अलौकिक माखन लीला

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एक दिन कान्हा जी छुपते छुपाते एक गोपी के घर में प्रवेश हुए। चारो तरफ माखन की मटकी ढुंढ रहे थे। और घर में कोई नहीं था।
कान्हा जी को मटकी मिल गयी तो आराम से बैठ कर मटकी में से माखन खा रहे  हैं। लेकिन गोपी घर के पीछे वाली जगह पर ही थी।
गोपी को चुपड चुपड की आवाज सुनाई दी, तो उसे लगता है कि बिल्ली आई है शायद।
गोपी चुपचाप अंदर से आकर देखती है तो कान्हा जी माखन खाने में मस्त है।
उसी समय गोपी ने कान्हा का हाथ पकड़ लिया। और थोडी क्रोधित सी बोली : क्यों रे , क्या कर रहा है चोरी छुपे?
कान्हा जी ने कहा कि मैं तो खेलते हुए अंदर आया तो देखा कि माखन की मटकी नीचे है और आसपास चिंटियां है।
गोपी ने देखा कि कान्हा जी के हाथों में और होंठ पर माखन लगा हुआ है।
गोपी थोडे क्रोधित भाव से कहती हैं : चिंटियां क्या तेरे मुख पर भी आ गयी थी? माखन तो तेरे होठ पर भी लगा हुआ है।
कान्हा जी ने बडी मासुमियत से कहा कि मैं माखन में से चिंटियां निकाल रहा था तब एक मक्खी मेरे मुख पर मंडरा रही थी, उसको उड़ाने लगा तो हाथ होठों को छु गया है शायद।गोपी बोली : शायद ह। अब गोपी थोडा क्रोधित होकर कहती हैं कि तु मेरे घर में आया क्यों?
मेरा घर क्या कोई खेलने का मैदान है?
कान्हा जी ने बडी मासुमियत से कहा कि एक तो मैं चिंटी निकालकर अच्छा काम कर रहा था और तु मुझे डांट रही है।यह कहकर कान्हा अपनी आंखे मलने लगे जैसे रोना आता हो।फिर कन्हैया ने बडे दार्शनिक भाव से कहा- अरी प्यारी सखी- तू रोज कथा मे तो जाती है, फिर भी तू मेरा-तेरा छोड़ती नही। इस घर का मै धनी हूँ। यह भी मेरा घर है।
अब गोपी को आनंद हुआ कि मेरे घर को कन्हैया अपना घर मानते हैं, कन्हैया तो सबका मालिक है। सभी घर उसी के हैं उसको किसी की आज्ञा लेने कि जरूरत नही।
अब गोपी को थोड़ा आनंद आता है तो झुठमुठ गुस्सा होकर कहती है- झुठ मत बोल, यह बता दें कि तूने माखन क्यों खाया?कान्हा जी ने कहा- माखन किसने खाया है।मैंने अभी कहा तो था कि इस माखन मे चींटी चढ़ गई थी, तो उसे निकालने को हाथ डाला, और तभी एक मक्खी को मुख से उडाने में मेरा हाथ होठ को छु गया, इतने मे ही तू टपक पड़ी।
कान्हा जी भी जान गये थे कि गोपी को आनंद आ रहा है तो थोडा ज्यादा आनंद देने के लिए कहते हैं कि:- अब तु मुझे डोरी से बांधेगी और फिर मेरी उलाहना भी करेगी।तब गोपी को सुज गया कि आज तो कन्हैया को बांध कर दुसरी गोपियों को भी दिखाती हुं।
अब गोपी ने सोचा कि कन्हैया स्वयं डोरी से बांधने का याद करवा रहा है। अब गोपी ने पीछे लाला को घर मे खम्भे के साथ डोरी से बाँध दिया है।
तब कान्हा जी अपने श्री अंग को थोड़ा फुलाते हैं ताकि गोपी को यह लगे कि कन्हैया को कस कर बांध लिया है।
लेकिन कन्हैया का श्रीअंग बहुत ही कोमल है। गोपी ने जब डोरी कस कर बाँधी तो लाला की आँख मे पानी आ गया।
अब गोपी को थोड़ी दया आई। उसने लाला से पूछा- लाला, तुझे कोई तकलीफ हो रही है क्या?
तो कान्हा जी ने बडी मासुमियत से गर्दन हिलाकर कहा- मुझे बहुत दुख रहा है। डोरी जरा ढीली करो न।
गोपी ने विचार किया कि लाला को डोरी से कस कर बाँधना ठीक नही। मेरे लाला को दुःख होगा तो, इसलिए गोपी ने डोरी थोड़ी ढीली कर दी। और सखियों को खबर देने गई कि देखो आज मैने लाला को बाँधा है।
यहां पर एक गूढ भाव है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम मुझे अपने प्रेम से बाँधो अवश्य, परंतु सभी से कहो नहीं।क्योंकि सभी अधिकारी नहीं होते हैं।

तुम खूब भक्ति करो परंतु उसे सभी के सामने प्रकाशित मत करो।क्योंकि सभी अधिकारी नहीं होते।

भक्ति के प्रकाशित होने से भक्ति बढ़ती नही,और भक्ति मे आनंद आता नही।
अब जब गोपी बाहर जाती है तो कान्हा जी अपने श्रीअंग को थोड़ा सकुचाते हैं तो डोरी थोड़ी ढीली हो जाती है।और कान्हा जी डोरी से बाहर आ जाते हैं।
गोपी बाहर से अंदर आती है तो अचम्भित होकर देखती है कि जिस डोरी से कन्हैया को बांधा था वो डोरी अब कन्हैया के हाथों में नाच रही है।बालकृष्ण जी शरीर को ढीला करके डोरी से बाहर निकल गये और डोरी अपने हाथों में घुमाते हैं और गोपी को अंगूठा दिखाते हैं ।

फिर कान्हा जी बडी मासुमियत से कहते हैं : अरे भोली गोपी, तुझे बाँधना ही नहीं आता है।देख तो।
तब गोपी कहती है – तो मुझे बता, किस तरह से बाँधना चाहिए। गोपी को तो लाला के साथ आनंद की प्राप्ति करनी थीं ।
और अब कान्हा जी को भी एक लीला करने की इच्छा हुई।
अब कान्हा जी उस गोपी को उसकी ही डोरी से बांधने लगे।

जब योगीजन मन से… श्रीकृष्ण का स्पर्श करते हैं तो समाधि लग जाती है ….
यहाँ तो गोपी को प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण का स्पर्श हुआ है।

गोपी लाला के दर्शन मे तल्लीन हो जाती है। गोपी को ब्रह्म ज्ञान हो जाता है।
थोडी देर के बाद गोपी को सुधी आती है तो अपने आप को बंधा हुआ पाती है। अब कान्हा जी ने गोपी को बाँध दिया था।
गोपी कहती है – लाला अब मुझे भी बांधना आ गया है। अब मुझे छोड़!
कान्हा जी तो उसके सामने मधुर मुस्कान से देखते हुए नीचे ही बैठ गए।
बहुत बार कहने के बाद गोपी रोने लगीं।तो उस गोपी को रोते देख कर कान्हा जी भी नीचे बैठे बैठे रोने लगते हैं।
अब कान्हा जी को भी रोते हुए देखा तो गोपी अचम्भित हो कहती हैं कि तु क्युं रो रहा है। कष्ट तो मुझे हो रहा है और रो तुम रहे हो।

तब कान्हा जी ने कहा कि मुझे बांधना आता है परन्तु छोडना नहीं आता इसलिए मैं भी तेरे साथ रो रहा हूँ।
और फिर कान्हा जी गोपी को बंधी हुई छोडकर ही बाहर चले जाते हैं।क्योंकि यह गोपी अधिकारी थी। प्रभु जिस जीव को एकबार बांधते हैं उस जीव को कभी भी  नहीं छोडते हैं।

परन्तु यह जीव (मानव) एक ऐसा प्राणी है, जिसको छोड़ना आता है। चाहे जितना प्रगाढ़ सम्बन्ध क्यों न हो परंतु स्वार्थ सिद्ध होने पर उसको एक क्षण में ही छोड़ सकता है।

लेकिन प्रभु अधिकारी जीव को एक बार बाँधने के बाद छोड़ते नही….!!
आशा है कि आप सभी को इस लीला से अलौकिक आनंद की प्राप्ति हुई होगी।

श्री बाल कृष्ण लाल की जय हो



एक दिन कान्हा जी छुपते छुपाते एक गोपी के घर में प्रवेश हुए। चारो तरफ माखन की मटकी ढुंढ रहे थे। और घर में कोई नहीं था। कान्हा जी को मटकी मिल गयी तो आराम से बैठ कर मटकी में से माखन खा रहे हैं। लेकिन गोपी घर के पीछे वाली जगह पर ही थी। गोपी को चुपड चुपड की आवाज सुनाई दी, तो उसे लगता है कि बिल्ली आई है शायद। गोपी चुपचाप अंदर से आकर देखती है तो कान्हा जी माखन खाने में मस्त है। उसी समय गोपी ने कान्हा का हाथ पकड़ लिया। और थोडी क्रोधित सी बोली : क्यों रे , क्या कर रहा है चोरी छुपे? कान्हा जी ने कहा कि मैं तो खेलते हुए अंदर आया तो देखा कि माखन की मटकी नीचे है और आसपास चिंटियां है। गोपी ने देखा कि कान्हा जी के हाथों में और होंठ पर माखन लगा हुआ है। गोपी थोडे क्रोधित भाव से कहती हैं : चिंटियां क्या तेरे मुख पर भी आ गयी थी? माखन तो तेरे होठ पर भी लगा हुआ है। कान्हा जी ने बडी मासुमियत से कहा कि मैं माखन में से चिंटियां निकाल रहा था तब एक मक्खी मेरे मुख पर मंडरा रही थी, उसको उड़ाने लगा तो हाथ होठों को छु गया है शायद।गोपी बोली : शायद है। अब गोपी थोडा क्रोधित होकर कहती हैं कि तु मेरे घर में आया क्यों? मेरा घर क्या कोई खेलने का मैदान है? कान्हा जी ने बडी मासुमियत से कहा कि एक तो मैं चिंटी निकालकर अच्छा काम कर रहा था और तु मुझे डांट रही है।यह कहकर कान्हा अपनी आंखे मलने लगे जैसे रोना आता हो।फिर कन्हैया ने बडे दार्शनिक भाव से कहा- अरी प्यारी सखी- तू रोज कथा मे तो जाती है, फिर भी तू मेरा-तेरा छोड़ती नही। इस घर का मै धनी हूँ। यह भी मेरा घर है। अब गोपी को आनंद हुआ कि मेरे घर को कन्हैया अपना घर मानते हैं, कन्हैया तो सबका मालिक है। सभी घर उसी के हैं उसको किसी की आज्ञा लेने कि जरूरत नही। अब गोपी को थोड़ा आनंद आता है तो झुठमुठ गुस्सा होकर कहती है- झुठ मत बोल, यह बता दें कि तूने माखन क्यों खाया?कान्हा जी ने कहा- माखन किसने खाया है।मैंने अभी कहा तो था कि इस माखन मे चींटी चढ़ गई थी, तो उसे निकालने को हाथ डाला, और तभी एक मक्खी को मुख से उडाने में मेरा हाथ होठ को छु गया, इतने मे ही तू टपक पड़ी। कान्हा जी भी जान गये थे कि गोपी को आनंद आ रहा है तो थोडा ज्यादा आनंद देने के लिए कहते हैं कि:- अब तु मुझे डोरी से बांधेगी और फिर मेरी उलाहना भी करेगी।तब गोपी को सुज गया कि आज तो कन्हैया को बांध कर दुसरी गोपियों को भी दिखाती हुं। अब गोपी ने सोचा कि कन्हैया स्वयं डोरी से बांधने का याद करवा रहा है। अब गोपी ने पीछे लाला को घर मे खम्भे के साथ डोरी से बाँध दिया है। तब कान्हा जी अपने श्री अंग को थोड़ा फुलाते हैं ताकि गोपी को यह लगे कि कन्हैया को कस कर बांध लिया है। लेकिन कन्हैया का श्रीअंग बहुत ही कोमल है। गोपी ने जब डोरी कस कर बाँधी तो लाला की आँख मे पानी आ गया। अब गोपी को थोड़ी दया आई। उसने लाला से पूछा- लाला, तुझे कोई तकलीफ हो रही है क्या? तो कान्हा जी ने बडी मासुमियत से गर्दन हिलाकर कहा- मुझे बहुत दुख रहा है। डोरी जरा ढीली करो न। गोपी ने विचार किया कि लाला को डोरी से कस कर बाँधना ठीक नही। मेरे लाला को दुःख होगा तो, इसलिए गोपी ने डोरी थोड़ी ढीली कर दी। और सखियों को खबर देने गई कि देखो आज मैने लाला को बाँधा है। यहां पर एक गूढ भाव है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम मुझे अपने प्रेम से बाँधो अवश्य, परंतु सभी से कहो नहीं।क्योंकि सभी अधिकारी नहीं होते हैं।

You do a lot of devotion, but do not publish it in front of everyone. Because not all are officers.

Devotion does not increase by the revelation of devotion, and there is no joy in devotion. Now when Gopi goes out, Kanha ji squeezes his Shriang a little, then the string becomes a little loose. And Kanha ji comes out of the string. When Gopi comes in from outside, she is surprised to see that the string with which Kanhaiya was tied is now dancing in Kanhaiya’s hands. Show thumb.

Then Kanha ji says with great innocence: Oh innocent gopi, you do not know how to tie. Then Gopi says – So tell me, how should I tie it. Gopi had to attain bliss with Lala. And now Kanha ji also had a desire to do a Leela. Now Kanha ji started tying that gopi with his own string.

When yogis touch Shri Krishna with their mind, then samadhi takes place. Here the gopi has a direct touch of Shri Krishna.

Gopi gets engrossed in Lala’s darshan. The gopi attains the knowledge of Brahman. After a while Gopi becomes conscious and finds herself tied up. Now Kanha ji had tied the gopi. Gopi says – Lala has come to bind me too. leave me now! Kanha ji sat down looking at him with a sweet smile. After saying it many times, Gopi started crying. So Kanha ji also started crying while sitting down on seeing that Gopi crying. Now seeing Kanha ji crying too, Gopi gets shocked and says why are you crying. I am suffering and you are crying.

Then Kanha ji said that I know how to tie but do not know how to release, so I am also crying with you. And then Kanha ji goes out leaving the gopi tied up. Because this gopi was an officer. The creature that the Lord once binds, never leaves that creature.

But this jiva (human) is such a creature, which has to be released. No matter how strong the relationship may be, but if selfishness is proved, he can leave it in a moment.

But the lord authority does not leave the creature once it is tied….!! Hope you all got supernatural bliss from this Leela.

Jai Ho to Shri Bal Krishna Lal

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