रंग महल में होरी खेलें,  आनंद उर समाय

श्यामा श्याम की होरी लीला:-
यह छवि बरनी न जाय

होली का समय अति विशेष है क्योंकि इस समय पर उस अद्भुत, अलौकिक रस का ब्रज की बीथियों (गलियों) में सहज ही प्रवाह होता रहता है। स्वामी हरिदास जी महाराज प्रिया प्रियतम की होली लीला का वर्णन इस प्रकार करते हैं:

बिहारी बिहारिनि की रे, मो पे यह छवि बरनी न जाय।
रंग महल में होरी खेलें, अंग अंग रंग चुचाय।।
तन मन मिले जुले मृदु रस में, आनंद उर न समाय।
श्री हरिदास ललित छवि निरखें, सेवत नव नव भाय।।

रंग महल में होली खेलते हुए, रंगों से सराबोर प्रिया प्रियतम के समस्त अंगों से रंग बह रहे हैं। इस होली लीला में इतना आनंद है, सुंदरता है, उत्साह है, आकर्षण है, गति है, ताल है, नृत्य है और सर्वोपरि है योग अर्थात मिलन – जैसे तन और मन एकाकार होते हैं – कि इसकी तुलना संसार के किसी भी सुख से नहीं की जा सकती। मिल जुल कर होली खेलते हुए वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे एक ही प्राण हैं। स्वामी हरिदासजी मोहिनी छवि का दर्शन करते हुए कहते हैं कि इस विलक्षण होली लीला में क्षण प्रतिक्षण नए नए भाव प्रकट हो रहे हैं जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।
बृज मंडल में ग्वाल, गोप तथा गोपिओं के साथ होली खेलते हुए नटखट श्याम का यह स्पष्ट आमंत्रण है – आओ, मेरे साथ खेलो, मेरे साथ नृत्य करो, मुझे रंगो और फिर मेरे रंगों में रंग जाओ, मेरे ही हो जाओ।
मकर संक्रांति पर सूर्य के उत्तरायण होते ही वातावरण में ठण्ड की विभीषिका कम होने लगती है और बसंत पंचमी आते आते तो मन में होली की उमंगें लहर मारने लगती हैं। पर कान्हा के बिना कैसी होली? और कान्हा तो नंदगांव में अपने सखाओं के साथ आनंद मग्न हैं, वो भला बरसाने क्यों आने लगे? बरसाने की चतुर गोपियाँ मिलकर अपने कन्हैया को निमंत्रण भेजतीं हैं।

कान्हा बरसाने में आय जइयो, बुलाए गई राधा प्यारी।
जब कान्हा तोये भूख लगेगी, माखन मिश्री खाय जइयो।।
जब कान्हा तोये प्यास लगेगी, ठंडो पानी पी जइयो।।
जब कान्हा रे तोये ठण्ड लगेगी, काली कमरिया ले जइयो।।
जब कान्हा रे तोये गर्मी लगेगी मोर का पंखा ले जइयो।।

देखिये, कितनी चतुराई पूर्वक निमंत्रण भेजा जा रहा है। मन में तो होली खेलने की इच्छा है परन्तु प्रकट नहीं की जा रही है, कहीं ऐसा न हो कि होली के नाम से डरकर कृष्ण आएं ही नहीं। इसलिए निमंत्रण राधा के नाम से कि कन्हैय्या, बरसाने आकर अपनी प्यारी सखी राधा के साथ खेल जाओ, वो तुम्हें याद कर रही है। अब यदि कृष्ण ये सोचने लगें कि चलो मैं इतनी दूर बरसाने चला तो जाऊँ, पर वहाँ खाऊंगा क्या, पियूँगा क्या क्योंकि वहाँ मैय्या तो है नहीं और खेलते खेलते भूख प्यास तो लगेगी ही। तो गांव के उस छोटे भोले भाले बालक को पहले ही बता दिया जा रहा है कि चिंता मत करना, हमने तुम्हारे खाने, पीने, गर्मी, सर्दी से बचने के लिए सारी व्यवस्था कर रखी है बस तुम आ जाओ। अगर कुछ नहीं बताया जा रहा है तो यह कि यहाँ आने के बाद होली के खेल में तुम्हारी क्या गत बनने वाली है। जैसे ही कृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना पहुंचते हैं, कि अचानक ही बरसाने की गली गली से, घर घर से गोपियाँ निकल पड़ती हैं।
आज तो बृज मंडल में होली है, और होली के साथ साथ बरजोरी भी है, बरजोरी अर्थात जोर जबरदस्ती। अर्थात होली के रंगों से, होली के हुडदंग से अथवा डंडों की मार से कोई भी बचने वाला नहीं है, चाहे वह कोई भी हो। बड़े, छोटे अथवा ऊँचे, नीचे का कोई विचार ही नहीं है। आज तो सभी के मुखों पर समान रूप से चंदन लगेगा, गुलाल लगेगा, रोली मली जाएगी, सभी को टेसू के रंगों से सराबोर किया जायेगा; इत्र, गुलाबजल, केवड़ा आदि सुगन्धित द्रव्यों का छिड़काव होगा और तो और डंडों की मार भी तो सभी को पड़ेगी ही पड़ेगी। तो इस प्रकार होने लगता है होली का हुड़दंग:

आज बिरज में होरी रे रसिया।
होरी रे, होरी रे, बरजोरी रे रसिया।
घर घर ते बृज बनिता आईं कोई सांवर कोई गोरी रे रसिया।।
इत तें आये कुंवर कन्हाई लाला, उत तें आयी राधा गोरी रे रसिया।।
कोई लावे चोवा, कोई लावे चन्दन, कोई मले मुख रोली रे रसिया।।
उड़त गुलाल लाल भये बदरा, मारत भर भर झोरी रे रसिया।।

और गुलाल तो चुटकी या मुट्ठी से नहीं, झोली भर भर कर एक दूसरों की ओर फेंका जा रहा है कि आसमान में गुलाल के कारण लाल लाल रंग के बादल जैसे दिखने लगते हैं। ब्रज की होली केवल रंग और गुलाल तक ही सीमित नहीं रहती है, यह तो आनंद और मस्ती का, हँसने और हँसाने का, झूमने और गाने बजाने का, नाचने और नचाने का, रिझाने और गुदगुदाने का, चिढ़ाने और खिझाने का भी त्यौहार है। और अगर लट्ठमार न हो तो वो होली कैसी? तो कन्हैया के नंदगाव से हुरियारे निकल पड़ते हैं लाड़लीजू के गांव बरसाने की ओर। इनकी तैयारी देखने वाली है – सुन्दर सफ़ेद वस्त्र पहने हैं, सिर पर पगड़ी, फेंट में गुलाल, हाथों में पिचकारी, झोली में इत्र चन्दन आदि, कुछ के पास डफ, ढोलक, पखावज, खरताल जैसे वाद्य यन्त्र, तो कुछ के पास मिठाईयां, साडी, आभूषण और अन्य भेंट सामग्री। लट्ठ और ढाल सभी के पास, क्योंकि लट्ठमार भी तो खेलनी है। लट्ठमार के नियम बहुत ही आसान हैं – केवल गोपियाँ ही आक्रामक रूप से लट्ठ चलाते हुए इन हुरियारों को पीछे धकेलने तथा वापस भगाने का प्रयत्न करेंगी। पुरुष वर्ग उनके लट्ठों की मार को अपने ढाल अथवा लट्ठ पर रोकते हुए अपना बचाव करेंगे, पीछे हटने का अर्थ हार जाना। पुरुष वर्ग आक्रामक रूप से लट्ठ नहीं चलाएंगे, केवल बचाव ही करेंगे। यदि चोट करते करते महिलाएं थक जाएँ तो विजय पुरुषों की।

फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं, नटवर नन्द किशोर।
लै रहे चोट ग्वाल ढालन पै, केसर कीच मले गालन पै, जिन हरियल बांस मंगाए हैं , चलन लगे चहुँ ओर ।।

और खेल में अंतिम विजय गोपिओं की, क्योंकि प्रसन्न तो लाड़लीजू को करना है न, उन्हीं की कृपा से तो बृजवास मिलेगा। यदि उनकी सखियाँ खेल में हार गयीं और कहीं लाड़लीजू गुस्सा कर बैठीं, तो त्यौहार का क्या आनंद? होली में गोपियाँ और क्या क्या करना चाहतीं हैं? लट्ठमार से भी अधिक प्रिय उनका खेल है इस चपल कृष्ण को इसके सखाओं से अलग करके पकड़ लेना, खूब रंगों से रंगना, उसके गाल मसलना और मुंह पर चन्दन और केसर मलना। और तो और कृष्ण के पीताम्बर लकुटी छीनकर उसे लहंगा चोली पहना कर अपने ही सुर ताल पर नचाना। गोपियाँ कृष्ण की बंसी को तो अपना सबसे बड़ा शत्रु मानती हैं क्योंकि कृष्ण को तो अपनी बंसी ही सर्व प्रिय है। कृष्ण तो जहाँ भी दिखते हैं – यमुना के तट पर, कदम्ब की छाया में, गोवर्धन की तलहटी में, कुसुम सरोवर पर, किसी शिलाखंड पर बैठे हुए अथवा कहीं किसी कुञ्ज में – हर समय बस यह बंसी ही उनके अधरों पर रहती है। गोपिओं का मानना है कि इस बंसी के कारण ही तो कृष्ण उनकी ओर देखते भी नहीं हैं। तो उनकी योजना है कि इस होली में कृष्ण को घेर कर उसकी बंसी छीन कर तोड़ मरोड़ कर नष्ट कर दो। जब कृष्ण उनकी ताल पर नाच नाच कर थक जाए, और उनके पैरों पड़ पड़ कर उनकी खूब विनती करे तब उसे छोड़ें।

होली खेलन आयो श्याम, आज जाए रंग में बोरो री।
कोरे कोरे कलश मँगाओ, रंग केशर घोरो री।।
रंग बिरंगो करो आज, जाय कारे ते गोरो री।।
पास पड़ोसिन बोलें , जाय आँगन में घेरो री।।
पीताम्बर ल्यो छीन, जाय पहिराय दो चोरी री।।
हरे बांस की बाँसुरिया, याहि तोड़ मरोड़ो री।।
तारी दे दे याहि नचायो, अपनी औरौ री।।
चंद्र सखी की याहि बीनती, करै निहोरो री।।
हा हा खाय परे जब पैंया, तब याहि छोरो री।।

क्या गोपिआँ अपने इस दिवास्वप्न में सफल हो पातीं हैं? जब कृष्ण अपने सखाओं के साथ गाते बजाते होली खेलने आते हैं और खूब जोर शोर से होली का खेल चल रहा होता है, अवसर पाकर ये चतुर गोपिआँ कृष्ण को किसी प्रकार घेर घार कर अलग कर लेती हैं और अपनी मनमानी करना चाहती हैं। लेकिन कृष्ण को चतुराई से घेरना क्या संभव है? कृष्ण को तो केवल और केवल प्रेम के बंधन में ही बाँधा जा सकता है। वैसे तो बृज की ये गोपिआँ कृष्ण की अनन्य प्रेमी हैं, परन्तु आज तो ये प्रेम के स्थान पर कृष्ण को चतुराई से घेरना चाहती हैं। इनकी मंशा को समझ कर कृष्ण मुट्ठी भर भर कर अबीर इस प्रकार फेंकते हैं कि गोपिओं की आंखों में अबीर भर जाता है और कृष्ण निकल भागते हैं। अब इन चतुर गोपिओं का हाल देखने वाला हो जाता है:
मेरे नैनों में डारो रे अबीर बा।
डार अबीर किते गयो मोहन, वो नटखट बलबीर बा।।
आओ सखी नैक लोचन पोंछो , मेरो ही ले लो चीर बा।।
चंद्र सखी भज बाल कृष्ण छवि, श्याम बड़े बे पीर बा।।
अब ये बेचारी एक दूसरे की आंखें साफ़ कर रहीं हैं और कृष्ण को निर्दई बताते हुए यहाँ वहाँ ढूँढ रहीं हैं। कृष्ण इनकी पकड़ में नहीं आये तो निर्दई हो गए? इनका प्रलाप सुनकर कृष्ण अपनी प्रियतमा राधा रानी के साथ बंसी बजाते हुए मनमोहिनी छवि में प्रकट हो जाते हैं:

डफली बाजे सारंगी बाजे और बाजे मुंह चंग। श्याम सुन्दर की बंशी बाजे राधेजू के संग।।
रंग, मैं कैसे होरी खेलूंगी या सांवरिया के संग?

अब इन बेचारी गोपिओं को यह दुःख कि यह नटखट कृष्ण तो चंगुल से निकल गया और राधेजू के साथ आनंद पूर्वक बंसी बजा रहा है, अब हमें इसके साथ होली खेलने का अवसर कैसे मिलेगा? और अब जब कृष्ण की घेराबंदी करने की सारी चतुराई पूर्ण योजनाएं असफल हो चुकी हैं, कृष्ण सारी गोपिओं की आँखों में अबीर मार मार कर उनका हाल बेहाल कर देते हैं और स्वयं प्रियाजू के साथ आनंद से बंसी बजा रहे हैं तब ये चतुर गोपिआँ चतुराई छोड़कर कृष्ण की शरण आती हैं, कहती हैं – हे कृष्ण हमें अपना लो, हम तो मन वाणी कर्म से आपका ही चिंतन करती हैं, होली में थोड़ी ठिठोली तो होती ही है अब हमें और मत सताओ, अपने साथ होली खेलने के दिव्य रस का हमें भी पान कराओ। बस, इतना सुनते ही कृष्ण मुस्कराते हैं और सभी बृजवासी सखा, सखी, श्याम श्यामा जू मिल जुल कर होली खेलते हुए कैसा मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं

वृन्दावन, धूम मची होरी।
सखन सखिन को, सखिन सखन को, लै पिचकारिन रंग बोरी।
लली लाल मंडल बिच ठाड़े, दुहुँन , दुहुँन, किय सरबोरी।
लाल गुलाल, लाल भये बादर ,लाल लाल भई ब्रज खोरी।
अस्त व्यस्त सब के पट भूषन, करत परस्पर झकझोरी।

बृजमाधुरी
चलो अइयो रे श्याम मेरी पलकन पे।
तू तो रीझो मेरे नवल जोबना, मैं रीझी तेरे तिलकन पे।
तू तो रीझो मेरी लटक चाल पे, मैं रीझी तेरी अलकन पे।
पुरुषोत्तम प्रभु की छवि निरखैं, अबीर गुलाल की झलकन पे।

Share on whatsapp
Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *