ब्रह्मा भी समझ न पाए कृष्ण की लीला… और टूट गया उनका अहंकार
वृंदावन की हरी-भरी वादियों में एक दिन बाल गोपाल श्रीकृष्ण अपने सखा-साथियों के साथ गायें चराने और खेलकूद में मग्न थे। हँसी-मजाक, माखन की बातें और बांसुरी की धुन से पूरा वन आनंद से भर गया था।
उधर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के मन में एक विचार उठा
क्या यह सच में वही परम भगवान हैं? क्यों न इनकी परीक्षा ली जाए!
यह विचार वास्तव में उनकी जिज्ञासा से ज्यादा अहंकार का परिणाम था।
ब्रह्मा जी ने अवसर देखा। दोपहर का समय था, सभी बाल ग्वाल और गायें खेलकर थक चुके थे और विश्राम कर रहे थे। उसी क्षण ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य शक्ति से सभी ग्वालबाल और गायों को सम्मोहित कर स्वर्ग में छिपा दिया।
अब वे देखना चाहते थे कि जब कृष्ण अपने प्रिय मित्रों को नहीं पाएंगे तो क्या करेंगे।
लेकिन वे भूल गए थे…
जिसकी लीला में पूरा ब्रह्मांड चलता है, उसे कौन छल सकता है?
श्रीकृष्ण सब समझ गए। उन्हें अपने मित्रों की चिंता नहीं थी, पर उन्हें यह चिंता थी कि जब शाम को वृंदावन की माताएँ अपने बच्चों को न देखेंगी तो कितना दुख होगा।
तभी भगवान ने एक अद्भुत लीला रची।
श्रीकृष्ण स्वयं हर एक ग्वालबाल और हर एक गाय का रूप बन गए।
संध्या होते ही वही बच्चे, वही गायें अपने-अपने घर लौट आईं।
लेकिन किसी को पता ही नहीं चला कि
आज उनके घर में उनका पुत्र नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण पधारे हैं।
उस दिन वृंदावन की हर माता को अपने बच्चे से पहले से भी अधिक प्रेम और ममता महसूस हुई। मानो उनका हृदय अनंत स्नेह से भर गया हो।
कुछ समय बाद जब ब्रह्मा जी लौटे और यह दृश्य देखा—
तो वे हैरान रह गए।
उन्होंने देखा कि जिन बच्चों और गायों को वे छिपाकर ले गए थे, वे तो वहीं हैं… और हर एक रूप में स्वयं नारायण का तेज चमक रहा है।
तभी ब्रह्मा जी समझ गए—
यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं परम ब्रह्म श्रीकृष्ण हैं।
उनका अहंकार उसी क्षण टूट गया और वे भगवान के चरणों में गिर पड़े।
यही तो कृष्ण की लीला है—
जहाँ अहंकार मिटता है और प्रेम प्रकट होता है।
क्योंकि
कृष्ण परीक्षा नहीं देते… वे तो केवल प्रेम से सबका हृदय जीत लेते हैं।
जय श्री राधे कृष्णा













