एक सूफी फकीर औरत हुई राबिया। वह किसी में कुछ बुरा नहीं देखती थी। वही तो संत का लक्षण है! वह कांटे को भी देखती तो उसकी प्रशंसा में गीत ही उससे निकलता। उसके मित्र, उसके शिष्य और दूसरे फकीर बड़े परेशान थे। कैसी ही बुरी बात हो, उसमें कुछ न कुछ फूल का खिलना वह देख ही लेती थी। एक दिन एक फकीर हसन ने कहा कि राबिया, सब तरह की खबरें हम तेरे पास लाते हैं। तू कुछ न कुछ अच्छा देख लेती है। क्या तुझे शैतान में भी कुछ अच्छा दिखाई पड़ता है?
राबिया का चेहरा ऐसे प्रसन्नता से भर गया जैसे शैतान का नहीं, परमात्मा का नाम लिया गया हो। और राबिया ने कहा, ‘धन्यवाद शैतान का। क्योंकि न वह मेरी वासना को उकसाता और न मुझमें कभी संयम का जन्म होता। न वह मुझे चुनौती देता और न मैंने परमात्मा तक यात्रा की होती। धन्यवाद शैतान का! और यह तो हसन तुम्हें भी मानना पड़ेगा कि कुछ गुण शैतान में हैं, जो संतों में भी नहीं होते।’
हसन ने कहा, ‘कौन से गुण? सुने नहीं कभी। किसी शास्त्र में लिखे नहीं।’
तो राबिया ने कहा, ‘देखो असंभव में लगा है शैतान, परमात्मा को हराने में। इससे बड़ी असंभव बात क्या होगी? लेकिन हताश नहीं होता। तुम परमात्मा को पाने में लगे हो, जिससे सरल कोई बात नहीं हो सकती; फिर भी हार-हार जाते हो और हताश हो जाते हो। धैर्य तो मानना पड़ेगा शैतान का। सीखना हो तो उससे सीखना चाहिए। अनंतकाल से परमात्मा को हराने में लगा है, जो कि हो ही नहीं सकता। और तुम परमात्मा को पाने में लगे हो, जो कि होना ही चाहिए इसी क्षण! क्योंकि परमात्मा स्वभाव है; उसे पाने में क्या दिक्कत है? वह तुम्हारे भीतर छिपा है। एक कदम भी तो नहीं उठाना; बस, जरा आंख खोलनी है। और तुम उसमें भी हार जाते हो, थक जाते हो। और शैतान स्वभाव को हराने में लगा है जो हो ही नहीं सकता। क्योंकि अगर स्वभाव हार जाये, तो फिर जीतेगा क्या? स्वभाव का तो अर्थ है, जो शाश्वत नियम है। उसके विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता। असंभव में लगा है। लेकिन उसका धैर्य, उसकी लगन, उसका श्रम, सीखने जैसा है।’ राबिया ने कहा, ‘मैं तो परमात्मा तक पहुंची शैतान से सीख-सीख कर। और जिस दिन मैंने परमात्मा को पाया, मैंने पहला धन्यवाद शैतान को दिया। उसके सहारे के बिना यह यात्रा नहीं हो सकती थी।’













