।। विश्वरूप दर्शन योग ।।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा: सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै:।
भीष्मो द्रोण: सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यै:।।
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गै:।।
भावार्थ-
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं कि, मैं धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों को उनके सहयोगी राजाओं और भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण तथा हमारे पक्ष के सेना नायकों सहित आपके विकराल मुख में प्रवेश करता देख रहा हूँ। इनमें से कुछ के सिरों को मैं आपके विकराल दांतों के बीच पिसता हुआ देख रहा हूँ।
तात्पर्य यह कि, इस श्लोक में अर्जुन यह उल्लेख करता है कि भगवान के दांत कैसे हैं हम अपने दांतों से भोजन को चबाते हैं। भगवान के दाँत काल चक्र के रूप में सबको चबाकर मृत्यु का ग्रास बनाते हैं। अर्जुन ने कौरवों के सेना नायक- भीष्म, द्रोणाचार्य और अपनी सेना के सेना नायकों को तीव्रता से भगवान के मुख में प्रवेश करते हुए और उनके दांतों के बीच आते हुए देखा। उसने भगवान के विश्वव्यापी रूप में निकट भविष्य को देखा क्योंकि भगवान काल की सीमाओं से परे हैं। इसलिए भूत, वर्तमान और भविष्य उनमें हर समय दिखाई देते हैं। भीष्म कौरवों और पाण्डवों के प्रपितामह शांतनु और गंगा के पुत्र थे। अपने पिता के पुनर्विवाह हेतु उन्होंने राज्य सिंहासन का त्याग करने और जीवन पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा ली थी। भीष्म भली-भांति जानते थे कि दुर्योधन दुष्ट है और वह पाण्डवों के अधिकार को छीनना चाहता है। इसके पश्चात् भी वे दुर्योधन का समर्थन करते रहे। श्रीमद्भागवतम् में भीष्म द्वारा भगवान को की गयी प्रार्थना का वर्णन किया गया है जब वे अपने जीवन के अंतिम समय में बाणों की शैय्या पर लेटे हुए थे।
‘मेरा मन अर्जुन के प्रिय मित्र श्रीकृष्ण में एकाग्र हो जाए जो अपने मित्र के आग्रह पर तुरन्त ही पाण्डव-सेना और कौरव-सेना के मध्य रथ ले आये और वहाँ स्थित होकर जिन्होंने केवल अपनी दृष्टि से ही शत्रु पक्ष के सेना नायकों की आयु छीन ली। उन पार्थ सखा के चरणों में मेरी प्रीति बनी रहे।’
अतः भीष्म पितामह को स्वयं बोध था कि भगवान के विरुद्ध युद्ध लड़ने का परिणाम मृत्यु होगा। द्रोणाचार्य कौरवों और पाण्डवों को सैन्य शिक्षा प्रदान करने वाले गुरु थे। वे इतने निष्पक्ष थे कि उन्होंने अपने पुत्र अश्वत्थामा की अपेक्षा अर्जुन को युद्धकला में अधिक निपुण बनाया किन्तु उन्होंने विवशतापूर्वक दुर्योधन का पक्ष लिया क्योंकि वे अपने जीवनयापन के लिए आर्थिक रूप से उस पर निर्भर थे। इसलिए द्रोणाचार्य ने भी युद्ध में मरने का निश्चय किया। उन्हें बोध था कि अपने भाग्य के अनुसार वे युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होंगे।
कर्ण दुर्योधन का अंतरंग मित्र था और इसलिए उसने कौरवों के पक्ष में युद्ध लड़ा। उसमें भी महानायकों जैसे गुण थे। जब श्रीकृष्ण ने यह रहस्योद्घाटन किया कि वह कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र है और पाण्डव वास्तव में उसके भाई हैं तब उसने श्रीकृष्ण से कहा कि वे युधिष्ठिर को इस रहस्य के संबंध में कुछ न बताएँ क्योंकि वह मेरा वध नहीं करेगा और युद्ध में पराजित हो जाएगा। यद्यपि उसने युद्ध में दुर्योधन का पक्ष लिया था किन्तु उसे भी यह ज्ञान था कि नियति के अनुसार उसे भी युद्ध में वीरगति प्राप्त होगी। ।। श्री कृष्णाय वयं नमः ।।













