श्री कृष्ण लीला चिंतन

ग्वालिन के प्राणों में स्पन्दन होने लगता है। पर क्षणभर का भी विलम्ब मनोरथ को तोड़ देगा! ग्वालिन विद्युद्गति से मणिस्मम्भ की ओट में अपने को छिपा लेती है तथा श्रीकृष्णचन्द्र चुपचाप भीतर प्रवेश कर जाते हैं, मथानी के निकट जाकर शान्त-मौन होकर बैठ जाते हैं।ओह! उस सय उनकी अतुलित शोभा निहारकर गोपसुन्दरी का अणु-अणु मानो झंकार कर उठता है किंतु अब वह सौन्दर्यसागर मानो तरंगित हो उठता है, श्रीकृष्णचन्द्र ग्वालिन के मनोरथ की पूर्ति करते हुए नवनीत-हरण लीला करने चलते हैं। उनके पास की नवनीतपूर्ण एक पात्र पड़ा है। चंचल नेत्रों से एक बार वे द्वार की ओर देखते हैं तथा फिर पात्र में से माखन निकालकर खाने लग जाते हैं। सहसा मणिस्तम्भ में उन्हें अपना प्रतिबिम्ब दीख पड़ता है। उन्हें प्रतीत होता है कि मेरे आने से पूर्व एक अन्य शिशु यहाँ आया है, मणिस्तम्भ से सटकर खड़ा है। श्रीकृष्णचन्द्र को यह भय होने लगता है कि कहीं यह मेरी चोरी प्रकट न कर दे। वे उसे प्रलोभित करने लगते हैं। उससे कहते हैं- ‘भैया! देख, तू किसी से मेरी बात बता न देना, भला! आज से हम दोनों साथी हुए, हमलोग सभी वस्तु आधी-आधी बाँट लेंगे। यह ले, मैं खा रहा हूँ; तू भी खा!’ यह कहकर श्रीकृष्ण्णचन्द्र अपने हाथों से नवनीत उठाकर प्रतिबिम्ब के मुख में डाल देते हैं। तत्क्षण माखन नीचे गिर जाता है। वे सोचते हैं, शिशु रूठा हुआ है। उसे पुनः समझाते हैं- ‘अरे! तू फेंक क्यों दे रहा है? बावला हो गया है! नहीं भैया, यह ठीक नहीं; तू भी खा ले, मैं भी खाऊँ। अच्छा, बाँटकर खायगा? ले, यह एक लौंदा तेरे हाथ पर, एक मेरे हाथ पर है! तूने फिर गिरा दिया! क्या सब लेना चाहता है? नहीं-नहीं, यह तो उचित नहीं। अच्छा, अब तू मान जा, खा ले; देख, कितना मीठा है! यदि तुझे भी अत्यन्त रुचिकर लगे तो मैं कमोरी भरकर तुझे माखन दूँ।’

नन्दनन्दन की यह मुग्ध चेष्टा देखकर ग्वालिन के हृदय में प्रेम-समुद्र लहराने लगता है, रस तरंगों के आवेग से धैर्य का बाँध टूट जाता है। आनन्दपूरित हँसी के रूप में तरंगें मुख से बाहर आ जाती हैं, ग्वालिन स्तम्भ की ओट से मुख निकालर हँसने लग जाती है। बस, फिर तो यवनिका गिर गयी। दृश्य परिवर्तित हो गया। श्रीकृष्णचन्द्र ने ग्वालिन को देख लिया।एक अप्रतिम सुमधुर संकोच की छाया नन्दनन्दन के मुखचन्द्र को आवृत कर लेती है, साथ ही वे तुरंत उठकर कुंजवीथी की ओर भाग चलते हैं।ओह! जिनसे इस जगत का सृजन, संस्थान, संहार है, जिनकी सत्ता पर ही जगत की सत्ता अवलम्बित है, जगत का अवसान हो जाने पर भी जो अक्षुण्ण रहते हैं, जो सर्वज्ञ है, अखण्ड अबाध ज्ञान सम्पन्न हैं, स्वयं प्रकाश हैं, जो अपने संकल्प मात्र से पद्मयोनि में वेदज्ञान का विस्तार करते हैं, जिनके सम्बन्ध में योगीन्द्र-मुनीन्द्र विमोहित हो जाते हैं, जिनके ज्ञानमय प्रकाश से माया सदा निरस्त रहती है, उनका अपने प्रतिबिम्ब से मोहित हो जाना कितना आश्चर्यमय है! जिस माया से मोहित होकर जगत के मूढ़ प्राणी ‘मैं- मेरे’ का प्रलाप कर रहे हैं, वही माया जिनके दृष्टिपथ में ठहर भी नहीं पाती, लज्जित होकर भाग खड़ी होती है।उनका मणिस्तम्भ में अपना प्रतिबिम्ब देखकर भ्रमित हो जाना कितना मोहक है! ओह! जिन विराट के कटि से ऊपर के भाग में भूलोक, नाभि में भुवर्लोक, हृदय में स्वर्लोक, वक्षःस्थल में महर्लोक, ग्रीवा में जनलोक, स्तनों में तपोलोक एवं मस्तक में सत्यलोक की कल्पना है, कटिदेश में अतल, ऊरुओं में वितल, जानुओं में सुतल, जंघाओं में तलातल, गुल्फों में महातल, एड़ियों में रसातल एवं पादतल में पाताल कल्पित है; जिन विराट के मुख से वाणी एवं अग्नि उत्पन्न हुए; गायत्री, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, उष्णिक, बृहती, पंक्ति एवं जगती-ये सात छन्द जिनकी सात धातुओं से निर्गत हुए; हव्य, कव्य, अमृतमय अन्न, समस्त रस, रसनेन्द्रिय एवं वरुण जिनकी जिह्वा से निस्सृत हुए; पंचप्राण एवं वायु जिनके नासाछिद्रों से उद्भूत हुए; अश्विनीकुमार, ओषधिसमुदाय, मोद (साधारण गन्ध), प्रमोद (विशेष गन्ध) जिन विराट की घ्राणेन्द्रिय से उत्पन्न हुए; रूप एवं तेज जिनके नेत्रेन्द्रिय से निकले; सूर्य एवं स्वर्ग जिनके नेत्रगोलक से प्रकट हुए; समस्त दिशाएँ, समस्त तीर्थ जिनके कर्णयुगल से व्यक्त हुए, आकाश एवं शब्द जिनके श्रोत्रेन्द्रिय से निकले; जिन विराट का शरीर संस्थान समस्त वस्तुओं का सारस्वरूप एवं समस्त सौन्दर्य का भाजन है; जिनकी त्वचा से सारे यज्ञ, स्पर्श एवं वायु निकले; जिनके रोम से यज्ञ के उपकरणभूत समस्त उद्भूत हुए है

जिनके केश, श्मश्रु (दाढ़ी-मूँछ) एवं नखों से मेघ, विद्युत, शिला, लोह प्रकट हुए; जिनकी भुजाओं से रक्षक लोकपाल आविर्भूत हुए; जिनका पदसंचालन भूः, भुवः, स्वः-त्रिकोग का निर्माण कर देता है; जिनके शंतम-भयहारी चरण कमल अप्राप्त की प्राप्ति एवं प्राप्त की रक्षा कर देते हैं, समस्त कामनाओं की पूर्ति कर देते हैं; जो विराट जल, वीर्य, सर्ग, पर्जन्य, प्रजापति, कामसुख, यम, मित्र, मलत्याग, हिंसा, निर्ऋति, मृत्यु, निरय के उद्गम हैं; जिनके पृष्ठदेश से पराजय, अधर्म, अज्ञान उद्भूत हुए; जिनकी नाड़ियों से नद-नदी-समूह का निर्माण हुआ; जिनके अस्थि संस्थान से पर्वत श्रेणियाँ निर्मित हुईं; जिनके उदर में मूलप्रकृति रस नामक धातु, समुद्र, समस्त प्राणी-समुदाय, प्राणियों का निधन समाया हुआ है।जिनके हृदय से मन की अभिव्यक्ति हुई; जिनका चित्त ब्रह्मा, शंकर, नारद, धर्म, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार का आश्रय है, विज्ञान एवं अन्तःकरण का आधार है; अधिक क्या, जिन विराट की ही अभिव्यक्ति ये ब्रह्मा, शंकर, नारद, सनकादि हैं; सुर, असुर, नर, नाग हैं; खग, मृग, सरीसृप हैं; गन्धर्व, अप्सराएँ हैं; यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेत, सर्प हैं; जिनकी मूर्ति में पशु हैं, पितर हैं, सिद्ध हैं, विद्याधर हैं, चारण हैं, द्रुमपुन्ज हैं, जिन विराट की परिणति नभ-जल-थलवासी विविध जीव हैं, जिन विराट के ही रूप ग्रह, नक्षत्र, केतु, तारावलि, तडित, मेध हैं; अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के विश्व जिनके रूप हैं; उन विराट्पुरुष[1] के भी स्रष्टा स्वयं भगवान व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र का यह नवनीत-हरण, यह मुग्धभाव, यह शैशव-नाट्य कितना विस्मित कर देने वाला है! भक्तवत्सलता का ऐसा निदर्शन व्रजेन्द्रनन्दन के अतिरिक्त और कहीं है क्या? व्रजेन्द्रनन्दन! यशोदाप्राणधन! श्रीकृष्णचन्द्र! बलिहारी है तुम्हारी ऐसी मुनिमनहरणी मोहिनी भक्तसर्वस्वदायिनी लीला की!
वह बड़ भागिनी गोपसुन्दरी तो आनन्दातिरेक वश आत्मविस्मृत हो गयी। विक्षिप्त-सी हुई घर से बाहर निकल पड़ी।
क्रमशः



The life of the milkmaid starts pulsating. But even a moment’s delay will break the desire! The cowherd cower hides herself behind the cowl with the power of lightning and Shri Krishnachandra quietly enters inside, goes near the churner and sits quietly. Oh! Seeing her incomparable beauty, every molecule of the Gopasundari wakes up as if it is jingling, but now it is as if the ocean of beauty becomes waves. Shri Krishnachandra, fulfilling the wish of the cowherd, goes to perform Navneet-Haran Leela. There is a container of new policy lying near him. He looks towards the door once with playful eyes and then takes out butter from the vessel and starts eating it. Suddenly he sees his reflection in the gem pillar. It seems to them that before my arrival another child has come here, standing close to the Manistambh. Shri Krishnachandra starts fearing that he might reveal his theft. They start tempting him. They say to him- ‘Brother! Look, please don’t tell anyone about me! From today we both become friends, we will divide everything in half. Take this, I am eating; You also eat!’ Saying this, Shri Krishnachandra picks up Navneet with his hands and puts it in the reflection’s mouth. Immediately the butter falls down. They think the baby is upset. Let’s explain to him again – ‘Hey! Why are you throwing it away? He has gone mad! No brother, this is not right; You also eat, I will also eat. Okay, will you share and eat? Take, this is one penis on your hand, one on my hand! You dropped it again! Want to take everything? No-no, this is not appropriate. Okay, now you agree, eat it; Look how sweet it is! If you also find it very interesting, then I will fill the cup and give you butter.’

नन्दनन्दन की यह मुग्ध चेष्टा देखकर ग्वालिन के हृदय में प्रेम-समुद्र लहराने लगता है, रस तरंगों के आवेग से धैर्य का बाँध टूट जाता है। आनन्दपूरित हँसी के रूप में तरंगें मुख से बाहर आ जाती हैं, ग्वालिन स्तम्भ की ओट से मुख निकालर हँसने लग जाती है। बस, फिर तो यवनिका गिर गयी। दृश्य परिवर्तित हो गया। श्रीकृष्णचन्द्र ने ग्वालिन को देख लिया।एक अप्रतिम सुमधुर संकोच की छाया नन्दनन्दन के मुखचन्द्र को आवृत कर लेती है, साथ ही वे तुरंत उठकर कुंजवीथी की ओर भाग चलते हैं।ओह! जिनसे इस जगत का सृजन, संस्थान, संहार है, जिनकी सत्ता पर ही जगत की सत्ता अवलम्बित है, जगत का अवसान हो जाने पर भी जो अक्षुण्ण रहते हैं, जो सर्वज्ञ है, अखण्ड अबाध ज्ञान सम्पन्न हैं, स्वयं प्रकाश हैं, जो अपने संकल्प मात्र से पद्मयोनि में वेदज्ञान का विस्तार करते हैं, जिनके सम्बन्ध में योगीन्द्र-मुनीन्द्र विमोहित हो जाते हैं, जिनके ज्ञानमय प्रकाश से माया सदा निरस्त रहती है, उनका अपने प्रतिबिम्ब से मोहित हो जाना कितना आश्चर्यमय है! जिस माया से मोहित होकर जगत के मूढ़ प्राणी ‘मैं- मेरे’ का प्रलाप कर रहे हैं, वही माया जिनके दृष्टिपथ में ठहर भी नहीं पाती, लज्जित होकर भाग खड़ी होती है।उनका मणिस्तम्भ में अपना प्रतिबिम्ब देखकर भ्रमित हो जाना कितना मोहक है! ओह! जिन विराट के कटि से ऊपर के भाग में भूलोक, नाभि में भुवर्लोक, हृदय में स्वर्लोक, वक्षःस्थल में महर्लोक, ग्रीवा में जनलोक, स्तनों में तपोलोक एवं मस्तक में सत्यलोक की कल्पना है, कटिदेश में अतल, ऊरुओं में वितल, जानुओं में सुतल, जंघाओं में तलातल, गुल्फों में महातल, एड़ियों में रसातल एवं पादतल में पाताल कल्पित है; जिन विराट के मुख से वाणी एवं अग्नि उत्पन्न हुए; गायत्री, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, उष्णिक, बृहती, पंक्ति एवं जगती-ये सात छन्द जिनकी सात धातुओं से निर्गत हुए; हव्य, कव्य, अमृतमय अन्न, समस्त रस, रसनेन्द्रिय एवं वरुण जिनकी जिह्वा से निस्सृत हुए; पंचप्राण एवं वायु जिनके नासाछिद्रों से उद्भूत हुए; अश्विनीकुमार, ओषधिसमुदाय, मोद (साधारण गन्ध), प्रमोद (विशेष गन्ध) जिन विराट की घ्राणेन्द्रिय से उत्पन्न हुए; रूप एवं तेज जिनके नेत्रेन्द्रिय से निकले; सूर्य एवं स्वर्ग जिनके नेत्रगोलक से प्रकट हुए; समस्त दिशाएँ, समस्त तीर्थ जिनके कर्णयुगल से व्यक्त हुए, आकाश एवं शब्द जिनके श्रोत्रेन्द्रिय से निकले; जिन विराट का शरीर संस्थान समस्त वस्तुओं का सारस्वरूप एवं समस्त सौन्दर्य का भाजन है; जिनकी त्वचा से सारे यज्ञ, स्पर्श एवं वायु निकले; जिनके रोम से यज्ञ के उपकरणभूत समस्त उद्भूत हुए है

whose hair, mustache and nails revealed clouds, lightning, rocks and iron; from whose arms appeared the protective Lokpals; whose footsteps form the Bhuh, Bhuvah, Svah-tricog; whose peaceful-fearing lotus feet protect the attainment of the unattained and the attained, fulfill all desires; who are the sources of the vast water, semen, heaven, rain, creator, lust, Yama, friend, excrement, violence, Nirriti, death, hell; from whose background emerged defeat, iniquity, and ignorance; whose veins formed the river-group; whose bones formed mountain ranges; whose abdomen contains the metal called Mulprakruti Rasa, the sea, the entire community of living beings, the death of living beings. From whose heart the mind was expressed; whose mind is the shelter of Brahma, Shankara, Narada, Dharma, Sanaka, Sanandana, Sanatan, Sanatkumara, the basis of science and consciousness; What is more, these are the expressions of the Virat, Brahma, Shankara, Narada, Sanka and others; There are Suras, Asuras, Naras, Nags; There are birds, deer, reptiles; Gandharvas are Apsaras; There are yakshas, ​​rakshasas, ghosts, phantoms, snakes; Whose idol are animals, Pitras, Siddhas, Vidyadharas, Charans, Drumpunja, whose Virat is the result of various living beings inhabiting the sky, water and land, whose forms of Virat are planets, stars, Ketu, stars, lightning, sacrifice are; past, present and future worlds whose forms are; How astonishing is this new-found abduction, this fascination, this childish drama of Lord Vrajandranandan Sri Krishna Chandra himself, the creator of even those Viratpurushas[1]! Is there anywhere else besides Vrajendrananda such a demonstration of devotional compassion? Vrajendranandan! Yashodapranadhan! Sri Krishna Chandra! I am sacrificed to your such Munimanharani Mohini Bhaktasarvasvadayini Leela! That elder sister, Gopasundari, became self-forgetful under the overwhelming joy. She walked out of the house, seemingly deranged. respectively

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on pinterest
Share on reddit
Share on vk
Share on tumblr
Share on mix
Share on pocket
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *