अष्टावक्र आत्मा केवल साक्षी है

अष्टावक्र का जन्म एक महान वेदज्ञ ऋषि कहोड़ के यहाँ हुआ। कहोड़ वेदों के गहन ज्ञाता थे, परंतु स्वभाव से अभिमानी भी। कहा जाता है कि जब वे गर्भस्थ शिशु के सामने वेद–पाठ करते, तो कहीं–कहीं उच्चारण की सूक्ष्म त्रुटि कर बैठते। गर्भ में स्थित बालक ने वही किया जो सत्य के लिए अनिवार्य था—उसने पिता को टोक दिया। यह टोक किसी अहंकार से नहीं, बल्कि शुद्ध बोध से उपजी थी। किंतु अहंकार से आच्छन्न पिता को यह असह्य लगा। क्रोध में उन्होंने शाप दे दिया कि यह बालक आठ स्थानों से वक्र देह वाला होगा। उसी शाप के कारण बालक का शरीर टेढ़ा–मेढ़ा हो गया और उसका नाम पड़ा—अष्टावक्र।

शरीर भले ही वक्र था, पर चेतना सीधी और निर्मल थी। बालकपन से ही अष्टावक्र के वचन साधारण नहीं थे। वे बोलते कम थे, पर जब बोलते तो सत्य बोलते। उनके लिए देह कभी बाधा नहीं बनी, क्योंकि वे स्वयं को देह मानते ही नहीं थे। यही भाव आगे चलकर उनके समूचे दर्शन का मूल बना।
इसी समय की बात है कि कहोड़ ऋषि विद्वानों की एक सभा में शास्त्रार्थ के लिए गए। वहाँ विद्वान बंदी ने उन्हें पराजित किया। पराजय का दंड था—जल में प्रवेश। कहोड़ ऋषि को सरस्वती में प्रवाहित कर दिया गया। यह रहस्य वर्षों तक अष्टावक्र से छिपा रहा। उन्होंने अपने पिता को कभी देखा नहीं था, पर भीतर एक मौन पीड़ा और अपूर्णता सदा बनी रही।
जब अष्टावक्र कुछ बड़े हुए, तब उन्हें सत्य का बोध हुआ कि उनके पिता जीवित हैं और मिथिला के राजा जनक की सभा से जुड़ी किसी घटना में लुप्त हो गए थे। यह जानकर अष्टावक्र ने मिथिला की यात्रा का निश्चय किया। उनका शरीर वक्र था, चलना कठिन था, पर संकल्प अडिग था।
मिथिला पहुँचकर वे राजा जनक की सभा में गए। वहाँ उन्हें देखकर अनेक विद्वानों ने उपहास किया। किसी ने उनके पैरों की वक्रता देखी, किसी ने पीठ की, किसी ने गर्दन की। तब अष्टावक्र ने अत्यंत शांत स्वर में कहा—“तुम लोग देह के ज्ञाता हो या आत्मा के?” उस एक प्रश्न ने सभा को मौन कर दिया। राजा जनक ने उसी क्षण पहचान लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञानी है।
राजा जनक और अष्टावक्र के बीच जो संवाद हुआ, वही आगे चलकर अष्टावक्र गीता के रूप में प्रसिद्ध हुआ। अष्टावक्र ने जनक को बताया कि बंधन बाहर नहीं, भीतर है; मोक्ष कहीं जाने से नहीं, जानने से है। आत्मा न कर्ता है, न भोक्ता—वह केवल साक्षी है। जनक जैसे विदेह राजर्षि ने उसी क्षण आत्मबोध प्राप्त किया। उन्होंने राज्य में रहते हुए भी स्वयं को मुक्त जाना।
इसके पश्चात अष्टावक्र ने बंदी से शास्त्रार्थ किया और उसे पराजित किया। पराजय के साथ ही रहस्य खुला कि जिन विद्वानों को जल में प्रवाहित किया गया था, वे सब वास्तव में जीवित थे और वही जल उनके लिए साधना–स्थल बन गया था। अष्टावक्र के वचनों से वे सब मुक्त हुए और बाहर आए। उन्हीं में कहोड़ ऋषि भी थे। पिता–पुत्र का मिलन हुआ। कहोड़ ने अपने पुत्र से क्षमा माँगी। कहा जाता है कि उसी क्षण उनके शाप का प्रभाव समाप्त हुआ और अष्टावक्र की देह की वक्रता भी मिट गई—या कुछ परंपराओं के अनुसार, देह वक्र रहते हुए भी वह अप्रासंगिक हो गई।
इसके बाद अष्टावक्र कहीं स्थायी रूप से नहीं रहे। वे न आश्रम में बंधे, न समाज में। वे चलते–फिरते ज्ञान थे—जहाँ कोई जिज्ञासु मिला, वहीं उपदेश दिया। उनके लिए न जीवन का आकर्षण था, न मृत्यु का भय। वे जानते थे कि न जन्म सत्य है, न मरण—सत्य केवल आत्मा है।
अंततः अष्टावक्र का जीवन मौन में विलीन हो जाता है। कोई भव्य अंत नहीं, कोई चमत्कारी देह–त्याग नहीं। जैसे वे आए थे—वैसे ही चले गए। पर जो रह गया, वह है उनका वचन—जो आज भी कहता है कि यदि तुम स्वयं को जान लो, तो इसी क्षण मुक्त हो। शरीर चाहे वक्र हो या सीधा, यदि दृष्टि सीधी है तो वही अष्टावक्र का जीवन–संदेश है।

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