बच्चा बीमार नहीं था,उसके रंग खत्म हो चुके थे

कहानी : “बच्चा बीमार नहीं था, बस उसके शेष सभी रंग खत्म हो चुके थे।”
(एक ऐसा नजरिया जो आपका जीवन बदल देगा)

कहा जाता है कि एक बड़े शहर के एक छोटे से स्कूल में, जहाँ अमीर परिवारों के बच्चे पढ़ते थे, एक बच्चे के व्यवहार ने सबको चिंतित कर दिया।

करीब पंद्रह-बीस दिनों से वह जो भी चित्र बनाता, सिर्फ काले रंग से बनाता था।
सूरज बनाता तो काला।
गुलाब बनाता तो काला।
समुद्र बनाता तो काला।
आदमी बनाता तो काला।

उसकी अध्यापिका परेशान हो गई। उसने सोचा, “इतना काला रंग… यह ठीक बात नहीं है। कहीं बच्चा अंदर से उदास तो नहीं? कहीं वह किसी दुख में तो नहीं जी रहा?”

स्कूल के मनोवैज्ञानिक को बुलाया गया। उन्होंने कहा,
“काले रंग की ओर इतना झुकाव सामान्य नहीं है। यह अंदर की उदासी, निराशा या किसी गहरे तनाव का संकेत हो सकता है। हमें इसकी जांच करनी होगी।”

जांच शुरू हुई। मनोवैज्ञानिक बच्चे के घर गए। पड़ोसियों से बात की। माता-पिता से बात की। पंद्रह दिनों तक जानकारी इकट्ठी की गई।

फिर एक लंबी रिपोर्ट तैयार हुई।

उसमें लिखा था—

शायद घर का माहौल ठीक नहीं है।

शायद मां-बाप के बीच झगड़े होते हैं।

शायद बच्चा तनाव में है।

शायद गर्भावस्था में मां की बीमारी का असर पड़ा है।

शायद बच्चे में कुछ विटामिन की कमी है।

स्कूल के डॉक्टर ने भी जांच की और कहा,
“संभव है कि पोषण की कमी से बच्चा सुस्त और उदास हो गया हो।”

सब लोग गंभीर हो गए। इलाज की तैयारी होने लगी।

लेकिन इलाज शुरू होता, उससे पहले एक छोटी-सी घटना घटी।

स्कूल का चपरासी, जो रोज बच्चों को आते-जाते देखता था, उसने बच्चे को जाते समय धीरे से पूछा—

“बेटा, एक बात पूछूँ? तुम हर चित्र काले रंग से ही क्यों बनाते हो?”

बच्चे ने बिल्कुल सरलता से जवाब दिया—
“क्योंकि मेरी रंगों की डिब्बी में और सारे रंग खो गए हैं। सिर्फ काला रंग बचा है। इसलिए।”

चपरासी ने यह बात अध्यापिका को बताई। बच्चे को नए रंग दे दिए गए।

अगले दिन वही बच्चा सूरज को पीला बनाने लगा, गुलाब को लाल, समुद्र को नीला।

समस्या खत्म हो गई।

असल में कोई गहरी बीमारी थी ही नहीं। बस डिब्बी में बाकी रंग नहीं थे।

लेकिन विशेषज्ञों ने कितनी बड़ी-बड़ी बातें सोच ली थीं। अगर उन रिपोर्टों के आधार पर इलाज शुरू हो जाता, तो शायद एक स्वस्थ बच्चे को बीमार बना दिया जाता।

यह कहानी हमें एक सरल बात समझाती है।

कभी-कभी हम छोटी बात को समझे बिना बड़ी व्याख्याएँ करने लगते हैं। हम लक्षण देखकर तुरंत निष्कर्ष बना लेते हैं। पूछते नहीं, मान लेते हैं। समझते नहीं, समझा हुआ घोषित कर देते हैं।

जब कोई हंसता है, तो वह भीतर की खुशी दिखाता है।
जब कोई रोता है, तो वह भीतर का दुख दिखाता है।
लेकिन हर संकेत का अर्थ वही हो, यह जरूरी नहीं।

जीवन में भी हम यही करते हैं। हजारों साल से हम मनुष्य को सुधारने, बदलने, ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। सब अपने-अपने इलाज लेकर खड़े हैं। लेकिन क्या हमने कभी सरलता से यह पूछा कि असली समस्या क्या है?

जो बीमारी है ही नहीं, उसका इलाज खतरनाक हो सकता है।

इसलिए कभी-कभी सबसे बड़ा ज्ञान यही है कि पहले सीधा सवाल पूछा जाए—
“सचमुच बात क्या है?”

क्योंकि हो सकता है, पूरी अंधकार की कहानी का कारण बस इतना हो कि डिब्बी में बाकी रंग नहीं बचे हों।

मुमुक्षा. मोक्ष की अभिलाषा

Share on whatsapp
Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on email

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *