निर्मल भक्ति और समर्पण
यमुना तट पर खेल रचाया,
कान्हा ने जब चीर चुराया,
भ्रम में थीं गोपियाँ भारी ,
मन में था कोलाहल भारी,
भ्रम में डूबी पड़ी बेचारी,
खींच रहे थे श्याम,
अपनी भक्ति की ओर
लोक-लज्जा का त्याग सिखाया,
अहंकार का परदा गिराया
प्रभु के आगे क्या छिपाना,
तन का नहीं, मन का अर्पण माना,
वस्त्र नहीं…… ,
ये माया के बंधन थे,
जो प्रभु और भक्त के बीच के क्रंदन थे।
जब तक देह का मोह सताएगा,
ईश्वर का साक्षात्कार न हो पाएगा,
निर्भय होकर जो शरण में आए,
वही तो सच्ची प्रीति पाए
शुद्ध हृदय ही पावन धाम यही सिखाते पूर्ण काम !!!!
जय श्री राधे कृष्णा राधे राधे













