
दीर्घायुष्य एवं मोक्षके हेतुभूत भगवान् शंकरकी आराध
प्राचीन कालमें एक राजा थे, जिनका नाम था इन्द्रम्र से बड़े दानी, धर्मज्ञ और सामर्थ्यशाली थे। धनार्थियोंको वे सहस्र स्वर्णमुद्राओंसे

प्राचीन कालमें एक राजा थे, जिनका नाम था इन्द्रम्र से बड़े दानी, धर्मज्ञ और सामर्थ्यशाली थे। धनार्थियोंको वे सहस्र स्वर्णमुद्राओंसे

किसी नरेशको पक्षी पालनेका शौक था। अपने पाले पक्षियोंमें एक चकोर उन्हें इतना प्रिय था कि उसे वे अपने हाथपर

श्रीचैतन्य महाप्रभु उन दिनों नवद्वीपमें निमाईके नामसे ही जाने जाते थे। उनकी अवस्था केवल सोलह वर्षकी थी। व्याकरणकी शिक्षा समाप्त

जर्मनीके बसंवीक प्रदेशमें प्रमुख नगर है नोवर । इसके पास ही हैमेलिन नामका एक शहर है। इसकी एक ओर तो

महामतिमान् आचार्य चाणक्य मैगस्थनीज यूनानका राजदूत बनकर जब भारत आया तब उसने चन्द्रगुप्त मौर्यके प्रधानमन्त्री चाणक्यकी प्रशंसा सुनकर उनसे मिलनेकी

दो भाई बर्माके शान प्रान्तमें एक धनी किसान रहता था। मरते समय उसने अपने दोनों बेटोंको बराबर बराबर सम्पत्ति बाँट

एक भगवद्भक्त कहीं यात्रा करने निकले थे। पर्वतकी एक गुफाके सम्मुख उन्होंने बहुत बड़ी भीड़ देखी। पता लगा कि गुफामें

मेवाड़के गौरव हिंदूकुल- सूर्य महाराणा प्रताप अरावलीके वनोंमें उन दिनों भटक रहे थे। उनको अकेले ही वन-वन भटकना पड़ता तो

शेषावतार श्रीरामानुज महामुनीन्द्रके पवित्र सम्प्रदायमें श्रीवैष्णव-जगत्के महान् आचार्य श्रीवेङ्कटनाथका प्राकट्य विक्रम संवत् 1325 में विजयादशमीके दिन हुआ था। ये बहुत

वनमें धर्मराज युधिष्ठिरके चारों भाई सरोवरके किनारे मृतकके समान पड़े थे। प्यास तथा भ्रातृशोकसे व्याकुल युधिष्ठिरके सम्मुख एक यक्ष प्रत्यक्ष