
गाड़ीवालेका ज्ञान
एक बड़ा दानी राजा था, उसका नाम था जानश्रुति । उसने इस आशयसे कि लोग सब जगह मेरा ही अन्न

एक बड़ा दानी राजा था, उसका नाम था जानश्रुति । उसने इस आशयसे कि लोग सब जगह मेरा ही अन्न

वेरूलके निकट देवगाँवके आऊदेवकी कन्या बहिणाबाई और उसके पति गङ्गाधरराव पाठक पट्टीदारी के झगड़ेसे ऊबकर घर त्याग कोल्हापुरमें आकर बस

सुप्रसिद्ध महान् देशभक्त क्रान्तिकारी तरुण वीर चन्द्रशेखर आजाद बड़े ही दृढ़प्रतिज्ञ थे। हर समय आपके गलेमें यज्ञोपवीत, जेबमें गीता और

गुरुके अपमानसे पराभव इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे

दुश्मन है तो क्या ! पिछले विश्वयुद्धकी बात है। अमेरिकनोंने अत्तू द्वीपपर हमला किया। चीचागोफमें जाकर लड़ाई हुई। बहुत-से अमेरिकी

श्रीराम-सीता लक्ष्मण वन पधार गये। श्रीदशरथजीकी मृत्यु हो गयी। भरतजी ननिहालसे अयोध्या आये। सब समाचार सुनकर अत्यन्त मर्माहत हो गये।

[11] परिश्रमका फल एक किसानको खेती बहुतसे गुर मालूम थे, परंतु उसके पुत्रोंमें उन्हें सीखनेका धैर्य नहीं था। उसे अही

मधुर कविके गुरुका नाम नम्माळवार- शठकोप था। वे तिरुक्कुरुकूर – श्रीनगरीमें उत्पन्न हुए थे। इनके जन्म लेते ही माता-पिताने इन्हें

एक बार कैलासके शिखरपर श्रीश्रीगौरीशङ्कर | भगवद्भक्तोंके विषयमें कुछ वार्तालाप कर रहे थे। उसी प्रसङ्गमें जगज्जननी श्रीपार्वतीजीने आशुतोष श्रीभोलेबाबा से

कर्कटे पूर्वफाल्गुन्या तुलसीकाननोद्भवम्। । पाण्ड्ये विश्ववरां कोदां वन्दे श्रीरङ्गनायकीम् ॥ पुष्प – चयन करते समय प्रातः काल श्रीविष्णुचित्तने तुलसीकाननमें एक