ना भाए मोहे बैकुण्ठ, ब्रज की मोहे याद सताए, मन सुमिरे राधा राधा, छोड दाऊ सब राज पाठ,
मोहे पुनः तुम अब ब्रज ले जाऔ, माखन मिश्री ब्रज की दाऊ, मोहे भोग लगाऔ,
गोप गोपियाँ सखा सभी, सब मेरी राह निहारे, नंद बाबा यशोदा मुझ बिन, रह रह नीर बहावे,
यमुना करे चीतकार, कहे अब बंसी कौन बजावे, ब्रज की गईया मुझ बीन दाऊ, विरह मे दुग्ध बहावे,
गोवर्धन देखो हो अधीर, रह रह राह निहारे, मेरी प्यारी राधारानी, मन से मोहे पुकारे,
दाऊ कहे सुन कर सब बतिया, माया पति तुम स्वामी, तुमरी लीला तुम ही जानो, तुम ही हो अंतर्यामी। तुम ही हो अंतर्यामी।
वृंदावन से मथुरा जाने के बाद कृष्ण फिर कभी वृंदावन वापस नहीं लौटे। केवल दो बार वह राधा से मिले थे। एक कुरुक्षेत्र में जिसका वर्णन किया जा चुका है। यह कथा उस दूसरी बार के मिलन की है। घटना उस मूसल युद्ध के पहले की जिसमें शराब पीकर आपस में लड़ते हुए सभी यदुवंशी मर गये थे। प्रभास क्षेत्र यादवों का एक बहुत पवित्र स्थल था। ध्यान दीजिए कि विख्यात प्रथम शिवलिंग सोमनाथ प्रभास क्षेत्र में ही है। इस मंदिर का सुसज्जीकरण भी श्रीकृष्ण ने ही कराया था। इसके उत्तर में प्रभास का विस्तृतभू भाग है। इसी स्थान पर मैदान से थोड़ी दूर पर बहेलिये ने श्रीकृष्ण के पैर में बाण मारा था। यहां हर वर्ष एक पूजा समारोह होता था जिसमें यादव गणतंत्र के सभी लोग आबालवृद्ध भाग लेते थे। गोलोक जाने के पहले एक बार श्रीकृष्ण ने समस्त ब्रजवासियों को प्रभास तीर्थ में मिलने के लिए बुलाया था। वृंदावन से जाने के बाद राधा कृष्ण की यही दूसरी और अंतिम भेंट थी। रुक्मिणी भी आई थीं। इस पर सूरदास जी ने एक बहुत भावपूर्ण पद लिखा है…..
रुक्मणि राधा ऐसो भेंटी बहुत दिनन की बिछुरी जइसे एक बाप की बेटी
इसके बाद राधाकृष्ण का आमना सामना हुआ। मिलते ही राधा ने कहो कृष्ण कैसे हो? कृष्ण हतप्रभ रह गए।अचकचाते हुए कहा क्या कहती हो राधा ?
मैं तुम्हारे लिए कृष्ण कब से हो गया?
मैं तो अब भी तुम्हारे लिए कान्हा ही हूं। राधा ने कहा नहीं कृष्ण अब तुम कान्हा नहीं रहे, बहुत बदल गये हो।
क्या बदलाव आ गया है मुझमें?
राधा- “कोई एक हो तब न बताऊं। अगर तुम श्याम होते तो सुदामा के पास तुम जाते। सुदामा को तुम्हारे पास नहीं आना पड़ता। तुम वनमाली थे। तुम्हारे गले में वनमाला शोभती थी। शायद तुम्हें नहीं मालूम हुआ होगा कि तुम्हारे लिए माला बनाने के लिए मैं और मेरी सखियां ललिता विशाखा अनुराधा कुसुम शैव्या आदि वृंदावन के सात वनों से फूल चुनती थीं। कितनी बार बाहों में खरोंच आई। ओढनियां फट जाती थी।घर पर मार पड़ती थी।पर जब तुम वही वनमाला पहन कर हंसते थे तो आत्मा तृप्त हो जाती थी। लगता था कि लोक परलोक दोनों बन गये। आज तुम्हारे गले की वह वनमाला कहां गई रे कन्हा ?
आज तुम्हारे गले में हीरे-जवाहरात जड़ित सोने की माला है। जिन हाथों में मुरली शोभायमान होती थी उन हाथों में सुदर्शन चक्र आ गया है नं रे। जब तुम मुरली बजाते थे तो मनुष्य क्या पशु पक्षी भी सुनने के लिए जुट जाते थे। आज उन्हीं हाथों से संहार कर रहे हो तुम। लोग कहते हैं कि तुम भगवान हो और ऐसा तुमने भी गीता में कहा है…
मत्तम् परततरंनान्यत किंचिदस्ति धनंजय: मयि सर्वमदिमश्रोतं सूत्रे मणिगणाइव।
पर मैंने तो तुम्हें ब्रह्म माना ही नहीं। तुम तो मेरे नंद के लाल, मुरलीधर श्याम थे, मेरे प्यारे थे, एक सामान्य ग्वाला थे। तुम्हारे इस रूप का तो पता ही नहीं था। तुमने ऊधौ को भेजा था हमें निर्गुण ज्ञान बताने के लिए। ऊधौ ने तो बताया ही होगा कि हमारा प्रेम क्या है और उनकी क्या गति हुई थी..।
कृष्ण सुनते रहे और तब कहा… “लेकिन मैं तो तुम्हें अब भी याद करता हूं।बहोत याद करता हूं। तुम्हारी याद आती है तो आंखों आंसू निकलते हैं, मन विषण्णहो जाता है.. अकेलेमे रो पडता हूं, तडप तडप कर सिनेमे ईक टिंझसी उठती है.. और किसीसे बता भी नही सकता हू.. क्या कहू री राध्यै.. तुम्हे बहोत याद करता हूं। ।
राधा- लेकिन मैं तो तुम्हें कभी याद नहीं करती। याद तो उसको किया जाता है जो कहीं दूर चला गया हो। तुम तो कभी मेरे हृदय से गये ही कहां थे जो याद करना पड़ता। रही मेरे न रोने की बात तो कान्हा मैं इस लिए नहीं रोई कि मेरी आंखों में बसे हुए तुम कहीं आंसुओं के साथ निकल न जाओ।” ईस भक्त का भाव देखकर भगवान विव्हल हो गए। बोले,” राधा तुम जीती मैं हारा।”
राधा- याद रखना कृष्ण, मेरे बिना अधूरे रहोगे। संसार में जहां भी तुम्हारी पूजा होगी मैं साथ रहूंगी। एक को छोड़कर (जगन्नाथ जी)। कोई ऐसा मंदिर नहीं होगा जहां मैं तुम्हारे साथ नहीं होऊंगी। हमेशा तुम्हारे नाम के पहले मेरा नाम लिया जाएगा ठीक उसी प्रकार जैसे पूर्व में प्रभु श्रीराम के पहले माँ सीता का नाम आया।
भगवान श्रीकृष्ण ने एवमस्तु कहा और एक अंतिम बात कही की राधा अब इस जीवन में मेरी तुम्हारी भेंट नहीं होगी पर मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ, जो भी इच्छा हो मांग लो। राधा ने कहा, कन्हैया मुझे तो सब कुछ मिल चुका है और कुछ नहीं चाहिए। मेरा तुम्हारा प्यार अमर रहे। जब तक इस धरा पर एक भी प्राणी जीवित रहे मुझे तुम्हारे साथ याद करता रहे। परंतु कहते ही हो तो एक बार वही मुरली की तान एक बार और सुना दो।
भगवान भक्त की इस इच्छा को टाल न सके जबकि सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान कृष्ण इसके भयावह परिणाम को जानते थे। फिर भी उन्होंने बहुत दिनों से संजोकर रखी हुई बांसुरी निकाली और एक अद्भुत अविस्मरणीय तान छेड़ दिया। सारा संसार तरंगित हो उठा। यद्यपि कृष्ण ने अनेकों बार मुरली बजायी थी पर यह तान विलक्षण थी, अद्भुत शांति थी और हृदय के तार को झंकृत करने वाली थी। ऐसी धुन न कभी बजी थी और न कभी बजेगी। सुध-बुध खोकर राधा बंसी की धुन सुनती हुई श्रीकृष्ण में समा गई.. हमेशा के लिए..!! हे राधेश्याम.. एक नाम, एक जिक्र, एक तुम और एक तुम्हारी फिक्र बस यही है छोटी सी जिंदगी मेरी..
मेरी रूह को अपनी रूह में मिलाकर मुझे गुमनाम कर दो, तुम्हें देख कर लोग मुझे पहचाने यूं खुद को मेरा हमनाम कर दो












