चैतन्य महाप्रभुओं के जीवन की एक बहुत ही हृदयस्पर्शी कथा है, जो प्रेम और विनम्रता की शक्ति को दर्शाती है। यह कथा जगाई और मधाई’ के उद्धार की है।
जगाई-मधाई और महाप्रभु की करुणा
नवद्वीप में दो भाई रहते थे जगाई और मधाई। वे बहुत बड़े अपराधी, शराबी और हिंसक थे। पूरा नगर उनसे थर-थर कांपता था।
1 नित्यानंद प्रभु का संकल्प
चैतन्य महाप्रभु के प्रिय शिष्य, नित्यानंद प्रभु, अत्यंत दयालु थे। उन्होंने सोचा कि यदि इन दोनों पापियों का हृदय परिवर्तन हो जाए, तो महाप्रभु की नाम-संकीर्तन की महिमा पूरी दुनिया में फैल जाएगी।
2 वह हिंसक घटना
एक दिन जब नित्यानंद प्रभु गलियों में हरि-नाम का प्रचार कर रहे थे, उनका सामना जगाई और मधाई से हो गया। मधाई ने गुस्से में आकर एक मिट्टी के मटके का टुकड़ा नित्यानंद प्रभु के सिर पर दे मारा, जिससे उनके माथे से खून बहने लगा।
नित्यानंद प्रभु ने क्रोधित होने के बजाय बड़े प्रेम से कहा:
तुमने मुझे मारा तो क्या हुआ, कम से कम एक बार मुख से कृष्ण का नाम तो ले लो!
3 चैतन्य महाप्रभु का आगमन
जब महाप्रभु को पता चला कि उनके प्रिय भक्त को चोट लगी है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए और अपना ‘सुदर्शन चक्र’ आह्वान करने लगे। वे उन पपियों को दंड देना चाहते थे।
लेकिन नित्यानंद प्रभु ने महाप्रभु के पैर पकड़ लिए और विनती की, प्रभु! इस कलियुग में शस्त्र से नहीं, प्रेम से संहार कीजिये। ये अज्ञानी हैं, इन्हें क्षमा कर दें।
4 हृदय परिवर्तन
नित्यानंद प्रभु की यह निस्वार्थ करुणा देखकर जगाई और मधाई के पत्थर जैसे दिल पिघल गए। वे महाप्रभु के चरणों में गिर पड़े और फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने अपने सभी पापों की क्षमा मांगी।
महाप्रभु ने उन्हें गले लगा लिया और वे दोनों भाई महान भक्त बन गए। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे जीवन भर गंगा के किनारे घाट की सफाई करेंगे और हर आने-जाने वाले भक्त की सेवा करेंगे।
इस कथा की सीख
चैतन्य महाप्रभु की यह कथा सिखाती है कि क्रोध को प्रेम से जीता जा सकता है। महाप्रभु ने दिखाया कि सच्ची भक्ति और विनम्रता बड़े से बड़े अपराधी का जीवन भी बदल सकती है













