
अनन्यता- मैं किसी भी दूसरे गुरु माता-पिताको नहीं
माता कैकेयीकी इच्छा और पिता दशरथजीकी मूक आज्ञासे राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्र वन जानेको तैयार हुए। उनकी वन जानेकी बात सुनकर लक्ष्मणजीने

माता कैकेयीकी इच्छा और पिता दशरथजीकी मूक आज्ञासे राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्र वन जानेको तैयार हुए। उनकी वन जानेकी बात सुनकर लक्ष्मणजीने

हुगलीके सरकारी वकील स्वर्गीय शशिभूषण वन्द्योपाध्याय एक दिन वैशाखके महीनेमें दोपहरकी कड़कती लूमें एक किरायेकी गाड़ीमें बैठकर एक प्रतिष्ठित व्यक्तिके

एक शिष्यने अपने गुरुसे पूछा- ‘भगवन्! भगवत्प्राप्तिके लिये किस प्रकारकी व्याकुलता होनी चाहिये ?’ गुरु मौन रहे। शिष्य भी उनका

घर-घर दीप जले (श्रीमती ऊषाजी अग्रवाल ) एक आदमी भीख माँग रहा था। वह कम-से कम सौ घरोंके आगे चक्कर

ईश्वर और जीवका भेद एक महात्माने एक जिज्ञासुसे कहा कि हमको प्यास लगी है, यह तूंबा ले जा और यहाँसे

स्वामी विवेकानन्द परिव्राजकके रूपमें राजस्थानका भ्रमण करते-करते अलवर जा पहुँचे। राजाके दीवान थे मेजर रामचन्द्र वे आध्यात्मिक मनोवृत्तिके व्यक्ति थे।

गौतम नामका एक ब्राह्मण था ब्राह्मण वह केवल अर्धमें था कि ब्राह्मण माता-पितासे उत्पन्न हुआ था, इस अन्यथा था वह

यह संसार भी एक सपना है किसी देशमें एक किसान रहता था। वह बड़ा ज्ञानी था। किसानी करता था। स्त्री

सत्यकी जय होती है ‘यह तरबूज कैसा है लड़के? -एक ग्राहकने पूछा। ‘यह तरबूज भीतरसे सड़ा है, श्रीमान् !’ ग्राहक

एक महात्मा थे। वे एक बार किसी किलेके सामने बैठे थे। उस समय मुगलराज्य था। एक सिपाहीने उनको भगा दिया,