संसार सागर में अंधेरे और उजाले दोनों हैं…
जरूरी नहीं कि हम अपने इन बाहर खुले हुए नेत्रों से दिखाई दे रहा है वह ही सत्य का उजाला हो, उस चमकते हुए उजाले की परत के पीछे छिपा हुआ घना अंधकार भी हो सकता है, इस मानव देह में एक तीसरा ज्ञान चक्षु भी होता है…
जिसके द्वारा अंधेरों और उजालों का अन्तर समझ आता है, जिसके द्वारा संसार ही नहीं संसार को बनाने वाला, जो कण-कण में बसा हुआ है, जो सर्वव्यापक है, जो कर्ता – हर्ता है वह भी दिखाई देता है…
जय श्री कृष्ण













