मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ योनि है।परमात्मा ने यह मनुष्य योनि हमे अपने प्रारब्ध कर्मो के भोगने तथा नए सुन्दर कर्मो को संचित करने के लिए दी है।इस भौतिक संसार मे अनावश्यक भोगों के कारण हम अपने लिये निर्धारित पथ को भूल जाते हैं।और छोटा सा दुख आने पर परमात्मा को दोषारोपण करने लगते हैं।क्योंकि माया के कारण हमें उचित अनुचित का भान ही नही हो पाता। इस चराचर जगत में भगवान् की शरणागति के अलावा किसी अन्य मार्ग से माया को नहीं जीता जा सकता है। यह माया बड़ी प्रबल है और दूसरे हमारे साधन में निरंतरता नहीं है।(जब दुख हो तो प्रभु का सिमरन,नही तो फिर भूल जाते हैं।) लेकिन अगर गोविन्द की कृपा हो जाये तो काम-क्रोध,लोभ-मोह और विषय- वासना से मुक्त हुआ जा सकता है।*
हम भले है, बुरे है, सज्जन है दुर्जन है, पापी है पुण्यात्मा हैं, कुछ मत सोचो। अपनी दुर्बलता का ज्यादा विचार करोगे तो आपके भीतर हीन भाव आ जायेगी। अपने सत्कर्मों और गुणों को ज्यादा सोचोगे तो अहम भाव आ जायेगा।भगवान से क्षमा मांगे,जीवन में जाने अंजाने हम अनेकों भूल और पाप करते है।क्षमा मांगकर प्रायश्चित किया जा सकता है। क्षमा सबसे बड़ा भाव है। जब हम भगवान से क्षमा मांगते हैं, तब पूजा पूरी होती है और भगवान की कृपा मिलती है। क्षमा का ये भाव हमारे अहंकार को मिटाता है। हमें दैनिक जीवन में भी अहंकार को त्यागकर अपनी गलतियों की क्षमा मांगने में देरी नहीं करनी चाहिए।
हमे बहुत चिंतन नही करना बस इतना सोचो कि प्रभु के चरण कैसे मिलें, शरण कैसे मिले, नाम जप कैसे बढे, संतों में प्रीति कैसे हो और कथा में अनुराग कैसे बढे ? यह सब हो गया तो प्रभु को आते देर ना लगेगी
जय जय श्री राधेकृष्ण जी।श्री हरि आपका कल्याण करें। 🙏🏻🪷













