
भगवान् श्रीशंकराचार्यजीका लोकव्यवहार-बोध
भगवान् श्रीशंकराचार्यजीका लोकव्यवहार-बोध भगवान् श्रीशंकराचार्यजीने जहाँ एक और मुमुक्षुओंके कल्याणार्थ विवेकचूडामणि, अपरोक्षानुभूति, शतश्लोकी- जैसे प्रकरण-ग्रन्थोंका प्रणयन किया, वहीं दूसरी ओर

भगवान् श्रीशंकराचार्यजीका लोकव्यवहार-बोध भगवान् श्रीशंकराचार्यजीने जहाँ एक और मुमुक्षुओंके कल्याणार्थ विवेकचूडामणि, अपरोक्षानुभूति, शतश्लोकी- जैसे प्रकरण-ग्रन्थोंका प्रणयन किया, वहीं दूसरी ओर

द्रौपदीके साथ पाण्डव वनवासके अन्तिम वर्ष अज्ञातवासके समयमें वेश तथा नाम बदलकर राजा विराटके यहाँ रहते थे। उस समय द्रौपदीने

थेरीगाथाकी बौद्ध भिक्षुणियाँ – कतिपय प्रसंग बौद्ध धार्मिक साहित्य, जो पाली भाषामें है, उसमें ‘तिपिटक’ (संस्कृत-त्रिपिटक)- का विशेष स्थान है।

पट्टन-साम्राज्यके महामन्त्री उदयनके पुत्र बाहड़ जैनोंके शत्रुञ्जयतीर्थका पुनरुद्धार करके दिवंगत पिताकी अपूर्ण इच्छा पूरी कर देना चाहते थे। तीर्थोद्धारका कार्य

कुसंगका परिणाम गंगाजी के किनारे गृध्रकूट नामक पर्वतपर एक विशाल पाकड़ वृक्ष था। उसके खोखले भाग (कोटर) में एक अन्धा

महाभारत युद्धके 10 वें दिन भीष्मपितामहके ही बतलाये मार्गसे शिखण्डीकी आड़ लेकर अर्जुनने उन्हें घायल कर दिया और अन्ततोगत्वा उन्हें

पवित्र सह्याचलके अञ्चलमें पहले कोई करवीरपुर नामका एक नगर था। वहाँ धर्मदत्त नामका एक पुण्यात्मा ब्राह्मण रहता था। एक बार

किसी नरेशके मनमें तीन प्रश्न आये- 1. प्रत्येक कार्यके करनेका महत्त्वपूर्ण समय कौन-सा ? 2. महत्त्वका काम कौन-सा ? 3.

जैसी नीयत, वैसी बरकत दानधर्मा प्रकृति भी नीयतके अनुसार बरक्कत (बढ़ोत्तरी) देती है, यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है। एक बार

संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव महाराज तीर्थ यात्रा करते-करते हस्तिनापुर (दिल्ली) पहुँचे। संतोंके आने से दिल्लीमें नामदेव कीर्तनकी धूम मच