पुष्प वाटिका का  दिव्य क्षण

पुष्प वाटिका का वह दिव्य क्षण जब पहली बार मिलीं राम और जानकी की दृष्टियाँ

हरि अनंत, हरि कथा अनंता
रामकथा की इस अमृत धारा में अब हम पहुँचते हैं उस अद्भुत पल पर
जहाँ प्रेम ने पहली बार मर्यादा के आँगन में आँखें खोलीं।

यह वही क्षण है जब पुष्प वाटिका में श्रीराम और माता जानकी का प्रथम मिलन हुआ।

गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्रीराम और लक्ष्मण उपवन में पुष्प लेने आए थे।
उधर जनकनंदिनी सीता, माता की अनुमति लेकर गिरिजा पूजन के लिए उसी वाटिका में पहुँचीं।

वह साधारण उपवन नहीं था…
वह तो नियति का मंच था, जहाँ एक दिव्य मिलन लिखा जा चुका था।

सीता जी की एक सखी पहले आगे बढ़ी।
वह फूलों की सुंदरता निहार रही थी कि अचानक उसकी दृष्टि दो तेजस्वी युवकों पर पड़ी।

वह ठिठक गई
शरीर रोमांचित
नेत्र विस्मित

सखियाँ पूछने लगीं
क्या हुआ? ऐसा क्या देख लिया?

सीता ने उधर दृष्टि डाली

और उसी क्षण मानो कोई पुरानी स्मृति जाग उठी।
नारद मुनि के वचन स्मरण हो आए।
मन में एक अनजानी प्रीति लहराने लगी।

सीता की दृष्टि मानो शिशु-मृगी सी थी
लज्जा भी, आकर्षण भी, संकोच भी और प्रेम की पहली धड़कन भी।

उधर श्रीराम
जो पूरे विश्व को आकर्षित करने वाले हैं।
वे भी उस क्षण जानकी के सौंदर्य को निहारते रह गए।

तुलसीदास जी कहते हैं

रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ।
मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।।

मोहि अतिसय प्रतीति मन केरि।
जेहि सपनेहुँ परनारि न हेरि।।

रघुवंश की मर्यादा ऐसी थी कि
स्वप्न में भी पर-नारी की ओर दृष्टि नहीं उठती थी।

पर आज…
मर्यादा के भीतर एक पवित्र भाव जाग उठा।

सीता बार-बार बहाने से लौटतीं —
कभी वृक्ष देखने, कभी मृग देखने…

देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥

जितना देखतीं
प्रेम उतना ही बढ़ता जाता।

पर उसी क्षण मन में एक चिंता भी उठी
शिव धनुष की कठोरता का स्मरण।

जानि कठिन सिवचाप बिसूरति।
चली राखि उर स्यामल मूरति॥

मन में विचार आया
ये सुकुमार रघुनाथ उस धनुष को कैसे तोड़ेंगे?

पर तुरंत ही उन्होंने श्रीराम की उस साँवली छवि को अपने हृदय में बसा लिया।

उधर जब राम जानकी को जाते हुए देखते हैं,
तो मानो उनके हृदय में एक चित्र अंकित हो जाता है

परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही।
चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही॥

जैसे प्रेम की कोमल स्याही से राम ने सीता के स्वरूप को अपने हृदय की दीवार पर लिख लिया हो।

इसके बाद सीता जी गिरिजा मंदिर पहुँचीं।

करुणा से भरी प्रार्थना की

जय जय गिरिबरराज किसोरी
जय महेस मुख चंद चकोरी।

उन्होंने अपनी इच्छा स्पष्ट नहीं कही
बस विनय की

मोर मनोरथु जानहु नीकें
बसहु सदा उर पुर सबही कें

माँ सब जानती हैं।

और तभी

बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी॥

मूर्ति मुस्कुराई और माला स्वयं खिसककर नीचे गिर पड़ी।

यह माँ गिरिजा का आशीर्वाद था।

बोलीं

सुनु सिय सत्य असीस हमारी
नारद बचन सदा सुचि साचा।

जिसमें तुम्हारा मन बस गया है,
वही तुम्हें पति रूप में मिलेगा।

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु
सहज सुंदर साँवरो।

सीता का हृदय आनंद से भर उठा।
बाएँ अंग फड़कने लगे

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

उस दिन पुष्प वाटिका में केवल मिलन नहीं हुआ।

वहाँ
शील और सौंदर्य का संगम हुआ।
मर्यादा और प्रेम का संतुलन प्रकट हुआ।

न कोई उतावलापन
न कोई उच्छृंखलता।

यही तो भारतीय संस्कृति का प्रेम है —
जहाँ दृष्टि मिलती है,
पर मर्यादा बनी रहती है।

रामायण का संदेश

सच्चा प्रेम अधीर नहीं करता,
वह धैर्य देता है।

वह आकर्षण नहीं,
स्वीकार बन जाता है।

और मर्यादा में रहकर भी
अनंत हो जाता है।

हरि अनंत…
हरि कथा अनंता…

जय श्री राम

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