nath does everything. Jai Shri Ram Anita Garg

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