रूप और नाम

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नाम और रूप दोनों का बहुत महत्व है। पहले हम रूप से जुङते है। जो रूप हमारे दिल पर दस्तक दे देता है। उसको फिर हम बार बार निहारते हैं। बार बार नाम लेते हैं।

भगवान की कथा और लीलाओं का गान करते हैं। भगवान के नाम के साथ इतनी गहराई से जुड़ जाते हैं कि हम रूप से भी अधिक नाम हमारे दिल पर दस्तक देता है।

हम उठते बैठते सोते जागते खाते हुए नाम के साथ जुड़े रहते हैं। नाम भजते भजते भक्त रूप से ऊपर उठ जाता है। हर क्षण हम रूप से नहीं नाम से जुड़ सकते हैं।

दिल मे दर्शन की तङफ जिस दिन जागृत होती है। तब भक्त भगवान की खोज में रात दिन एक कर देता है। खाना और सोना गौण हो जाता है। उसके दिल की एक ही तमन्ना होती है कि किस प्रकार मेरे स्वामी भगवान् नाथ को ध्यालु ।

ऐसे भक्त नियमों से उपर उठ जाते हैं। उनका एक ही नियम होता है कि हर किरया कर्म में हर क्षण प्रभु प्राण नाथ को ध्याना है। भगवान को ध्याते हुए हमे बाहरी दिखावे की आवश्यकता नहीं है।

भगवान से प्रेम करने वाले भगवान को माला के मनके में न बाधंकर मनके मणके में बाधंते है। एक बार भगवान को मनके मणके से भजने लगता है तब वह मनका कभी रूकता नहीं है। मनके मणके को भक्त हर क्षण याद करता है।

दिल प्रभु प्रेम में खो जाता है। जल पी रहा है जल पीते हुए अन्दर से अवाज आती है कि देखु भगवान का नाम चल रहा है। अन्दर राम राम की ध्वनि सुनाई देती है। तब भगवान को भजते भजते जल पीता है।

भोजन कर रही हूं अन्तर्मन में झांकती क्या प्रभु प्राण नाथ की स्तुति हो रही है। या भोजन के स्वाद के अधीन है अन्तर्मन से मै स्तुति करती भगवान की लीलाओं का ध्यान धरते हुए भाव विभोर हो जाती ।फिर प्रभु प्राण नाथ से प्रार्थना करते हुए कहती।

हे स्वामी भगवान् नाथ हे दीनदयाल हे परब्रह्म परमेश्वर ये स्तुति करवाने वाले भी मेरे स्वामी आप ही हो। हे मेरे भगवान ये तन मन आत्मा के स्वामी आप ही हो।

भोजन में भी परम तत्व परमात्मा का निवास है। और ये भोजन भी आप ही ग्रहण करते हो। ऊपरी परत पर मै और मेरापन है हृदय  में तुम ही तुम हो ।

हे परम पिता परमात्मा मै तुम्हारी पुरण स्तुति नहीं कर पाती हूँ। हे प्रभु तुम मुझे कब दर्शन दोगे ।ऐसे कभी दर्शन की पुकार करती और कभी आनंदीत होती इस तरह से भोजन करते हुए भक्त भोजन करते हुए भी भोजन के अधिन नहीं होती हूँ।

परमात्मा का चिन्तन करते हुए रुखा सुखा नमक डला हुआ चाहे न डला हुआ हो तब भी भोजन पुरण स्वादिष्ट है। घर में गृहस्थ धर्म निभाते हुए भोजन बहुत सावधानी से भगवान को सिमरण करते हुए सामने वाले की ईच्छा के अनुरूप भोजन बनाती हूं। भक्त के पास भगवान बार बार लीला करने आते हैं। जय श्री राम अनीता गर्ग

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