कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण!
अनेक रूप रूपाय विष्णवे प्रभु विष्णवे वे अतिमानवीय हैं, दैवीय हैं किंतु फिर भी सर्वसुलभ है
अपने भक्त की एक आर्त पुकार पर नंगे पैर दौड़े चले आने वाले कृष्ण के कौन से रूप की व्याख्या की जाए और क्या सचमुच व्याख्या संभव है, यह जटिल प्रश्न है
कृष्ण भारत की प्रज्ञा हैं, मेधा हैं, उनका संपूर्ण जीवन ही एक पाठशाला है
वे ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्ति योग का उद्गम हैं… वे पुरुषार्थ का, प्रेम का अनंत सागर हैं…. जिसमें गोते लगाने वाले को कौन-सा अद्भुत कोष हाथ लगता है, यह गोते लगाने वाला ही जानता है
भगवान श्री कृष्ण सच में जगदगुरु ही हैं।
नाम हरि का जप ले बन्दे, फिर पीछे पछतायेगा
अपने अपने गुरुदेव की जय
श्री कृष्णाय समर्पणं













