प्रभु संकीर्तन 57

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सांवरे जिस दिल में बैठ जाता है वे नैन फिर नीर नहीं बहाते हैं वे नैन नीर बहाएगे फिर इस जग का क्या होगा। जिस दिल में सांवरा बैठे हैं वो दिल महकती खुशबू से भरा है न जाने कितने खूशबू की महक से तृप्त होतें है।
दो दिन से भाव की उत्पत्ति नहीं हो रही थी बार बार भगवान को नमन करती प्रभु कहती परमात्मा कहती सांवरे कहती मेरे भगवान् नाथ हे दीनदयाल तुम कहां छुप गए दिल अन्तर्मन से रो रहा था भाव पढा दिल के तार झंकार उठे समय को भुला बैठी सांवरे के भाव में खो गई जय श्री राम
अनीता गर्ग

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