
हमारी गलत चालें भगवान्की नजरमें
हमारी गलत चालें भगवान्की नजरमें यहूदी सन्त सिम्शा बनेन अपने पड़ोसीके पापपूर्ण जीवनको देखकर बहुत दुखी होते थे। उनके पड़ोसीको

हमारी गलत चालें भगवान्की नजरमें यहूदी सन्त सिम्शा बनेन अपने पड़ोसीके पापपूर्ण जीवनको देखकर बहुत दुखी होते थे। उनके पड़ोसीको

एक बार भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र अपने सम्पूर्ण 18 परिवार परिकर आदिके साथ सिद्धाश्रम तीर्थमें स्नान करने गये। दैवयोगसे श्रीराधिकाजी भी वहाँ

संत डोमिनिकने तेरहवीं शताब्दीके स्पेनको अपनी स्थितिसे पवित्र किया था। वे बड़े उदार, दानी और परसेवाव्रती थे। दूसरोंकी सेवासे उन्हें

गांधीजीके बचपनके एक मित्र थे – शेख मेहताब साहब। इन मित्रके कारण उनमें पहले अनेक बाल सुलभ दुर्गुण भी आ

भीमसेनको अपनी शक्तिका बड़ा गर्व था। एक बार वनवास कालमें जब ये लोग गन्धमादन पर्वतपर रह रहे थे, तब द्रौपदीको

परम भागवत श्रीधर स्वामी पूर्वाश्रममें दिग्विजयी पण्डित थे। एक समय वे दिग्विजय करके घर लौट रहे थे। रास्तेमें डाकुओंने आपको

‘कर्मफल तो भोगना ही पड़ता है’ मार्गमें एक घायल सर्प तड़फड़ा रहा था। सहस्रों चींटियाँ उससे चिपटी थीं। पाससे एक

न्यायकी अद्भुत युक्ति एक आश्रम में सूतका एक व्यापारी अपना माल लिये सायंकाल पहुँचा और रात्रि विश्रामकी आज्ञा चाही। गुरुने

अति साहस करना ठीक नहीं एक कछुआ यह सोचकर बड़ा दुखी था कि पक्षीगण बड़ी आसानीसे आकाशमें उड़ा करते हैं,

किसी गाँव में एक गरीब विधवा ब्राह्मणी रहती थी। तरुणी थी। सुन्दर रूप था । घरमें और कोई न था