The Complete Sacred, Nectar-like and Inspiring Life of Srila Raghunath Bhatta Goswami


The Divine Personality of Srimad Bhagavatam and the Incarnation of ‘Raga Manjari’
The Complete Sacred, Nectar-like and Inspiring Life of Srila Raghunath Bhatta Goswami
Jai Shri Radhe!
A heartfelt welcome to all the wise, faithful, and rasik devotees of Bhagavan on the ‘Shri Dham Vrindavan’ page in this extremely sacred, knowledge-enhancing, and devotional series.
Whenever we remember among the Six Goswamis of the Gaudiya Vaishnava tradition such a paramhansa, pure-hearted, and rasik saint—
who never listened to criticism of anyone,
who did not seek fame by writing great books,
yet whose entire life became a living embodiment of Srimad Bhagavatam—
then with deep reverence and love, the name of Srila Raghunath Bhatta Goswami arises in the heart.
The sweetness of his Bhagavatam recitation was so deep, so gentle, and so heart-melting that even great rasacharyas like Srila Rupa Goswami would drown in tears while hearing him. Every moment of his life was filled with service, hearing, kirtan, Vaishnava dedication, divine rasa, and pure simplicity.
Let us now hear and contemplate the divine life of this great acharya, worshipped as the intimate maidservant of Goloka Vrindavan—Shri Raga Manjari.
 Divine Appearance and the Pious Family of Shri Tapan Mishra 
Srila Raghunath Bhatta Goswami appeared in the early 16th century in a highly pious, learned, and Vaishnava Brahmin family. His father, Shri Tapan Mishra, was an intimate associate of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
Following Mahaprabhu’s instruction, Tapan Mishra resided in Kashi (Varanasi), where Raghunath Bhatta was raised. His birth was not ordinary—it was the descent of a soul destined to spread the living nectar of Srimad Bhagavatam.
Mahaprabhu’s Arrival in Kashi and the Service of Young Raghunath
When Sri Chaitanya Mahaprabhu came to Kashi, He stayed at the homes of Tapan Mishra and Chandrashekhar. At that time, Raghunath was just a child, yet deeply endowed with devotional impressions.
He served Mahaprabhu with great love and humility, and accepted His maha-prasad with deep devotion. Seeing such sincerity, Mahaprabhu became very pleased.
This was not ordinary service—it was the awakening of divine love within his soul.
First Journey to Jagannath Puri and Divine Instructions
In his youth, Raghunath Bhatta traveled on foot to Jagannath Puri to see Mahaprabhu. He stayed there for about eight months, serving Him with devotion, especially through cooking.
Before sending him back, Mahaprabhu gave him important instructions:
Remain unmarried and follow celibacy.
Serve your elderly parents with devotion.
Study and hear Srimad Bhagavatam from pure devotees.
Stay absorbed in Harinam and bhakti.
He followed these instructions throughout his life.
Gift of Tulsi Mala and Prasadam 
Mahaprabhu blessed him with a Tulsi mala from Lord Jagannath and His own tambul prasadam. Raghunath Bhatta preserved them throughout his life with deep reverence.
Service to Parents and Return to Puri 
He served his parents for four years with great dedication. After their departure, he returned to Puri and later was instructed to go to Vrindavan and serve under Rupa and Sanatan Goswami.
Life in Vrindavan and Bhagavatam Recitation
In Vrindavan, he fully surrendered himself. His voice was extremely sweet. While reciting Bhagavatam, he would sing each verse melodiously, often becoming overwhelmed with divine emotion and shedding tears.
He did not just speak Bhagavatam—he lived it.
Freedom from Criticism
He never tolerated Vaishnava criticism. He saw only the good in others. Because of this, he was known as Ajatashatru—one who has no enemies.
Service to Shri Govind Dev Ji.
Though personally renounced, he inspired his disciple Ramdas Kapoor to serve Lord Govind Dev with wealth and devotion. He offered ornaments like a golden flute and earrings.
True renunciation means giving everything for Bhagavan.
Identity as Raga Manjari 
According to Gaudiya texts, he is the incarnation of Shri Raga Manjari. His devotion reflected the highest, most intimate spiritual mood.
Final Pastimes After spending his life in Vrindavan immersed in Bhagavatam and devotion, he entered the eternal pastimes of the Lord.
Conclusion
His life teaches that bhakti is not about fame or scholarship. It is about:
Living the teachings of Bhagavatam.
Immersing in Harinam.
Serving devotees.
Avoiding criticism.
One who becomes Bhagavatam through hearing is the true devotee.
Jai Jai Srila Raghunath Bhatta Goswami Ji!
Jai Shri Radhe! Jai Shri Vrindavan Dham!

श्रीमद्भागवत के स्वरूप और ‘राग-मंजरी’ के अवतार
श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी का सम्पूर्ण पावन, रसपूर्ण और प्रेरणादायी चरित्र
जय श्री राधे!

‘श्री धाम वृंदावन’ पेज के सभी सुधी, श्रद्धावान और रसिक भगवद्भक्तों का आज की इस अत्यंत पावन, ज्ञानवर्धक और भावमयी शृंखला में हृदय से स्वागत है।गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के षड्गोस्वामियों में जब भी किसी ऐसे परमहंस,

निर्मल-हृदय, रसिक संत का स्मरण होता है—

जिसने कभी किसी की निंदा नहीं सुनी,

जिसने स्वयं कोई बड़ा ग्रंथ लिखकर प्रसिद्धि प्राप्त नहीं की,

किन्तु जिसका संपूर्ण जीवन ही ‘श्रीमद्भागवत’ का चलता-फिरता मूर्त स्वरूप बन गया—तब अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी का नाम हृदय में उदित होता है।इनकी भागवत-कथा का स्वर इतना मधुर, इतना कोमल, इतना हृदय-विदारक प्रेममय था कि उसे सुनकर स्वयं श्री रूप गोस्वामी जी जैसे रसाचार्य भी अश्रु-सागर में डूब जाते थे। इनके जीवन का प्रत्येक क्षण सेवा, श्रवण, कीर्तन, वैष्णव-निष्ठा, भगवत-रस और निष्कपट सरलता से ओतप्रोत था।आइए, नित्य गोलोक वृंदावन की परम अंतरंग सेविका ‘श्री राग-मंजरी’ के रूप में पूजित इस महान आचार्य के अलौकिक एवं पावन चरित्र का भक्तिभाव से श्रवण-मनन करें।

अलौकिक प्राकट्य और श्री तपन मिश्र जी का पावन परिवार

श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी का प्राकट्य 16वीं शताब्दी के प्रारंभ में एक अत्यंत पवित्र, विद्वान और वैष्णव ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता श्री तपन मिश्र जी प्रेमावतार श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यंत अंतरंग भक्तों में से थे। वे उच्चकोटि के विद्वान, विनम्र, भगवद्भक्त और महाप्रभु की आज्ञा के पूर्ण पालनकर्ता थे।गौड़ीय परंपरा में वर्णन मिलता है कि महाप्रभु ने श्री तपन मिश्र जी को काशी (वाराणसी) जाकर निवास करने की प्रेरणा दी थी। उसी पवित्र वैष्णव-परिवार में रघुनाथ भट्ट जी का पालन-पोषण हुआ। यह कोई साधारण जन्म नहीं था—यह उस आत्मा का अवतरण था, जो आगे चलकर श्रीमद्भागवत-रस का सजीव प्रवाह बनकर समस्त वैष्णव जगत को सिंचित करने वाली थी।

काशी में महाप्रभु का आगमन और बालक रघुनाथ की अद्भुत सेवा

जब श्री चैतन्य महाप्रभु वृंदावन से लौटते हुए काशी पधारे, तब वे श्री तपन मिश्र जी और श्री चन्द्रशेखर जी के यहाँ ठहरे। उस समय रघुनाथ भट्ट जी अभी बाल्यावस्था में थे; किन्तु उनके हृदय में पूर्वजन्म के भक्ति-संस्कार अत्यंत प्रबल रूप से जाग्रत थे।बालक रघुनाथ अत्यंत प्रेम और विनय के साथ महाप्रभु की सेवा में लगे रहते। श्रीचरणों की सेवा करते, और महाप्रभु के महाप्रसाद को अत्यंत श्रद्धा और भाव से ग्रहण करते। बालक के भीतर ऐसी निष्कपट सेवा-वृत्ति, ऐसी सहज भक्ति और ऐसा अनन्य समर्पण देखकर महाप्रभु अत्यंत प्रसन्न हुए।यह सेवा केवल बाह्य सेवा नहीं थी; यह उस आत्मा की जागृति थी, जिसे स्वयं प्रभु अपने हृदय में स्थान देने वाले थे। महाप्रभु की कृपा ने इस बालक के भीतर श्रीकृष्ण-प्रेम का वह दिव्य बीज रोपित किया, जो आगे चलकर एक विराट, सघन, रसपूर्ण कल्पवृक्ष के रूप में विकसित हुआ।

प्रथम जगन्नाथ पुरी यात्रा और महाप्रभु के अमूल्य जीवन-निर्देश

युवावस्था में प्रवेश करने पर रघुनाथ भट्ट जी के हृदय में श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन की तीव्र उत्कंठा जाग उठी। वे काशी से पैदल यात्रा करके जगन्नाथ पुरी (नीलाचल) पहुँचे। वहाँ उन्हें महाप्रभु के सान्निध्य का अनुपम सौभाग्य प्राप्त हुआ और वे लगभग आठ महीने तक उनके साथ रहे।रघुनाथ भट्ट जी पाक-कला में भी अत्यंत निपुण थे। वे अत्यंत प्रेम, शुद्धता और भक्ति के साथ विविध स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर महाप्रभु को अर्पित करते। महाप्रभु भी उनके प्रेम, निष्ठा और सेवाभाव से अत्यंत प्रसन्न रहते थे।जब आठ महीने पूरे हुए, तब महाप्रभु ने उन्हें वापस काशी लौटने की आज्ञा दी और उनके जीवन के लिए कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण निर्देश प्रदान किए। उन निर्देशों का सार इस प्रकार है—
आजीवन अविवाहित रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना।
अपने वृद्ध माता-पिता की अत्यंत निष्ठा, विनम्रता और सेवा-भाव से सेवा करना, क्योंकि वे प्रभु के प्रिय भक्त हैं।
किसी शुद्ध वैष्णव के सान्निध्य में निरंतर श्रीमद्भागवत का अध्ययन और श्रवण करना।
जीवन को हरिनाम, भगवत-श्रवण और भक्ति-साधना में स्थिर रखना।
ये केवल उपदेश नहीं थे; यह एक महापुरुष के जीवन का दिव्य संविधान था। रघुनाथ भट्ट जी ने इन आदेशों को केवल सुना नहीं, बल्कि जीवन की अंतिम श्वास तक उन्हें अक्षरशः जिया।

महाप्रभु का परम प्रसाद — तुलसी-माला और ताम्बूल

काशी लौटते समय महाप्रभु ने रघुनाथ भट्ट जी पर एक अत्यंत विशेष कृपा की। उन्होंने उन्हें भगवान जगन्नाथ जी से सम्बद्ध तुलसी-माला तथा अपना ताम्बूल-प्रसाद प्रदान किया। गौड़ीय परंपरा में इस माला को अत्यंत अलौकिक और महाप्रसाद-स्वरूप माना गया है।रघुनाथ भट्ट जी ने इन वस्तुओं को केवल स्मृति-चिह्न के रूप में नहीं रखा, बल्कि उन्हें आजीवन अत्यंत श्रद्धा, प्रेम और दिव्य भाव से अपने आराध्य-प्रसाद के रूप में सँजोकर रखा। यह केवल प्रसाद नहीं था; यह महाप्रभु के हृदय की सीधी छाप थी, जिसे वे जीवनभर अपने प्राणों की भाँति सँभाले रहे।

माता-पिता की सेवा का अद्वितीय आदर्श और पुनः पुरी-गमन

रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी ने महाप्रभु के आदेश का पूर्ण पालन किया। वे काशी लौटे और लगभग चार वर्षों तक अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा में संलग्न रहे। यह सेवा केवल लौकिक कर्तव्य नहीं थी; यह प्रभु-आज्ञा का पालन और शुद्ध भक्ति का मूर्त रूप थी।आज जब संसार में लोग भक्ति और कर्तव्य को अलग-अलग समझते हैं, तब रघुनाथ भट्ट जी का जीवन हमें सिखाता है कि भक्ति कभी भी कर्तव्य-विमुख नहीं बनाती; वह कर्तव्य को भी साधना बना देती है।जब उनके माता-पिता निजधाम पधार गए, तब यह विरक्त महापुरुष पुनः सब कुछ त्यागकर जगन्नाथ पुरी पहुँचे। वहाँ फिर कुछ समय महाप्रभु के चरणों में रहकर उन्होंने प्रभु की अंतिम आज्ञा प्राप्त की—
अब उन्हें वृंदावन जाना था और वहाँ श्री रूप गोस्वामी तथा श्री सनातन गोस्वामी के श्रीचरणों में रहकर भगवत-भजन और श्रीमद्भागवत-सेवा में जीवन अर्पित करना था।

वृंदावन-वास और श्रीमद्भागवत का प्रेमावेशी गान

वृंदावन पहुँचकर रघुनाथ भट्ट जी ने स्वयं को पूर्णतया श्री रूप और श्री सनातन गोस्वामी जी के चरणों में समर्पित कर दिया। यही वह भूमि थी, जहाँ उनके भीतर का भगवत-रस पूर्ण खिलावट पर पहुँचा।उनका कंठ अत्यंत मधुर,कोकिल-स्वर-सा कोमल और हृदय-भेदी था। जब वे श्रीमद्भागवत का पाठ करते, तो एक-एक श्लोक को विभिन्न मधुर स्वरों में गाकर सुनाते। उनकी वाणी में केवल संगीत नहीं था—उसमें अनुभूति थी, भक्ति थी, तन्मयता थी, और साक्षात भगवान के नाम-रूप-गुण-लीला का स्पर्श था।कथा करते-करते वे कई बार ऐसे प्रेमावेश में डूब जाते कि उनके नेत्रों से आँसुओं की अविरल धारा बहने लगती, कंठ रुद्ध हो जाता, और वे आगे बोल ही नहीं पाते। यह केवल पाठ नहीं था; यह भागवत का आत्मा से फूटता हुआ रस-प्रवाह था।कहा जाता है कि स्वयं श्री रूप गोस्वामी जी भी उनकी भागवत सुनकर भाव-विभोर हो उठते थे। जहाँ विद्वान शास्त्र पढ़ते हैं, वहाँ रघुनाथ भट्ट जी शास्त्र को जीते थे; जहाँ लोग भागवत कहते हैं, वहाँ वे भागवत बन जाते थे।

वैष्णव-निंदा से पूर्ण विरति

श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी का एक अत्यंत विलक्षण और अनुकरणीय गुण था—वे कभी किसी वैष्णव की निंदा नहीं सुनते थे। उन्होंने अपने जीवन को ग्राम्य-कथा, दोष-दर्शन, विवाद और निंदा से पूर्णतः दूर रखा।यदि कोई व्यक्ति उनके सामने किसी वैष्णव की आलोचना करने लगता, तो वे उसे सुनना पसंद नहीं करते थे। उनका भाव अत्यंत निर्मल था—वे प्रत्येक वैष्णव में भगवान की सेवा की झलक देखते थे। उनके लिए यह देखना अधिक महत्त्वपूर्ण था कि कोई भगवान का नाम ले रहा है, भगवान का स्मरण कर रहा है, भगवान से जुड़ने का प्रयास कर रहा है।

यही कारण है कि वे वृंदावन में ‘अजातशत्रु’ कहे गए—अर्थात ऐसा संत, जिसका कोई शत्रु नही और क्योंकि उसने किसी को अपना शत्रु माना ही नहीं।

आज के समय में, जब आध्यात्मिकता के नाम पर भी तुलना, तर्क, आलोचना और कटुता देखने को मिलती है, तब रघुनाथ भट्ट जी का जीवन एक उज्ज्वल दीपक की भाँति हमारा मार्गदर्शन करता है—

“भक्ति का हृदय दोष-दर्शन नहीं, गुण-ग्रहण है।”

श्री गोविंददेव जी की सेवा और उनका समर्पित हृदय

यद्यपि रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी स्वयं अत्यंत विरक्त थे, किन्तु भगवान की सेवा में उनकी भावना अत्यंत समृद्ध, उत्कृष्ट और उदार थी। उनकी प्रेरणा से उनके एक धनी शिष्य रामदास कपूर ने वृंदावन में श्री गोविंददेव जी की सेवा और मंदिर-व्यवस्था हेतु विपुल धन अर्पित किया।
गौड़ीय परंपरा में वर्णन आता है कि रघुनाथ भट्ट जी ने श्री गोविंददेव जी के लिए अपने प्रेम से स्वर्ण बांसुरी तथा मकराकृति कुण्डल अर्पित करवाए। वे स्वयं भी ठाकुरजी के लिए अत्यंत प्रेम और शुद्धता के साथ प्रसाद बनाते थे।
यहाँ उनका भाव स्पष्ट दिखाई देता है—अपने लिए पूर्ण विरक्ति,किन्तु ठाकुरजी के लिए सर्वोच्च समर्पण।
सच्चा वैराग्य वही है, जिसमें मनुष्य अपने लिए कुछ न चाहे, पर भगवान की सेवा के लिए सर्वस्व अर्पित कर दे। रघुनाथ भट्ट जी इस सिद्धांत के दिव्य उदाहरण थे।

. नित्य गोलोक का रहस्य — ‘राग-मंजरी’ स्वरूप

गौड़ीय वैष्णव रसिक परंपरा, विशेषतः ‘श्रीगौर-गणोद्देश-दीपिका’ की मान्यता के अनुसार, ‘श्री राग-मंजरी’ ही धरती पर श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी के रूप में अवतीर्ण हुईं।इस भाव का अर्थ केवल इतना नहीं कि वे कोई महान संत थे; इसका अर्थ यह है कि उनके भीतर की भक्ति, माधुर्य, कीर्तनमय भागवत-रस, कोमलता, निष्कपटता और राधा-कृष्ण-लीला की अंतरंग अनुरक्ति साधारण नहीं थी। उनका व्यक्तित्व उस आंतरिक, निकुंज-सेवा-प्रधान, कोमल मंजरी-भाव की झलक देता है, जो गौड़ीय रस-तत्व की अत्यंत सूक्ष्म और उच्च धारा है।इसलिए उनका स्मरण मात्र भी साधक के हृदय में भागवत-श्रवण, हरिनाम और निर्मल वैष्णव-भाव के प्रति विशेष अनुराग उत्पन्न करता है।

प्राकट्य-लीला का समापन और नित्य-लीला में प्रवेश

वृंदावन की पावन रज में जीवन व्यतीत करते हुए, श्रीमद्भागवत का मधुर गान करते हुए, वैष्णव-सेवा, ठाकुरजी की भक्ति और निंदा-रहित संत-स्वभाव का दिव्य आदर्श स्थापित करते हुए इस रसिक शिरोमणि आचार्य ने अंततः अपनी प्राकट्य-लीला का समापन किया और नित्य-लीला में प्रवेश किया।वृंदावन धाम में आज भी उनसे संबंधित समाधि-परंपरा अत्यंत श्रद्धा से स्मरण की जाती है। वैष्णवजन उनकी स्मृति में आज भी उनके चरणों का ध्यान करते हैं और उनसे यही प्रार्थना करते हैं—

“हे रघुनाथ भट्ट गोस्वामी ! हमें भी भागवत-रस का अंश, हरिनाम में आसक्ति, वैष्णवों के प्रति निष्कपट हृदय और निंदा से दूर रहने का बल प्रदान कीजिए।”

निष्कर्ष

श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी का सम्पूर्ण जीवन संसार को यह शिक्षा देता है कि भक्ति केवल बड़े-बड़े ग्रंथ लिखने, विद्वत्ता दिखाने या बाहरी पहचान बनाने का नाम नहीं है।
भक्ति है—भगवान की वाणी को अपने जीवन में उतार लेना,
श्रीमद्भागवत को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि जीना,हरिनाम में हृदय डुबो देना,वैष्णवों की सेवा करना,
और किसी की निंदा से अपने कान, मन और वाणी—तीनों को बचाकर रखना।वे हमें सिखाते हैं कि जो व्यक्ति भागवत सुनते-सुनते स्वयं भागवतस्वरूप बन जाए, वही सच्चा साधक, सच्चा वैष्णव और सच्चा रसिक है।महाप्रभु की दी हुई कृपा-प्रसाद तुलसी-माला को हृदय से लगाए, वृंदावन की कुंजों में श्रीमद्भागवत का गान करते हुए, प्रेमाश्रु बहाते इस परमहंस रसिक आचार्य के श्रीचरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है।

जय जय श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी!
जय श्री राधे! जय श्री वृंदावन धाम!

📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं आधार-ग्रंथ

इस लेख का मुख्य आधार गौड़ीय वैष्णव परंपरा के मान्य ग्रंथ और चरित-विवरण हैं, विशेष रूप से—

‘श्री चैतन्य चरितामृत’ (अंत्य-लीला, अध्याय 13) — श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी कृत

‘श्री गौर-गणोद्देश-दीपिका’ — श्री कवि कर्णपूर कृत

अन्य परंपरागत वैष्णव चरित-ग्रंथ एवं गौड़ीय आचार्यों की प्रचलित कथाएँ

॥ हमारा करबद्ध एवं विनम्र निवेदन ॥

हमारे इस ‘श्री धाम वृंदावन’ पेज का एकमात्र उद्देश्य ब्रज के रसिक संतों की दिव्य महिमा, उनके अलौकिक चरित्रों और ब्रजधाम के पावन तीर्थों का रस आप सभी भगवद्भक्तों तक पहुँचाना है।ब्रज का यह रस-सागर अनंत, अगाध और असीम है, जबकि हमारी बुद्धि अत्यंत सीमित है। ऐसे महान रसिक आचार्यों के चरित्र का वर्णन करना वास्तव में “सूर्य को दीपक दिखाने” के समान है। फिर भी हम पूरी निष्ठा, श्रद्धा और उत्तरदायित्व के साथ यह प्रयास करते हैं कि यहाँ प्रस्तुत प्रत्येक जानकारी यथासंभव प्रामाणिक, संतुलित और परंपरागत आधार पर ही दी जाए।फिर भी यदि इस गहन विषय को संजोते समय हमसे अनजाने में कोई त्रुटि, शब्द-दोष, तथ्यगत असावधानी या मानवीय भूल रह गई हो, तो हम आप सभी सुधी जनों, विद्वानों, आचार्यों और वैष्णवों के श्रीचरणों में करबद्ध क्षमा-याचना करते हैं।
यदि आपको किसी बिंदु पर कोई त्रुटि प्रतीत हो, तो कृपया सप्रमाण हमारा मार्गदर्शन अवश्य करें। हम आपके प्रेमपूर्ण सुधार को प्रभु का प्रसाद और संतों की कृपा मानकर सहर्ष स्वीकार करेंगे।

सर्वाधिकार एवं सविनय आग्रह

प्रिय वैष्णवजनों, यह विशेष शोधपूर्ण लेख विशुद्ध रूप से ‘श्री धाम वृंदावन’ पेज की मौलिक प्रस्तुति है। इसे तैयार करने में अनेक परंपरागत ग्रंथों का अध्ययन, समय, श्रम और भावनात्मक समर्पण लगता है।धर्म, भक्ति और ब्रज-रस के प्रचार हेतु आप इस पोस्ट को सीधे Share करें—हम उसका हृदय से स्वागत करते हैं।हमारा आपसे केवल विनम्र निवेदन है कि कृपया बिना अनुमति इस लेख को कॉपी-पेस्ट करके, उसमें हल्का-फुल्का परिवर्तन करके, या अपने नाम से किसी अन्य पेज पर प्रकाशित न करें। ऐसा करने से न केवल संतों के प्रामाणिक इतिहास की अखंडता प्रभावित होती है, बल्कि हमारी इस निस्वार्थ सेवा को भी ठेस पहुँचती है।
ब्रज-रस की इस शुद्धता और हमारी विनम्र मेहनत का सम्मान करते हुए कृपया हमारा सहयोग करें।

श्री श्यामा-श्याम आप सब पर अपनी असीम कृपा बरसाएँ।
राधे राधे!

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