सर्वश्रेष्ठ भाव समर्पण

हृदय के भाव में सर्वश्रेष्ठ है समर्पण! जिस भाव में व्यक्ति समर्पित ना हो वो भाव व्यर्थ है,वो प्रेम व्यर्थ है.. प्रेम प्रगाढ़ वही जहाँ भाव शुद्ध हो..बिन हाथों का स्पर्श हो..यानि मर्मस्पर्शी!!परन्तु ऐसा प्रेम कहाँ सम्भव है। जहाँ मानसिकता सिर्फ वासना युक्त हो,विचारों में पवित्रता ही ना हो वो प्रेम कोई प्रेम है!

ऐसे स्थिति में सम्भव ही नहीं कृष्ण को प्रेम का प्रतीक कहकर फिर प्रेम में आतुरता,विवशता, और स्वार्थता को रखना भी,ज़रूरी बना रहे। ऐसे में कृष्ण और शिव से प्रेम की तुलना करके अपने प्रेम का बखान करना मुझे धुर्तता लगती है। मेरे हिसाब से प्रेम हर सदी में वैसा ही रहता है जस का तस,बस लोग उसे निभाने और समझने में समय नहीं व्यर्थ करते क्योंकि उन्हें खुद नहीं पता कि उन्हें जानना व्यर्थ प्रतीत होता है इसलिए बने बनाए कायदों से ही चलना उचित लगता हैं,जबकि प्रेम का कोई कायदा ही नहीं,बस मन में उतरना ही प्रेम है,ऐ कहना जितना आसान है उतना ही मुश्किल है इस बात को समझ पाना,”क्योंकि सरलता सबसे कठिन भाव है।”

प्रेम स्वतंत्रता है,बंधन से मुक्ति है,भीतर पनप जाने वाला बैराग्य है,आतुरता व विवशता प्रेम का अंग नहीं यह केवल मोह का अंग है..!!ऐसा मुझे लगता है!!

Share on whatsapp
Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *