गोपी, एक भाव है, स्थिति है, भक्ति मार्ग की एक अत्यंत उच्च और निर्मल अवस्था है।
गोपी भाव का अर्थ ‘स्त्री’ बनना या बाजार से लहंगा फरियां ( गोपी ड्रेस ) खरीद कर पहन लेने से नाये है या केशी घाट पर नाचते भय वीडियो बनावे से है, बल्कि अपने भीतर उस स्त्री-सुलभ कोमलता, समर्पण और निस्वार्थ प्रेम को जगाना है जो जीव (आत्मा) का अपने आराध्य (परमात्मा) के प्रति होना चाहिए।
गोपी भाव में भगवान के लिए संसार के मोह का क्षणभर में त्याग करने की शक्ति होती है।
1 निस्वार्थ और निष्काम प्रेम –
गोपी भाव का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि इसमें भक्त की अपनी कोई इच्छा नहीं होती। गोपियाँ कृष्ण से इसलिए प्रेम नहीं करती थीं कि उन्हें स्वर्ग चाहिए या मोक्ष; उनका एकमात्र लक्ष्य कृष्ण को सुख पहुँचाना था।
तत्सुख-सुखित्वम्— अर्थात् प्रियतम (कृष्ण) के सुख में ही अपना सुख मानना।
2 अनन्य भक्ति –
गोपियों ने कृष्ण के लिए समाज, लोक-लाज और यहाँ तक कि अपने परिवार की मर्यादाओं की भी चिंता नहीं की। उनके लिए कृष्ण ही सर्वस्व थे। गोपी भाव में भक्त संसार के सभी बंधनों से ऊपर उठकर केवल ईश्वर से जुड़ जाता है।
3 माधुर्य भाव –
भक्ति के पंच रसों (शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य) में माधुर्य भाव को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गोपी भाव इसी माधुर्य भाव की पराकाष्ठा है, जहाँ भक्त भगवान को अपने ‘प्रियतम’ या ‘स्वामी’ के रूप में देखता है।
4 देह-अध्यास का अभाव –
गोपी भाव कोई शारीरिक कामवासना नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह अध्यात्मिक है। यह शरीर के स्तर से ऊपर उठकर आत्मा का परमात्मा से मिलन है। चैतन्य महाप्रभु के अनुसार, यह प्रेम निर्मल दर्पण की तरह स्वच्छ होता है।
5 शरणागति –
गोपियों का कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण था। जब कृष्ण ने वृंदावन छोड़ा और मथुरा चले गए, तब भी गोपियों का प्रेम कम नहीं हुआ, बल्कि ‘विरह’ (बिछड़न) में उनका भाव और गहरा हो गया। इसे ‘विप्रलंभ श्रृंगार’ कहा जाता है।
गोपी भाव कैसे प्राप्त होता है?
संतों के अनुसार, गोपी भाव साधना से अधिक कृपा से मिलता है।
इसके लिए:
अहंकार का पूर्ण त्याग आवश्यक है।
संसार की आसक्ति छोड़कर कृष्ण में मन लगाना पड़ता है।
मंजरी भाव या सखी भाव की उपासना की जाती है।
गोपी भाव को गहराई से समझने के लिए महारास रास पंचाध्यायी का प्रसंग सबसे महत्वपूर्ण है। जब भगवान कृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात को अपनी वंशी बजाई, तो गोपियों की जो प्रतिक्रिया थी, वही गोपी भाव का जीवंत उदाहरण है।
1लोक-मर्यादा का त्याग
जैसे ही वंशी की ध्वनि कानों में पड़ी, गोपियाँ अपने सारे काम छोड़कर वन की ओर दौड़ पड़ीं। भागवत पुराण वर्णन करता है कि:
जो दूध दुह रही थीं, उन्होंने दूध आधा छोड़ दिया।
जो भोजन परोस रही थीं, वे वैसे ही चल दीं।
जो अपने पति या बच्चों की सेवा कर रही थीं, वे सब बंधन तोड़कर निकल पड़ीं।
2 अहंकारका मर्दन (मान भंग)
रास के दौरान जब गोपियों के मन में यह सूक्ष्म गर्व आया कि “भगवान केवल मेरे साथ नाच रहे हैं, तब कृष्ण तुरंत वहाँ से अंतर्ध्यान (गायब) हो गए।
कृष्ण ने सिखाया कि गोपी भाव में मैं (अहंकार) के लिए कोई जगह नहीं है।
जब गोपियाँ विरह में रोने लगीं और पूरी तरह अहंकार शून्य हो गईं, तब कृष्ण पुनः प्रकट हुए।
3 गोपी गीत: प्रेम की पराकाष्ठा
जब कृष्ण गायब हो गए, तब गोपियों ने जो विरह गीत गाया, उसे ‘गोपी गीत’ कहा जाता है। इसमें वे कहती है।
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्…
अर्थात् हे कृष्ण! आपकी कथाएं हमारे जैसे दुखी लोगों के लिए अमृत के समान हैं। यहाँ गोपियाँ अपनी मुक्ति नहीं, बल्कि कृष्ण के चरणों की धुल बनने की इच्छा करती हैं।
4. उद्धव का ज्ञान और गोपियों का प्रेम
यह प्रसंग सबसे प्रसिद्ध है। जब कृष्ण ने अपने ज्ञानी मित्र उद्धव को गोपियों को समझाने भेजा कि ईश्वर निराकार है, तुम योग करो, तब गोपियों ने अपने तर्क से उद्धव को निरुत्तर कर दिया।
गोपियों ने कहा— “उद्धव! मन ना भये दस-बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को आराधे ईस॥ (अर्थात्: हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं, एक ही मन था जो कृष्ण के साथ चला गया, अब हम तुम्हारे निराकार ईश्वर की पूजा किस मन से करें?)
उद्धव, जो स्वयं को बहुत बड़ा ज्ञानी समझते थे, गोपियों के चरणों की धूल बनने की प्रार्थना करने लगे। उन्होंने स्वीकार किया कि गोपी भाव के सामने सारा ज्ञान और योग फीका है।
एक बार कृष्ण ने लीला रची और उन्हें तेज सिरदर्द हुआ। उन्होंने नारद जी से कहा कि यदि मेरा कोई परम भक्त अपने चरणों की धूल (चरणामृत) मेरे माथे पर लगा दे, तो मेरा दर्द ठीक हो जाएगा।”
नारद जी बड़े-बड़े भक्तों और रानियों के पास गए, लेकिन सब डर गए कि भगवान के सिर पर अपने पैर की धूल लगाने से उन्हें नरक मिलेगा।
लेकिन जब नारद जी वृंदावन की गोपियों के पास पहुँचे, तो उन्होंने बिना एक पल सोचे अपने पैरों की धूल दे दी।
उन्होंने कहा— चाहे हमें करोड़ों वर्षों तक नरक भोगना पड़े, लेकिन हमारे प्रियतम का दुःख दूर होना चाहिए।
यही गोपी भाव का असली स्वरूप है— स्वयं के सर्वनाश की चिंता न करते हुए प्रियतम का सुख चाहना।












