
सत्य ही धर्म है
सत्य ही धर्म है महान् सन्त गुरु नानकदेवजी एक बार सद्विचारोंका प्रचार करते हुए एक नगरमें पहुँचे। वहाँ शाह शरफ

सत्य ही धर्म है महान् सन्त गुरु नानकदेवजी एक बार सद्विचारोंका प्रचार करते हुए एक नगरमें पहुँचे। वहाँ शाह शरफ

भगवान् श्रीराम जब समुद्र पारकर लङ्का जानेके लिये समुद्रपर पुल बाँधनेमें संलग्न हुए, तब उन्होंने समस्त वानरोंको संकेत किया कि

प्रलोभनसे अविचलित रहनेका गौरव-बोध सौराष्ट्रके एक छोटे से राज्यकी पुराने जमानेकी बात है। बन्दरगाहके अधिकारके विषयमें अंग्रेजोंके साथ एक शर्तनामा

एक गाँवमें एक साधु आये। उन्हें पता लगा कि गाँवमें एक ऐसा व्यक्ति है जो किसी प्रकारके आचार विचार, व्रत

विडालव्रतवालोंसे सावधान रहना चाहिये एक बार एक बिलाव शक्तिहीन ही जानेके कारण गंगाजीके तटपर हाथ उठाकर खड़ा हो गया और

एशियाके दमश्क नगरमें मुश्तफा नामका एक धनी और बुद्धिमान् व्यापारी रहता था वह अपने पुत्र सैयदको दूरदर्शी और विचक्षण बनाना

परमात्माके भक्ति-साम्राज्यमें निवास करनेवाले संत सदा अभय होते हैं। वे किसीसे भी नहीं डरते। सोलह सौ वर्ष पहलेकी एक घटना

मनुष्यका कर्म ही उसकी मृत्युका कारण पूर्वकालमें गौतमी नामवाली एक बूढ़ी ब्राह्मणी थी, जो शान्तिके साधनमें लगी रहती थी। एक

उत्तर प्रदेशमें राजघाटके पास किसी गाँवमें एक विद्वान् पण्डितजी रहते थे। घरमें उनकी विदुषी पत्नी थी। पण्डितजी एक बार बीमार

सन् 1897 की बात है, लोकमान्य तिलक दाजी साहेब खरेके बँगलेपर उतरे। रातके 9 ॥ बजे एक यूरोपियन पुलिस सुपरिंटेंडेंट