
ऊधौ कहा करैं लै पाती
ऊधौ कहा करैं लै पातीजौ लौं मदनगुपाल न देखें, बिरह जरावत छाती ॥ निमिष-निमिष मोहिँ बिसरत नाहीं, सरद सुहाई राती

ऊधौ कहा करैं लै पातीजौ लौं मदनगुपाल न देखें, बिरह जरावत छाती ॥ निमिष-निमिष मोहिँ बिसरत नाहीं, सरद सुहाई राती

बिना श्रद्धा और विश्वास के कुछ हाथ नहीं लगता, क्योंकि कार्य अपने कारण को नहीं जान सकता।बेटा कैसे जान सकता

मैनें सुना है जब वह गाती है तब आँखों से आँसू बहने लगते हैं।जी चाहता है ऐसी प्रेम मूर्ति के

मीरा के हाथ से वस्त्र, सुई गिर पड़ी, हाथ गोद में गिर पड़े और सिर से साड़ी सरक गई।पाटल पाँखुरी

आज महाराणा साँगा का मुख प्रसन्नता से खिल उठता था।अस्सी घावों भरी देह, एक हाथ, एक पाँव और एक आँख

आप सभी को सपरिवार चैत्र नवरात्र की हृदयस्त अनंत शुभकामनाएँ.!!🌹🙏🏻

ऐसी सत्य घटना साझा कर सकते हैं, जिसे पढ़ते ही हृदय भगवान के लिए व्याकुल हो जाये?दिनांक: 1 नवंबर 1979समय:

आखिर विदाई का दिन भी आया। चारों ओर दहेज जमा करके बीच में पलंग पर मीरा और भोजराज को बिठाया

उगते हुए सूर्य को जल देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है | बहुत से लोग आज भी

भाणेज बावजी (जयमलजी) ने केवल कटार से आखेट में झुंड से अलग हुए एकल सुअर को पछाड़ दिया। हमारे महाराज