मौन की महीमा उत्तर शब्दों से नहीं, आचरण से
मनुष्य के व्यवहार का सबसे सूक्ष्म, पर सबसे प्रभावशाली आयाम है—शांति। बाह्य उत्तेजनाओं, कटु आलोचनाओं, तानों और क्रोधपूर्ण स्थितियों में शांत रहना कभी भी दुर्बलता का द्योतक नहीं होता, बल्कि यह आत्मबल, धैर्य और अंतर्दृष्टि का संकेत है। प्रकृति भी हमें यही सिखाती है—समुद्र जितना विशाल होता है उतना ही शांत दिखाई देता है, और पहाड़ जितने स्थिर होते हैं उतनी ही दृढ़ता से तूफानों का सामना करते हैं। इसी प्रकार मनुष्य का मौन भी उसके अंतर्निहित सामर्थ्य का दर्पण है।
शांति का वास्तविक अर्थ प्रतिक्रिया रोकना नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना है। शब्दों के माध्यम से दिया गया उत्तर तत्काल राहत तो दे सकता है, परंतु व्यवहार से दिया गया उत्तर चरित्र बनाता है और संसार की स्मृति में स्थायी छाप छोड़ता है। क्रोध में बोले गए शब्द प्राय: पछतावे का कारण बनते हैं, जबकि संयमित मौन परिस्थितियों को शांत करता है, संबंधों को बचाता है और सम्मान अर्जित करता है। जिस व्यक्ति में प्रतिक्रिया देने की क्षमता होने के बावजूद वह उसे संयमित रखता है, वहीं सच्चा ज्ञानी माना जाता है।
शांत रहना एक साधना है—स्वयं पर अधिकार की साधना। जो स्वयं को साध सकता है वही संसार की कठिनाइयों को साध सकता है। जीवन का संघर्ष अक्सर हमें प्रतिक्रिया देने पर बाध्य करता है, परंतु विवेकशील व्यक्ति जानता है कि हर स्थिति में बोलना आवश्यक नहीं। कभी-कभी मौन से अधिक प्रखर कोई उत्तर नहीं होता, क्योंकि शब्द बहस शुरू करते हैं, पर व्यवहार सत्य को सिद्ध करता है। किसी के द्वेष का उत्तर क्रोध से देने पर द्वेष बढ़ता है, परंतु शांति से दिया गया उत्तर दूसरे के अंतर्मन को झकझोरता है; यह करुणा, धैर्य और बुद्धिमत्ता का अदृश्य दर्पण बन जाता है।
मौन का यह सामर्थ्य केवल निजी जीवन में ही नहीं, समाज, राजनीति और आध्यात्मिक साधना में भी प्रतिष्ठित है। संतों ने कहा—”धीरे बोलना सीखो, परंतु धीरे सोचना नहीं।” विचारों की तीव्रता और अभिव्यक्ति की शांति मिलकर मनुष्य को उस संतुलन तक पहुँचाती है जहाँ आक्रोश पिघलता है और अंतर्दृष्टि उदित होती है। यही कारण है कि जिनके भीतर आत्मविश्वास और प्रज्ञा होती है, वे तर्क जीतने की अपेक्षा हृदय जीतने पर विश्वास करते हैं।
व्यवहार से दिया गया उत्तर समय के साथ सार्थक सिद्ध होता है—क्योंकि शब्दों का प्रभाव क्षणिक है, पर कर्मों का प्रभाव स्थायी। जो व्यक्ति मौन रहते हुए भी अपने आचरण से उत्तर देता है, वह दूसरों को जवाब देने की बजाय समझने पर प्रेरित करता है। शांति अंततः मनुष्य को उस ऊँचाई पर ले जाती है जहाँ प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता समाप्त हो जाती है और उपस्थिति ही संदेश बन जाती है।
अतः शांत रहना न तो पराजय है, न पलायन। यह वह ऊँचाई है जहाँ व्यक्ति स्वयं को जीत लेता है। जिस दिन मनुष्य शब्दों की शक्ति से अधिक व्यवहार की प्रभावशीलता को समझ लेता है, उसी दिन वह जान लेता है कि सच्ची विजय प्रतिउत्तर में नहीं, बल्कि स्वयं पर नियंत्रण में निहित है। यही मौन की महिमा है—जहाँ उत्तर बोलते नहीं, चरित्र स्वयं बोलता है।
जय श्री सीताराम!
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मौन की महीमा उत्तर शब्दों से नहीं, आचरण से मनुष्य के व्यवहार का सबसे सूक्ष्म, पर सबसे प्रभावशाली आयाम है—शांति। बाह्य उत्तेजनाओं, कटु आलोचनाओं, तानों और क्रोधपूर्ण स्थितियों में शांत रहना कभी भी दुर्बलता का द्योतक नहीं होता, बल्कि यह आत्मबल, धैर्य और अंतर्दृष्टि का संकेत है। प्रकृति भी हमें यही सिखाती है—समुद्र जितना विशाल होता है उतना ही शांत दिखाई देता है, और पहाड़ जितने स्थिर होते हैं उतनी ही दृढ़ता से तूफानों का सामना करते हैं। इसी प्रकार मनुष्य का मौन भी उसके अंतर्निहित सामर्थ्य का दर्पण है। शांति का वास्तविक अर्थ प्रतिक्रिया रोकना नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना है। शब्दों के माध्यम से दिया गया उत्तर तत्काल राहत तो दे सकता है, परंतु व्यवहार से दिया गया उत्तर चरित्र बनाता है और संसार की स्मृति में स्थायी छाप छोड़ता है। क्रोध में बोले गए शब्द प्राय: पछतावे का कारण बनते हैं, जबकि संयमित मौन परिस्थितियों को शांत करता है, संबंधों को बचाता है और सम्मान अर्जित करता है। जिस व्यक्ति में प्रतिक्रिया देने की क्षमता होने के बावजूद वह उसे संयमित रखता है, वहीं सच्चा ज्ञानी माना जाता है। शांत रहना एक साधना है—स्वयं पर अधिकार की साधना। जो स्वयं को साध सकता है वही संसार की कठिनाइयों को साध सकता है। जीवन का संघर्ष अक्सर हमें प्रतिक्रिया देने पर बाध्य करता है, परंतु विवेकशील व्यक्ति जानता है कि हर स्थिति में बोलना आवश्यक नहीं। कभी-कभी मौन से अधिक प्रखर कोई उत्तर नहीं होता, क्योंकि शब्द बहस शुरू करते हैं, पर व्यवहार सत्य को सिद्ध करता है। किसी के द्वेष का उत्तर क्रोध से देने पर द्वेष बढ़ता है, परंतु शांति से दिया गया उत्तर दूसरे के अंतर्मन को झकझोरता है; यह करुणा, धैर्य और बुद्धिमत्ता का अदृश्य दर्पण बन जाता है। मौन का यह सामर्थ्य केवल निजी जीवन में ही नहीं, समाज, राजनीति और आध्यात्मिक साधना में भी प्रतिष्ठित है। संतों ने कहा—”धीरे बोलना सीखो, परंतु धीरे सोचना नहीं।” विचारों की तीव्रता और अभिव्यक्ति की शांति मिलकर मनुष्य को उस संतुलन तक पहुँचाती है जहाँ आक्रोश पिघलता है और अंतर्दृष्टि उदित होती है। यही कारण है कि जिनके भीतर आत्मविश्वास और प्रज्ञा होती है, वे तर्क जीतने की अपेक्षा हृदय जीतने पर विश्वास करते हैं। व्यवहार से दिया गया उत्तर समय के साथ सार्थक सिद्ध होता है—क्योंकि शब्दों का प्रभाव क्षणिक है, पर कर्मों का प्रभाव स्थायी। जो व्यक्ति मौन रहते हुए भी अपने आचरण से उत्तर देता है, वह दूसरों को जवाब देने की बजाय समझने पर प्रेरित करता है। शांति अंततः मनुष्य को उस ऊँचाई पर ले जाती है जहाँ प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता समाप्त हो जाती है और उपस्थिति ही संदेश बन जाती है। अतः शांत रहना न तो पराजय है, न पलायन। यह वह ऊँचाई है जहाँ व्यक्ति स्वयं को जीत लेता है। जिस दिन मनुष्य शब्दों की शक्ति से अधिक व्यवहार की प्रभावशीलता को समझ लेता है, उसी दिन वह जान लेता है कि सच्ची विजय प्रतिउत्तर में नहीं, बल्कि स्वयं पर नियंत्रण में निहित है। यही मौन की महिमा है—जहाँ उत्तर बोलते नहीं, चरित्र स्वयं बोलता है। जय श्री सीताराम! 🙏🙏












