शरीर की रक्षा के लिए भी भोजन चाहिए, और आत्मा की रक्षा के लिए भी। “शरीर और आत्मा इन दोनों का भोजन अलग-अलग है।”
शरीर की रक्षा के लिए उस का भोजन है, “दाल-रोटी सब्जी घी दूध मक्खन मलाई मिठाई इत्यादि।” परन्तु आत्मा की रक्षा के लिए उसका भोजन है, “वेदों का शुद्ध ज्ञान, निष्काम कर्म, परोपकार आदि करना, तथा ईश्वर की भक्ति ध्यान उपासना आदि करना।”
“जो व्यक्ति शरीर से स्वस्थ रहना चाहता है, वह उत्तम भोजन भी करे, और हानिकारक एवं विपरीत भोजन का त्याग भी करे, उससे परहेज भी करे। अर्थात हानिकारक या विपरीत भोजन न खाए।”
शरीर के लिए हानिकारक या विपरीत भोजन है, “अंडे मांस शराब सुल्फा गांजा भांग तंबाकू इत्यादि।” ये सब वस्तुएं रोगोत्पादक हैं, इनका सेवन नहीं करना चाहिए। “और शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ऊपर बताया घी दूध मक्खन मलाई दाल रोटी सब्जी आदि उत्तम भोजन खाना चाहिए।” “परंतु साथ ही साथ कभी कभी महीने में 1 या 2 बार भोजन का उपवास भी करना चाहिए, अर्थात भोजन नहीं खाना चाहिए। इससे शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है।”
“इसी प्रकार से आत्मा का स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहे, उसके लिए ऊपर बताया वेदों का शुद्ध ज्ञान, निष्काम कर्म, परोपकार आदि करना, तथा ईश्वर की भक्ति ध्यान उपासना आदि प्रतिदिन करना चाहिए।” “और विपरीत एवं हानिकारक भोजन का तो सदा ही निषेध है। वह कभी भी नहीं करना चाहिए।” आत्मा के लिए विपरीत एवं हानिकारक भोजन क्या है? “जैसे बुरे विचार करना, बुरी भाषा बोलना, और चोरी डकैती लूट मार छल कपट झूठ इत्यादि बुरे कर्म करना।” “इन बुरे कर्मों का तो प्रतिदिन ही उपवास करना चाहिए, अर्थात ऐसे बुरे कर्म तो कभी भी नहीं करने चाहिएं। तभी आत्मा सुखी प्रसन्न या आनन्दित रह सकता है, अन्यथा नहीं। यही आत्मा की रक्षा सुरक्षा है।”
—– “स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक,













