
अद्भुत त्याग
अठारहवीं शताब्दीके इटली देशके प्रसिद्ध संत अलफान्सस लिग्योरी अपने पूर्वाश्रममें वकीलका काम करते थे। एक समयकी बात है। वे न्यायालयमें

अठारहवीं शताब्दीके इटली देशके प्रसिद्ध संत अलफान्सस लिग्योरी अपने पूर्वाश्रममें वकीलका काम करते थे। एक समयकी बात है। वे न्यायालयमें

एक बार जब भगवान् श्रीराघवेन्द्र अपने दरबारमें विराज रहे थे, तब एक उलूक और एक गृध्र उनके चरणोंमें उपस्थित हुए

अनीति श्रुतायुधके पास शंकरजीके वरदानसे प्राप्त एक अमोघ गदा थी। उसके तपसे प्रसन्न होकर भगवान्ने यह उपहार उसे इस शर्तपर

संत इब्राहीम खवास किसी पर्वतपर जा रहे थे। पर्वतपर अनारके वृक्ष थे और उनमें फल लगे थे। इब्राहीमकी इच्छा अनार

नर्मदा तटपर माहिष्मती नामकी एक नगरी है। वहाँ माधव नामके एक ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने अपनी विद्याके प्रभावसे बड़ा धन

ग्रीष्मकी भयंकर ज्वालासे प्राणिमात्र संतप्त थे। सरोवरों, नालों और बावलियोंका जल सूख गया था; वृक्ष तपनसे दग्ध थे, जीव -जन्तु

संत फ्रांसिसके जीवनकी बात है। इटलीके अस्सीसाई नगरमें अपनी युवावस्थाके दिन उन्होंने राग-रंग और आमोद-प्रमोदमें बिताये। धनियोंके लड़कोंके साथ वे

किसी समय महर्षि वसिष्ठजी विश्वामित्रजीके आश्रमपर पधारे। विश्वामित्रजीने उनका स्वागत-सत्कार तो किया ही, आतिथ्यमें अपनी एक सहस्र वर्षकी तपस्याका फल

‘लालच बुरी बलाय’ एक दुखी लकड़हारा नदीके किनारे पेड़ काट रहा था। सहसा उसकी कुल्हाड़ी उसके हाथसे फिसलकर नदीमें जा

स्काटलैंडके एक नगर में विपत्तिको मारी एक दरिद्र स्त्री आयी। उसके पास न रहनेको स्थान था और न भोजनको अन्न।