भक्त और भगवान् के भाव

“समस्त घटनाक्रमों से बडी ही सुन्दर सीखने योग्य बात है कि”

तू मेरे दरबार में झुकेगा तो मैं दिखूंगा, अथवा मेरे दरबार में आयेगा, स्वयं चलकर, और तब मैं चाहूंगा तो मैं दिखूंगा, पर तू कहेगा कि तू मेरे दरबार में आकर स्वयं को दिखा तो मैं तुझे मूर्खवत् उपेक्षा ही करूंगा, मेरी इच्छा का मालिक तू कदापि नहीं हो सकता…..!

भगवान् कहते हैं पहले हमारे सामने प्रपत्ति करो, तब हम दर्शन देंगे पर अभक्त कहता है, पहले हमारे सामने दर्शन दो, तब प्रपत्ति करेंगे…..!

भगवान् पुनः करुणा करके अवसर देते हैं कि प्रपत्ति का फार्म पूरा नहीं भी भर सकता तो कम से कम खरीद कर नाम ही भी भर दे अपना, जा तब भी मैं दर्शन दे दूंगा, पर अभक्त वही कहता है कि पाँच गॉव…..? वो भी उन पाण्डवों को….? मैं तो सुई की नोक बराबर भी अपनी भूमि नहीं दूंगा……!

तब भगवान् यही कहते हैं, ठीक है, याचना नहीं अब तुझसे तो रण ही होगा, संघर्ष महाभीषण होगा…..!

जिज्ञासा में ‘अथातो’ की प्रधानता होती है ! यदि ‘अथातो’ नहीं है, तो जिज्ञासा फलीभूत नहीं होती, इसलिये अथातो का परिपालन पहले आवश्यक होता है……!

दुर्लभमदुर्लभमात्मभक्तौ = वेद में भी दुर्लभ हूं , कहॉ तो लोक में ! पर अपने भक्त के लिये दुर्लभ नहीं हूं…..!

वस्तु स्थिति यह है कि सारे खेल में, भावना को समझना सबसे प्रमुख है……!

“राघे-राघे”

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