श्रीमदभागवतमहापुराण में भगवन्नाम महिमा ( पोस्ट 15 )

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गत पोस्ट से आगे ……….
यम और यमदूतों का संवाद
श्रीशुकदेवजी कहते हैं – जब दूतों ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब देवशिरोमणि प्रजा के शासक भगवान् यमराज ने प्रसन्न होकर श्रीहरि के चरणकमलों का स्मरण करते हुए उनसे कहा ||११||
यमराज ने कहा – दूतो ! मेरे अतिरिक्त एक और ही चराचर जगत के स्वामी हैं | उन्हीं में यह सम्पूर्ण जगत सूत में वस्त्र के समान ओतप्रोत है | उन्ही के अंश ब्रह्मा, विष्णु और शंकर इस जगत की उत्पति, स्थिति तथा प्रलय करते हैं | उन्होंने इस सारे जगत को नथे हुए बैल के समान अपने अधीन कर रखा है ||१२|| मेरे प्यारे दूतो ! जैसे किसान अपने बैलों को पहले छोटी-छोटी रस्सियों में बाँधकर फिर उन रस्सियों को एक बड़ी आड़ी रस्सी में बाँध देते हैं, वैसे ही जगदीश्वर भगवान् ने भी ब्राह्मणदि वर्ण और ब्रह्मचर्य आदि आश्रम रूप छोटी-छोटी नाम की रस्सियों में बाँधकर फिर सब नामों को वेदवाणी रूप बड़ी रस्सी में बाँध रखा है | इस प्रकार सारे जीव नाम एवं कर्मरूप बन्धन में बँधे हुए भयभीत होकर उन्हें ही अपना सर्वस्व भेंट कर रहे हैं ||१३|| दूतो ! मैं, इन्द्र, निर्रऋति, वरुण, चंद्रमा, अग्नि, शंकर, वायु, सूर्य, ब्रह्मा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत, सिध्द, ग्यारहों रूद्र, रजोगुण एवं तमोगुण से रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता-सब-के-सब सत्वप्रधान होने पर भी उनकी माया के अधीन हैं तथा भगवान् कब क्या किस रूप में करना चाहते हैं – इस बात को नहीं जानते | तब दूसरों की तो बात ही क्या है ||१४-१५|| दूतो ! जिस प्रकार घट, पट आदि रूपवान पदार्थ अपने प्रकाशक नेत्र को नहीं देख सकते – वैसे ही अन्त:करण में अपने साक्षीरूप से स्थित परमात्मा को कोई भी प्राणी इन्द्रिय, मन, प्राण, ह्रदय या वाणी आदि किसी भी साधन के द्वारा नहीं जान सकता ||१६|| वे प्रभु सबके स्वामी और स्वयं परम स्वतन्त्र हैं | उन्ही मायापति पुरुषोतम के दूत उन्ही के समान परम मनोहर रूप, गुण और स्वभाव से सम्पन्न होकर इस लोक में प्राय: विचरण किया करते हैं ||१७|| विष्णु भगवान् के सुरपूजित एवं परम अलौकिक पार्षदों का दर्शन बड़ा दुर्लभ है | वे भगवान् के भक्तजनों को उनके शत्रुओं से, मुझसे और अग्नि आदि सब विपतियों से सर्वथा सुरक्षित रखते हैं ||१८||

शेष आगामी पोस्ट में |
गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक परम सेवा पुस्तक कोड १९४४ से |



Continuing from previous post………. dialogue between yama and eunuchs Sri Shukdevji says – When the messengers asked this question, then Lord Yamraj, the ruler of Devshiromani subjects, being pleased, remembering the lotus feet of Sri Hari, said to them ||11|| Yamraj said – Messengers! Apart from me, there is only one other pasture who is the master of the world. In Him the whole world is covered in cotton like a cloth. His parts Brahma, Vishnu and Shankar create the world, create and destroy. He has subdued the whole world like a naked bull ||12|| My dear messengers! Just as farmers tie their oxen in small ropes and then tie those ropes in a big cross rope, similarly Lord Jagadishvara also tied all the names in ropes in the form of brahmanadi varna and brahmacharya etc. The form of Vedavani is tied in a big rope. In this way all the living beings, being in fear, being tied in the bondage of name and action, are offering their everything to them.||13|| Messengers! I, Indra, Nirarriti, Varuna, Moon, Agni, Shankara, Vayu, Surya, Brahma, twelve Adityas, Vishvedevata, eight Vasus, Sadhya, forty nine Maruts, Siddhas, eleven Rudras, Bhrigu devoid of Rajoguna and Tamoguna etc. All the deities, even though they are sattva-predominant, are subject to their illusion and do not know when and in what form the Lord wants to do. Then what about others?|14-15|| Messengers! Just as the corpuscles, plates, etc., cannot be seen by their illuminating eye, similarly, no living being can know the Supreme Soul situated in the inner being through its witnessing form, by any means like senses, mind, vitality, heart or speech. |16|| That Lord is the lord of all and Himself the ultimate free. The messengers of the same Mayapati Purushottam, like him, often roam in this world, being endowed with the most beautiful form, qualities and nature ||17|| It is very rare to have the sight of the super worshiped and supreme supernatural councilors of Lord Vishnu. He keeps the devotees of the Lord completely safe from their enemies, from me and from all calamities like fire etc.||18|| rest in upcoming posts. From the book Param Seva Book Code 1944 published by GeetaPress, Gorakhpur.

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