पुजारी का साक्षात  ईश्वर हूँ

वृंदावन की पावन धरा पर एक भव्य मंदिर था, जिसे वहाँ के राजा ने बड़े प्रेम से बनवाया था। मंदिर में बाँके बिहारीजी की सेवा के लिए एक वृद्ध पुजारी नियुक्त थे। पुजारीजी के लिए बिहारीजी केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि उनके सखा, उनके स्वामी और उनका सर्वस्व थे। वर्षों बीत गए, पुजारीजी की आँखों की ज्योति कम हो गई, लेकिन प्रभु के प्रति उनका प्रेम बढ़ता ही गया।
एक अटूट नियम
राजा का एक नियम था; वह प्रतिदिन मंदिर के लिए ताजे फूलों की सुंदर माला भेजता। पुजारीजी वह माला बिहारीजी को धारण कराते और जब शाम को राजा दर्शन के लिए आता, तो वही ‘प्रसादी माला’ पुजारीजी प्रभु के गले से उतारकर राजा को पहना देते।
एक क्षण का मानवीय मोह
एक दिन विशेष परिस्थिति के कारण राजा मंदिर नहीं आ सके। उन्होंने सेवक के हाथ माला भिजवाई और संदेश दिया कि आज वे नहीं आएँगे। पुजारीजी ने माला प्रभु को पहनाई, पर आज उनके मन में एक अभिलाषा जागी— “सारा जीवन प्रभु की सेवा में बीत गया, पर उनकी पहनी हुई माला धारण करने का सौभाग्य मुझे कभी न मिला। आज राजा नहीं हैं, क्यों न आज यह प्रसाद मैं ग्रहण कर लूँ?”
भावविभोर होकर पुजारीजी ने वह माला अपने गले में डाल ली। लेकिन तभी शोर हुआ कि राजा की सवारी मंदिर के द्वार पर पहुँच चुकी है।

पुजारीजी घबरा गए। दंड के भय से उन्होंने आनन-फानन में अपने गले से माला उतारी और पुनः बिहारीजी को पहना दी। जब राजा आए, तो पुजारीजी ने कांपते हाथों से माला उतारकर राजा के गले में डाल दी।
जैसे ही राजा ने माला देखी, उनकी नज़र माला में फंसे एक सफेद बाल पर पड़ी। राजा समझ गए कि पुजारी ने माला स्वयं पहनकर अशुद्ध की है। क्रोध में भरकर राजा बोले, “पुजारीजी! यह सफेद बाल कैसा? क्या आप मुझे धोखा दे रहे हैं?”
पुजारीजी भयभीत थे। प्राण बचाने के लिए उनके मुख से निकला, “महाराज, यह तो स्वयं बिहारीजी का बाल है!”
राजा का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। “झूठ! क्या कभी भगवान के बाल भी सफेद होते हैं? ठीक है, कल सुबह श्रृंगार के समय मैं स्वयं आऊँगा। यदि बिहारीजी के बाल काले निकले, तो आपको मृत्युदंड दिया जाएगा!”
पूरी रात पुजारीजी रोते रहे। वे प्रभु के चरणों में गिरकर बोले, “हे गिरधारी! मोहवश मैंने अपराध किया, पर अब मेरी लाज आपके हाथ है। मैं बूढ़ा हो चला हूँ, क्या आप अपने इस बालक को फाँसी पर चढ़ते देखेंगे?”

अगली सुबह राजा मंदिर पहुँचे। उन्होंने संदेहवश बिहारीजी का मुकुट हटाया और स्तब्ध रह गए। बिहारीजी के सारे बाल दूध जैसे सफेद थे। राजा को लगा कि पुजारी ने अपनी जान बचाने के लिए बालों को रंग दिया है। सच्चाई परखने के लिए राजा ने जैसे ही एक बाल को खींचकर तोड़ना चाहा, मूर्ति के सिर से रक्त की धार बहने लगी। राजा के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे भगवान के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे।
तब विग्रह से एक गंभीर वाणी गूँजी:
“हे राजन! तुमने मुझे केवल एक पाषाण की मूर्ति समझा, इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए पत्थर ही हूँ। लेकिन इस पुजारी के लिए मैं साक्षात जीवित ईश्वर हूँ। इसकी निष्कपट श्रद्धा की रक्षा के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े और रक्त की पीड़ा भी सहनी पड़ी।”

कथा का सार
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि भगवान भाव के भूखे हैं। यदि मन में सच्ची श्रद्धा हो, तो पत्थर भी बोल पड़ता है और यदि हृदय में केवल अहंकार हो, तो साक्षात ईश्वर भी केवल पत्थर ही दिखाई देते हैं।

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