कुंती  पुत्र कर्ण

कर्ण को कुंती ने बचपन में ही नदी में बहा दिया था तब तो उसका नामकरण भी नहीं हुआ होगा फिर कुंती को कैसे पता चला कि कर्ण मेरा वही पुत्र है जिसे मैंने विवाह पूर्व उत्पन्न कर नदी में बहा दिया था?

अब उस समय के भूगोल को समझिए जो महाभारत के इस श्लोक में वर्णित है…

मंजूषा त्वश्वनद्या: साययौं चर्मण्वतीं नदीम् चर्मण्वत्याश्च यमुनां ततो गंगां जगाम है।
गंगाया: सूतविषयं यम्पामनुययै पुरीम्।

कुंती रहती थी भोजपुर में जो अश्व नदी के किनारे था। कुंती ने अपने दुधमुँहे बालक को लकड़ी की पेटी में रखा और अश्व नदी में बहा दिया, अश्व नदी से वो पेटी चर्मण्वतीं नदी में आई, इस नदी से फिर यमुना में आई फिर प्रयाग में यमुना से गंगा नदी में आई फिर गंगा नदी में बहते-बहते चम्पानगरी में अधिरथ को मिल गई।

हां, कुंती को कर्ण के बारे में पता था।
महाभारत में, कुंती ने कर्ण को यह रहस्य बताया था कि वह उनके पुत्र हैं।
कुंती ने सालों से यह रहस्य छिपाकर रखा था।
जब महाभारत युद्ध के समय दुर्योधन की तरफ़ कर्ण को देखकर कुंती विचलित थीं, तब उन्होंने कर्ण से यह रहस्य बताया था।
कर्ण के बारे में कुछ और बातें:
कर्ण का जन्म कुंती के अविवाहित रहते हुए हुआ था.
कर्ण को सूर्य देव का अंश माना जाता है.
कर्ण को अधिरथ और राधा ने पाला था.
कर्ण को ‘सूतपुत्र’ भी कहा जाता था.
कर्ण के कान बहुत ही सुंदर थे, इसलिए उसका नाम कर्ण रखा गया था.
कर्ण को यह पता चल गया था कि उसके पिता सूर्यदेव हैं, लेकिन वह नहीं जानता था कि उसकी असली मां कौन है.
कर्ण, दुर्योधन का पक्का दोस्त था और दुर्योधन ने ही उसे अंगदेश का राजा बनाया था.

भीष्म पितामह यह जानते थे कि कर्ण, कुंती का पुत्र हैं। लेकिन कैसे जानते थे यह छूट जाता है, जिससे इसका उत्तर जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

कब बताते हैं पितामह भीष्म यह राज –

महाभारत युद्ध के दसवें दिन पितामह भीष्म अर्जुन की बाण वर्षा (शिखंडी की ओट से) से घायल होकर शरशय्या पर लेटे हुये होते हैं, तब कौरव और पांडव पक्ष के सभी लोग उनके पास आए। उनके चले जाने के उपरांत कर्ण पितामह को एकांत में देखकर उनसे मिलने जाता है। पितामह को इस अवस्था में देख कर्ण सभी बैर भुलाकर भावुक हो जाता है, जिससे उस समय कर्ण की आखों में आंसू छलक आये होते हैं और अश्रुगद्गदगण्ठ होकर उसने पितामह को निद्रावस्था के समान बंद आँखों को देखकर पुकारा – पितामह भीष्म! ‘भीष्म! भीष्म! महाबाहो! कुरुश्रेष्ठ! मैं वही राधापुत्र कर्ण हूं, जो सदा आपकी आंखों में गड़ा रहता था और जिसे आप सर्वत्र द्वेषदृष्टि से देखते थे।’ मैं आपसे मिलने आया हूँ।

चित्रः शरशय्या पर पितामह

पितामह ने आंखे खोलकर कर्ण को देखा और सहर्ष उसके हाथ को स्पर्श कर बोले, तुम राधेय नहीं हो, तुम्हारे पिता अधिरथ नहीं हैं, ना तुम राधेय हो। तुम कुंती के पुत्र कौन्तेय हो।

यह बात कर्ण भी पहले से जानता था कि वो सूतपुत्र नहीं है, किन्तु वह यह नहीं जानता था कि यह बात पितामह भी जानते हैं। जब उसे इस बात का पता चला तो वो आश्चर्यचकित होकर पितामह से बोला, पितामह! आप भी जानते हैं कि मैं सूतपुत्र नहीं, कौन्तेय हूँ।

तब पितामह ने कर्ण को बताया –

हाँ, मैं जानता था मैंने नारदजी से तुम्हारा परिचय प्राप्त किया था।

उसके उपरांत पितामह बात को आगे बढ़ाते हुए बोले, महाबाहो! तुम कुंती और भगवान सूर्य के पुत्र हो। यह मुझे नारदजी से तुम्हारा परिचय पूछने पर ज्ञात था। इसके उपरांत श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास से भी तुम्हारे जन्म का वृत्तांत ज्ञात हुआ था और जो कुछ ज्ञात हुआ, वह सत्य है। इसमें संदेह नहीं हैं। तुम्हारे प्रति मेरे मन में द्वेष भी नहीं है; यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ

निष्कर्ष – भीष्म पितामह को यह ज्ञात था, जो नारदजी और व्यास जी ने बताया किन्तु उन्होने यह भेद कभी खोला नहीं था। उन्हें यह भेद कब प्राप्त हुआ इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है।

धन्यवाद।

Kunti had drowned Karna in the river in his childhood, so he would not have even been named, then how did Kunti know that Karna was the same son of mine whom I had given birth to before marriage and drowned in the river?

Now understand the geography of that time which is described in this verse of Mahabharata…

Manjusha went to the horse river: the river Charmanvati and the river Yamuna and then to the Ganga.
I followed Yampa to the city about the charioteer of the Ganges

Kunti lived in Bhojpur which was on the banks of river Ashva. Kunti kept her infant child in a wooden box and floated it in the Ashva river. From the Ashva river, the box came to the Charmanvatin river, from this river it again came to the Yamuna, then from the Yamuna to the Ganga river in Prayag and then flowed in the Ganga river. Adhirath was found in the flowing Champanagari.

Yes, Kunti knew about Karna.
In the Mahabharata, Kunti revealed the secret to Karna that he was her son.
Kunti had kept this secret hidden for years.
During the Mahabharata war, when Kunti was upset after seeing Karna towards Duryodhana, she told this secret to Karna.
Some more things about Karna:
Karna was born while Kunti was unmarried.
Karna is considered a part of Sun God.
Karna was brought up by Adhiratha and Radha.
Karna was also called ‘Sutaputra’.
Karna’s ears were very beautiful, hence he was named Karna.
Karna had come to know that his father was Suryadev, but he did not know who his real mother was.
Karna was a close friend of Duryodhana and it was Duryodhana who made him the king of Angadesha.

Grandfather Bhishma knew that Karna was the son of Kunti. But how they knew is left out, due to which curiosity arises to know the answer.

When does Grandfather Bhishma tell this secret –

On the tenth day of the Mahabharata war, grandfather Bhishma was lying on the bed after getting injured by Arjun’s arrow (from behind Shikhandi), then all the people from the Kaurava and Pandava sides came to him. After his departure, Karna sees his grandfather alone and goes to meet him. Seeing his grandfather in this state, Karna forgets all the enmity and becomes emotional, due to which tears welled up in Karna’s eyes and after seeing his grandfather with his eyes closed like in sleep, he called out – Grandfather Bhishma! ‘Bhishma! Bheeshma! Great arms! Kurushrestha! I am the same Radhaputra Karna, who was always in your eyes and whom you looked at everywhere with hatred.’ I have come to meet you.

Picture: Grandfather on the arrow bed

The grandfather opened his eyes and looked at Karna and happily touched his hand and said, You are not Radheya, your father is not Adhiratha, nor are you Radheya. You are Kaunteya, son of Kunti.

Karna already knew that he was not the son of Suta, but he did not know that his grandfather also knew this. When he came to know about this, he was surprised and said to his grandfather, Grandfather! You also know that I am not Sutaputra, but Kaunteya.

Then the grandfather told Karna –

Yes, I knew that I had got your introduction from Naradji.

After that the grandfather took the matter further and said, Mahabaho! You are the son of Kunti and Lord Surya. I came to know about this after asking Naradji about your introduction. After this, the story of your birth was also known from Shri Krishna Dwaipayan Vyas and whatever was known is true. There is no doubt about it. I don’t even have any hatred towards you; This is the truth I tell you.[1]

Conclusion – Grandfather Bhishma knew this, which was told by Naradji and Vyas ji, but he never revealed this secret. There is no clear information as to when he received this distinction.

Thank you.

🙏Jai Shri Krishna🙏

Share on whatsapp
Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *