भक्तों की पहचान

 भगवान विष्णु ने रामानुज चार्य को अपने भक्तों की पहचान बतायी।

 एक समय की बात है। महान वैष्णव आचार्य श्री रामानुजाचार्य कठोर तपस्या में लीन थे। उनका एक ही 
प्रश्न था— हे नारायण! आपका सच्चा भक्त कौन है?

 आप किनसे सबसे अधिक प्रसन्न होते हैं? लगातार भक्ति, सेवा और वैराग्य से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए।

 रामानुजाचार्य ने दंडवत प्रणाम किया और विनयपूर्वक पूछा— प्रभु, कृपा कर बताइए कि आपके भक्तों की पहचान क्या है?

 तब भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले  रामानुज!
मेरा भक्त वह नहीं जो केवल मंदिरों में दिखे,
मेरा भक्त वह भी नहीं जो केवल शास्त्रों का ज्ञान रखे।

 मेरा सच्चा भक्त वह है— जो अहंकार से दूर रहता है
जो दुखी को देखकर व्यथित हो उठता है, जो सेवा को पूजा मानता है,  जो नाम मेरा लेता है, पर निंदा किसी की नहीं करता,  जो स्वयं भूखा रह सकता है, पर अतिथि को भूखा नहीं जाने देता।

 भगवान ने आगे कहा— जो व्यक्ति अपने मन, वाणी और कर्म से दूसरों को कष्ट नहीं देता, वही वास्तव में मेरा पूजक है।

 यह सुनकर रामानुजाचार्य की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने समझ लिया कि— भक्ति केवल पूजा नहीं, भक्ति तो करुणा, सेवा और समर्पण है।

 उसी दिन से उन्होंने यह संदेश फैलाया भगवान मंदिर में नहीं, भक्त के हृदय में निवास करते हैं।

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